पहला भाषण

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सा ही अवसर ऐतिहासिक होता है। जैसा राज्यसभा में 5 फरवरी को उस समय घटित हुआ, जब सांसद के रूप में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सवा घंटे बोले। जो बोले, वह मीडिया में आया है।

जो नहीं आया है, वह समझने लायक है। वे 2017 के अगस्त में राज्यसभा सदस्य बन गए थे। 15 दिसंबर, 2017 को पहली बार शीत सत्र में राज्यसभा पहुंचे। लेकिन अपने पहले भाषण के लिए उन्होंने बजट अधिवेशन को चुना।

समय का चयन अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है। दूरदर्शन ने उन्हें बोलते हुए दिखाया। यह भी दिखाया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सदन में उपस्थित हैं और तन्मय होकर भाषण सुन रहे हैं। इसी अर्थ में संसदीय लोकतंत्र की दृष्टि से अमित शाह का भाषण बहुत विशेष हो गया है।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर संसद में चर्चा होती है। उसे धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा कहते हैं। अमित शाह ने उसी चर्चा की सत्तापक्ष से शुरुआत की।

ऐसे अवसर पर जरूरी नहीं कि प्रधानमंत्री उपस्थित रहें। लेकिन अवसर विशेष था इसलिए वित्त मंत्री अरुण जेटली और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उपस्थित रहने का निर्णय किया होगा।

यह बहुत स्वाभाविक ही कहा जाएगा कि अमित शाह ने सरकार की नीतियों का पुरजोर समर्थन किया। चार साल की उपलब्धियों को जहां गिनाया और निशान लगाकर यह बताया कि वे गांव, गरीब, किसान और वंचितों के हित में लागू की गई हैं।

जाहिर है, वे कांग्रेस को आईना भी दिखाने से नहीं चूके। कांग्रेस की मानसिकता पर सवाल खड़े किए। खासकर राहुल गांधी और पी. चिदंबरम की टिप्पणियों को निशाने पर लिया।

इससे तिलमिलाए कांग्रेसी जब टोकाटाकी पर उतरे तो हाजिर जवाबी का उदाहरण पेश करते हुए अमित शाह ने मजाकिया अंदाज में उन्हें चुप कराया।

बोले- ‘भाई, आपको अब तो मुझे छह साल तक सुनना ही होगा।’ अमित शाह के भाषण से एक पुरानी परंपरा पुनर्जीवित हुई। वह यह कि सांसद का पहला भाषण सदन ध्यान से सुनता है और वह पूरी तैयारी से बोलने के लिए आता है।

अमित शाह को सदन ने जितना सुना, उससे ज्यादा देश-दुनिया ने सुना। उनका भाषण सिर्फ एक सांसद का कथन मात्र नहीं था। वे सांसद के रूप में भाजपा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।

उनके भाषण की यही एकमात्र विशेषता नहीं है। यह तो है ही, लेकिन दूसरी विशेषताएं अधिक महत्वपूर्ण हैं। अमित शाह के भाषण को संसदीय लोकतंत्र के बड़े दायरे में देखने की जरूरत है। तब उनके भाषण का महत्व समझा जा सकता है।

संसदीय लोकतंत्र दो पटरियों पर चलता है। सत्ता और विपक्ष।  राजनीतिक दल की लोकतांत्रिक संस्कृति से इन पटरियों का निर्धारण होता है।

कांग्रेस ने एक राजनीतिक विकृति को ही लगातार बढ़ाया है। वह यह कि पहले आम चुनाव से ही कांग्रेस में प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष पद एक ही व्यक्ति के पास रहता है। जवाहर लाल नेहरू लोकतांत्रिक माने जाते थे।

लेकिन उनको अपने सहयोगी और पार्टी अध्यक्ष पुरुषोत्तम दास टंडन पर भरोसा नहीं था। इसलिए वे स्वयं अध्यक्ष बन बैठे। वहां से कांग्रेस में सत्ता का केंद्रीकरण शुरू हुआ।

जो अब नेहरू परिवार में सिमट गया है। उसे अपने भाषण में अमित शाह ने वंशवाद कहा। यह भी कहा कि हमने इसे उखाड़ फेंका है। इतना ही नहीं, भाजपा एक नई राजनीतिक संस्कृति को बढ़ा रही है।

अमित शाह बिना कहे सिद्ध कर रहे थे कि भाजपा न केवल कांगे्रस से बल्कि दूसरे दलों से अधिक लोकतांत्रिक है। तभी तो प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष पर दो नेता दिख रहे हैं।

अमित शाह का भाषण यह भी बता रहा था कि भाजपा और मोदी सरकार में परस्परता है, प्रतिस्पर्द्धा नहीं। इसके विपरीत उदाहरण दूसरे दलों में देखे जा सकते हैं।

मीडिया में अमित शाह के भाषण को आक्रामक बताया गया है। वास्तव में उनके भाषण में नीति, नैतिकता और राजनीति की दृढ़ता थी। राजनीतिक सुधार का एक संदेश भी था।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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