परमात्मा से मिलन का बिंदु

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हली बार श्री अरविन्द ने 1904 में योगाभ्यास का प्रारंभ किया। तब किसे पता था कि देश के सुदूर दक्षिण भारत में बसे एक प्रदेश से निकला यह योग पुंज पूरे देश को अपने प्रकाश से आच्छादित कर देगा।

सन् 1910 में अरविंद, राजनीति से या यूं कहें कि स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई से वापस लौट गए। इसके बाद उन्होंने अपने आंतरिक जीवन पर ध्यान देने का फैसला लिया।

जिसे हम आम बोल चाल में संन्यास कहते हैं। इस काम के लिए उन्होंने फ्रांसीसी भारत में स्थित पुडुचेरी को चुना। वहीं 1926 में श्री मां की सहायता से आश्रम की स्थापना की। कुछ ही वर्षों में उन्होंने कई मूलभूत सिद्धियां प्राप्त कर लीं।

अरविन्द यहां योग सिद्ध हो रहे थे लेकिन उनके ज्ञान का प्रकाश भारत के बाहर तक दूर तक बढ़ चला था। श्री अरविन्द ने श्री मां के माध्यम से अपनी शिक्षा और योग को विश्व भर में फैलाने का निर्णय किया।

“श्री मां ने पुडुचेरी में ही 1960 में अरविन्द सोसायटी की स्थापना की। इसका उद्देश्य लोगों तक श्री अरविन्द के उद्देश्यों, आदर्शों और योग की पद्धति को पहुंचाना था।”

पुडुचेरी में ही 1960 में अरविन्द सोसाइटी की स्थापना श्री मां ने की थी। इसका उद्देश्य है सदस्यों तथा अन्य लोगों को श्री मां और श्री अरविन्द के उद्देश्यों, आदर्शों और पूर्णयोग की पद्धति से अवगत कराना।

यह एक अन्तरराष्ट्रीय लाभ निरपेक्ष,आध्यात्मिक, शैक्षणिक तथा सांस्कृतिक संस्था के रूप में जानी जाती है। इसी क्रम में दिल्ली स्थित अरविन्द सोसाइटी की स्थापना हुई।

1974 में यहां पहला ब्लॉक बना। आज यहां सभी तरह के योगाभ्यास करवाए जाते हैं। इस ब्लॉक का नाम यूथ सेंटर है। यहीं हमारी मुलाकात सोसाइटी की निदेशक शमा कपूर से हुई।

वे बताती हैं कि महर्षि अरविन्द का योग हमे शारीरिक योग से अलग ले जाता है। यह कहा जा सकता है कि यह क्रिया आत्मा को परमात्मा से मिलाने की प्रक्रिया है। ध्यान की अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं।

श्री अरविन्द वही सिखाते हैं।

ईश्वर के सभी रूपों और चरित्रों को अपनाते हुए या स्वीकारते हुए आत्मा को परमात्मा से मिलाने की प्रक्रिया अरविंद सिखाते हैं। उदाहरण के तौर पर आप समझ लें कि अगर कोई घर हम बनाते हैं तो उसकी छत को सहारा देने के लिए नीचे बांस लगाते हैं।

लेकिन जब छत पूरी तरीके से पक्की हो जाती है तो उस सहारे को हम हटा लेते हैं। इसके बाद वह अपने मूल रूप में आ जाती है। श्री अरविन्द का ऐसा ही कुछ कहना है जिसमें मन को पहले किसी आधारभूत संरचना से भेज दिया जाता है।

“यहां आयुष मंत्रालय की निर्धारित गाइडलाइन के आधार पर ही व्यायाम और योग कराए जाते हैं। आयुष मंत्रालय ने जो निर्देश दिए हैं उसके ही आधार पर कक्षाओं में योग सिखाये जा रहे हैं।”

उसके बाद मन खुद-ब-खुद इतना मजबूत हो जाता है कि वह सीधे परमात्मा के संपर्क में आ जाता है। अगर व्यक्ति परमात्मा से सीधे संपर्क में आ जाता है तो फिर समझिए कि उसने सब कुछ पा लिया है। परमात्मा के संपर्क में आने के पहले जो योग प्रक्रिया की जाती है वह बेशक ही कठिन है।

श्री अरविन्द कहते हैं कि उत्तरजीविता का सिद्धांत मानव शरीर या मानव विकास पर हमेशा लागू रहता है। जब डार्विन का सिद्धांत याद किया जाता है,तो मनुष्य के विकास की पूरी एक प्रक्रिया सामने आती है।

शुरू में मनुष्य इतना जानकार नहीं था। लेकिन विकसित होते-होते एक समय आया कि वह बहुत आगे निकल गया। क्या यही मनुष्य के विकास का अंत है? नहीं। मनुष्य को या यूं कहें हमें इसके ऊपर भी पहुंचना होगा। वह टेक्नोलॉजी या विज्ञान की बात नहीं है। वह परमात्मा से जुड़े ज्ञान की बात है।

शमा कपूर कहती हैं कि इसी बात को आगे बढ़ाने के लिए हम दिल्ली में कुल पांच योग से जुड़ी कक्षाएं चला रहे हैं। इसी क्रम में आईआईटी दिल्ली में भी हम योग की कक्षाएं चला रहे हैं।

यहां से बच्चे निकलकर पूरे विश्व में पहुंच रहे हैं। यही वजह है कि हमने आईआईटी दिल्ली को अपने केंद्र में रखा है।आधुनिक दिनचर्या में यह देखा जाता है कि बच्चों में निश्चित रूप से कोई न कोई बीमारी जन्म ले ही लेती है।

इस भाग दौड़ की जिंदगी में यह जरूरी है कि हम योग से जुड़ें और इसे दिनचर्या में शामिल करें। दिल्ली के ही ग्रेटर कैलाश में भी हम अरविन्द से जुड़ी योग की कक्षाएं चला रहे हैं। बहुत ही बेहतर परिणाम हमको देखने को मिले हैं।

काफी संख्या में इसके ईद-गिर्द रहने वाले लोग हमसे जुड़े हैं। वह योग सीखना चाह रहे हैं। यह देख कर अच्छा लगता है कि योग के प्रति लोगों में दिन प्रतिदिन रुझान बढ़ा है।

हमारे यहां आयुष मंत्रालय की निर्धारित गाइडलाइन के आधार पर ही व्यायाम और योग कराए जाते हैं। आयुष मंत्रालय ने जो निर्देश दिए हैं उसके ही आधार पर कक्षाओं में योग सिखाये जा रहे हैं। इसके अंतर्गत प्राणायाम, मेडिटेशन और व्यायाम करवाए जाते हैं यानी कि हर स्तर पर शरीर की एक योग प्रक्रिया चलती है।

शमा बताती हैं कि युवाओं को ध्यान में रखते हुए हम विशेष कार्यक्रम पूरे साल चलाते रहते हैं। चूंकि योग दिवस आने वाला है। इस दिन को की भारत एक पर्व के रूप में मनाता है। इसलिए हम इस एक महीने में योग की विशेष कक्षाएं चला रहे हैं।

इसमें हम 21 मई से 21 जून तक तीन   सत्रों में बांटकर योग की कक्षाएं चला रहे हैं। आज भारत भर में श्री अरविन्द से जुड़े 79 आश्रम हैं। हम योग दिवस के अवसर पर श्री अरविन्द की शिक्षाएं अपने हर उन स्थानों पर पहुंचाएंगे जहां-जहां अरविन्द से जुड़े योग की कक्षाएं चलती हैं।

हम इन स्थानों पर अरविन्द से जुड़े और उनकी योग और क्रिया से जुड़ी पुस्तकों का निशुल्क वितरण भी करेंगे। साथ ही साथ योग के लाभ और उसके आयामों के बारे में हम लोगों को शिक्षित करेंगे।

उनका कहना यह भी है कि पिछले कुछ सालों से योग लोगों की दिनचर्या का हिस्सा जरूर बना है जो हमारे लिए एक शुभ संकेत है। हमने इस बार योग दिवस के अवसर पर 1000 लोगों को योग करवाने का लक्ष्य रखा है। हम लगातार लोगों से संपर्क कर रहे हैं और योग दिवस पर एक सफल कार्यक्रम कराने के लिए लिए लगे हुए हैं।

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श्वेतांक पांडेय युवा पत्रकार हैं। इन दिनों हिन्दुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी से जुड़े हैं।

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