परंपरा की खोज करती पहल

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गांवों को समृद्ध बनाने की नई योजना तैयार हुई है। नाम है- ‘ग्राम संकुल योजना’। इस पर गहन बातचीत का दौर चल रहा है। इसी कड़ी में पिछले पखवाड़े मथुरा में तीन दिनों की बैठक भी हुई।

ग्राम संकुल योजना को जमीन पर उतारने में जो लोग जुटे हैं, उनमें एक नाम डॉ. महेश शर्मा का है। वे इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से हैं, लेकिन ग्रामीण विकास के क्षेत्र में अभिनव प्रयोग करते रहे हैं। वे बताते हैं, ”स्थानीय परिस्थिति के अनुरूप आठ से दस गांवों का एक समूह या संकुल गठित किया जाएगा, जहां सामुदायिक पहल के साथ संकुल के सर्वांगीण विकास को लेकर ठोस प्रयास किए जाएंगे।”

दरअसल, एक लंबी बहस और विचार-विमर्श के बाद ग्राम संकुल योजना की कल्पना की गई है। सूत्र बताते हैं कि अगस्त 2014 के आखिरी हफ्ते एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी, जिसमें विभिन्न सामाजिक संगठनों के करीब 40 लोग शामिल हुए थे। बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महत्वपूर्ण लोग भी थे।

उस  बैठक में इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई थी कि शहरीकरण को ही विकास का पर्याय मान लिया गया है। एक तरफ शहरों का दबदबा बढ़ा है, जबकि गांव दिनों-दिन कमजोर हो रहे हैं। गांवों से जुड़े मुद्दे भी दब गए हैं। इस पर कहीं कोई बहस नहीं हो रही है।

इस संबंध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने कहा है, ”ग्राम विकास के पीछे हमारी स्पष्ट सोच है कि शासन की गलत नीतियों के कारण इस क्षेत्र में जो क्षरण हुआ है यदि वह अभी नहीं रुका और उसके स्थान पर व्यावहारिक विकल्प प्रस्तुत नहीं किया गया तो समाज जीवन का भारी नुकसान होना तय है।” इसके बाद ही एक कार्य-योजना तैयार हुई है, जिसमें ग्राम-संकुल की परिकल्पना की गई।

ग्राम संकुल योजना को लेकर आरएसएस के प्रमुख अधिकारी डॉ. बजरंग लाल गुप्त कहते हैं, ”गांधीजी ने ग्राम स्वराज की बात कही थी और प्रत्येक गांव को स्वावलंबी बनाने की कल्पना की थी। लेकिन, परिवहन और संचार के इस युग में लोगों की नई आवश्यकताएं पैदा हो गई हैं। इस स्थिति में एक अकेले गांव का स्वावलंबी हो पाना संभव नहीं लगता। इसलिए 10-15 गांवों को मिलाकर ग्राम-समूहों की रचना करनी होगी।”

हालांकि, इस बात का दावा किया गया है कि ग्राम-संकुल कोई नई परिकल्पना नहीं है, बल्कि एक समय भारतीय ग्रामीण समाज की यह स्वाभाविक इकाई होती थी। पीठ, मंडी, बाजार आदि के रूप में इसकी पहचान थी और यही गांवों के आर्थिक और सामाजिक केंद्र हुआ करते थे। लेकिन, प्रशासनिक इकाई के रूप में विकास प्रखंड के गठन से स्वाभाविक इकाई का अस्तित्व धीरे-धीरे खत्म हो गया।

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”हम ऐसे ग्राम-संकुल की कल्पना कर रहे हैं, जो आर्थिक स्तर पर टिकाउ और तकनीकी स्तर पर व्यावहारिक हो।”- डॉ. महेश शर्मा

डॉ. महेश शर्मा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में अपनी बात रखते हैं। वे कहते हैं, ”भारत की योजना-प्रक्रिया की समीक्षा करते हुए देश के पहले सामुदायिक विकास मंत्री एस.के.डे ने साफ-साफ कहा था कि परंपरागत ग्राम-संकुलों की उपेक्षा एक बड़ी भूल थी। यदि गांवों को मजबूत करना है तो हमें अपनी गलतियों को सुधारना होगा।”

दुर्भाग्य से अब तक कोई सरकार इस तरफ ध्यान नहीं दे पाई है। गांव उनकी नजरों से उपेक्षित ही रहा है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने भी ‘स्मार्ट सिटी’ की कल्पना की है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोग से नई पहल हुई है।

ग्राम संकुल योजना को लेकर आरएसएस के प्रमुख अधिकारी डॉ. बजरंग लाल गुप्त कहते हैं, ”गांधीजी ने ग्राम स्वराज की बात कही थी और प्रत्येक गांव को स्वावलंबी बनाने की कल्पना की थी। लेकिन, परिवहन और संचार के इस युग में लोगों की नई आवश्यकताएं पैदा हो गई हैं। इस स्थिति में एक अकेले गांव का स्वावलंबी हो पाना संभव नहीं लगता। इसलिए 10-15 गांवों को मिलाकर ग्राम-समूहों की रचना करनी होगी।”

वे आगे कहते हैं, ”हम ऐसे ग्राम-संकुल की कल्पना कर रहे हैं, जो आर्थिक स्तर पर टिकाउ और तकनीकी स्तर पर व्यावहारिक हो।” फिलहाल देश भर में उन स्थानों की पहचान की जा रही है, जहां पिछले चार-पांच सालों से सामुदायिक सहभागिता के साथ लोग काम कर रहे हैं, ताकि उस क्षेत्र में ग्राम संकुल के प्रारंभिक प्रयोग किए जा सकें।

ग्राम संकुल के चयन के लिए 11 बिंदुएं निश्चित की गई हैं। कृषि, उद्योग, ऊर्जा, जल प्रबंधन, गो सेवा, शिल्पी-कारीगरी आदि से जुड़े विशेषज्ञों से संपर्क किया जा रहा है, जिससे योजना को मजबूत आधार के साथ आगे बढ़ाया जा सके।

डॉ. शर्मा मानते हैं कि संकुल का काम प्रभावी ढंग से चला तो पलायन रुकेगा, साथ ही वे लोग भी वापस लौट आएंगे जो केवल मजदूरी के लिए गांव से पलायन कर गए हैं। उन्हें विश्वास है कि अच्छे संकुल दो-तीन सालों में ही अपना प्रभाव दिखाने लगेंगे। वैसे यह देखने वाली बात है कि गांवों को स्वावलंबी बनाने की कोशिश कहां तक सफलता होती है? यदि सफल संकुल के एक-दो उदाहरण भी सामने आए हैं, तो निश्चित ही उसमें विकास की धारा मोड़ने की क्षमता होगी।

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