पत्रकारिता के बदलते आयाम

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धुनिक भारतीय  पत्रकारिता का इतिहास देश की आजादी के संघर्ष की कहानी है। कुछ देशभक्तों ने ही पत्रकारिता को देश की आजादी का हथियार बनाया था।

इसलिए हमारी पूरी पत्रकारिता त्याग और बलिदान की भावना से ओत-प्रोत रही है। आज उनकी जगह कुछ बौने पत्रकारों ने ले ली है और उनका उपयोग अधिसंख्य धन्नासेठ अपने हितों और उद्देश्यों के लिए कर रहे हैं।

हमारी इस पत्रकारिता की स्वतंत्रता की सीमा वहीं तक है जहां तक प्रकाशकों के अपने हित नहीं टकराते। इसके बावजूद आज भी ‘मीडिया’ से जनता को बहुत उम्मीदें हैं। हमारे सामने एक चुनौती है, वह यह कि पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और तकनीक के साथ हम कितना बदल पाएंगे।

अतीत की बात करें तो राजा राम मोहन राय, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, राजा शिव प्रसाद, पं. बद्रीनारायण उपाध्याय, पं. प्रताप नारायण मिश्र, पं. अम्बिकादत्त व्यास, गणेश शंकर विद्यार्थी और बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसी अनेक महान आत्माओं ने अपनी प्रतिभा और ओज के बल पर भारतीय अथवा हिन्दी पत्रकारिता की नींव तैयार की।

पंडित बाबूराव विष्णु पराड़कर देश के उन महान पत्रकारों में से एक थे जिन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को न केवल नई दिशा दी बल्कि उसके स्वरूप को निखारा भी।

उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में 1906 में पदार्पण किया और अपने अन्तिम समय 12 जनवरी 1955 तक इस क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे। हिन्दी पत्रकारिता के ये 50 वर्ष युगान्तकारी रहे हैं।

“हमारे सामने एक चुनौती है, वह यह कि पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और तकनीक के साथ हम कितना बदल पाएंगे।”

उन्होंने बंगवासी, हितवार्ता, भारत मित्र, आज, कमला तथा संसार का सम्पादन कर राष्ट्र, समाज, साहित्य और संस्कृति की महान सेवा की। वे न केवल महान संपादक रहे बल्कि महान क्रान्तिकारी भी थे।

स्वाधीनता संग्राम को अग्रसर कर ब्रिटिश शासकों को चुनौती देने वाली ‘रणभेरी’ क्रान्तिकारी पत्रकारिता के इतिहास में स्मरणीय रहेगी और नई पीढ़ी के पत्रकारों को प्रेरणा देती रहेगी।

राष्ट्र के राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक नवजागरण में पराड़कर के लेखों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हालांकि उन्होंने पत्रकारिता के इस पतन की पहले ही कल्पना कर ली थी।

हिन्दी पत्रकारिता के सम्बन्ध में जो भविष्यवाणी की थी, वह आज सच हो रही है। उन्होंने उसी समय कहा था कि स्वाधीनता के बाद समाचार पत्रों पर विज्ञापन एवं पूंजी का प्रभाव बढेगा और संपादकों की स्वतंत्रता सीमित हो जाएगी।

उनके शब्दों में ‘भावी हिन्दी समाचार पत्रों में भी ऐसा ही होगा। पत्र निकाल कर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनियों अथवा सुसंगठित कम्पनियों के लिए संभव होगा।

पत्र सर्वांग सुन्दर होंगे, आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक चित्रों से सुशोभित होंगें, लेखों में विविधता होगी, कल्पनाशीलता होगी, गंभीर गद्यांश की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी, ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी।

यह सब कुछ होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण सम्पादकों की नीति न होगी। इन गुणों से सम्पन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जाएंगे, सम्पादक की कुर्सी तक उनकी पहुंच भी न होगी।’

उनकी यह भविष्यवाणी अक्षरश: सत्य प्रमाणित हो रही है। पराड़कर के अनुसार पत्रकारिता का तो दो ही मुख्य धर्म है- एक समाज का चित्र खींचना, दूसरे लोक शिक्षण द्वारा उसे सही दिशा दिखाना।

“अखबार के दफ्तर के बारे में सोचें तो इधर-उधर बिखरे कागजों के ढेर और उनके बीच डेडलाइन के दबाव में काम कर रहे पत्रकारों की तस्वीर ही सामने आती है। ”

सदाचार को बढ़ावा देकर कुरीतियों को दबाने का प्रयत्न करना चाहिए। पत्र बेचने के लाभ में अश्लील समाचारों, चित्रों को महत्व देकर तथा दुराचरण मूलक अपराधी का आकर्षक वर्णन कर हम अपराधियों से भी बड़े अपराधी ही होंगे।

आखिरकार राष्ट्र की दशा सुधारने और दिशा देने का कार्य तो नेता और पत्रकार का ही होता है। वास्तव में सार्वजनिक जीवन को राह दिखाने वाले संस्थानों में फैल रहा ‘क्षय रोग’ कहीं अधिक गहरा है जिसका उनके पास या सार्वजनिक जीवन में कहीं किसी के पास भी इलाज नजर नहीं आता है।

आज कई तथाकथित सेकुलर पत्रकार खबरों को अपने निजी एजेंडे के तहत पेश करते हैं। वे कानून व्यवस्था से जुड़ी किसी घटना को भी अल्पसंख्यक या दलित नजरिये से पेश करके सामाजिक समरसता को बिगाड़ने का काम करते हैं।

अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए वे खबरों को किसी भी हद तक जाकर तोड़ने-मोड़ने में संकोच नहीं करते हैं। आज इलेक्ट्रानिक चैनलों और इंटरनेट के माध्यम से हमारी पहुंच का दायरा बढ़ा है। इसलिए वह पहले से भी ज्यादा प्रभावी बन गया है।

हमें किसी भी घटना की कुछ ही मिनटों के बाद जानकारी मिल जाती है। पर यह घटना क्यों घटी और इसके समाधान के लिए क्या कदम उठाये जाने चाहिए थे, जो नहीं उठाए गए, इन सब मामलों पर इन चैनलों पर बहस का सिलसिला भी शुरू हुआ है।

कुछ हद तक इलेक्ट्रानिक चैनल अपनी जिम्मेदारी को निभाने की कोशिश भी कर रहे हैं। कई क्षेत्रों में उनकी भूमिका शानदार रही है। लेकिन मूलभूत समस्याओं को उजागर करने में अभी वे बहुत पीछे हैं।

इसमें संदेह नहीं कि आज पत्रकारिता के आयाम बदल चुके हैं किन्तु उनका मूलभूत उद्देश्य नहीं बदला जा सकता है।अखबार के दफ्तर के बारे में सोचें तो इधर-उधर बिखरे कागजों के ढेर और उनके बीच डेडलाइन के दबाव में काम कर रहे पत्रकारों की तस्वीर ही सामने आती है।

इस पर हाइटेक युग में अब जल्द ही अखबार के दफ्तरों की तस्वीर बदलने वाली है। भविष्य के हाइटेक अखबारों में समाचार संपादक की जगह रोबोट ले लेंगे और पारंपरिक समाचार कक्षों की जगह ऐसे न्यूज रूम ले लेंगे जो किसी अंतरिक्ष यान के कंट्रोल डेक के समान लगेंगे।

इस तरह के प्रयोगात्मक समाचार कक्षों का निर्माण बाकायदा शुरू भी हो चुका है। इन न्यूज रूम का नियंत्रण तकनीकी रूप से दक्ष समाचार निदेशकों के हाथों में होगा, जो अखबारों, इंटरनेट, टेलीविजन, फैक्स, ई-मेल, मोबाइल फोन और हथेली पर रख सकने वाले कम्प्यूटरों को दुनिया भर की सूचनाएं भेजेंगे।

‘कम्प्यूरीकृत न्यूजवेट्स’ रोजमर्रा की घटनाओं पर संपादकीय फैसले करेंगे और बाकी का स्टाफ दुनिया भर के अनगिनत मीडिया स्रोतों के जरिए ताजातरीन खबरों को ढूंढने के काम में लगा होगा।

इन बीच न्यूज रूम से जुड़े उच्च प्रशिक्षित ‘ई-लैसर्स’ अखबार और टीवी के संवाददाताओं द्वारा मौके से भेजी गई खबरों और वीडियो क्लिपिंग को तुरन्त  उपलब्ध कराते रहेंगे।

भविष्य में इन हाइटेक समाचार कक्षों की तस्वीर कुछ साल पहले हांगकांग में ‘वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूजपेपर्स’ के वार्षिक सम्मेलन में संपादकों और मीडिया के अधिकारियों के सामने पेश की गई थी।

इसमें कोई शक नहीं कि बदलते दौर में जिस तरह के तकनीकी बदलाव आ रहे हैं उन्हें देखते हुए भविष्य के डिजिटल युग के पत्रकारों को भी खुद को उसी के अनुरूप ढालना पड़ेगा।

आने वाला दौर ऐसे तेजतर्रार पत्रकारों का होगा जो इतने दक्ष हों कि एक ही समय में कई तरह के कामों को एक साथ अंजाम दे सकें। यानि वे एक ही समय में नेट सर्फिंग करने के साथ ही टीवी भी देखते रहें और फोन पर बात करने के साथ-साथ अपने मनपसंद संगीत का आनंद भी लेते रहें।

उस युग में इधर-उधर से चुराकर कलम से लिखने वाले और समाचार को सूंघने की क्षमता रखने वाले पत्रकारों की कोई जगह नहीं रह जाएगी। यूएससी के ‘सेंटर फॉर मास कम्युनिकेशंस रिसर्च’ के निदेशक डॉ0 लिन जोक कहते हैं, ‘अखबारों में काम करने वाले कुछ पत्रकार बदलते समय के साथ खुद को ढाल लेने में माहिर हैं  फिर भी कई संपादक अपने स्टाफ से उनके रवैये में और लचीलापन लाने की अपेक्षा रखते हैं।

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