पंचायत बने तीसरी सरकार

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संविधान में 73वें संशोधन से पंचायत प्रणाली को नया कलेवर मिला। यह समझा गया कि इससे सत्ता गांव में पहुंच जाएगी। ऐसा अगर हो जाता तो भारत की प्राचीन पंचायत प्रणाली नए रूप में स्थापित हो जाती जिससे हर गांव स्वशासित हो जाता। यही सपना महात्मा गांधी का था। स्वशासन का मतलब है गांव की सरकार।

उसी तरह जैसे भारत सरकार है या प्रदेश की सरकार है। हर सरकार के अधिकार क्षेत्र हैं। लेकिन 73वें संविधान संशोधन से गांव-गांव में जो तीसरी सरकार यानी अपने गांव की सरकार बननी चाहिए थी वह अब तक नहीं बनी है। पंचायत प्रणाली के अध्येता और विशेषज्ञ डॉ चंद्रशेखर प्राण अपने इस लेख में बता रहे हैं कि गांव की सरकार बनने के रास्ते में कहां-कहां अड़चनें हैं और  उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है।

भारत के गांव सांस्कृतिक ईकाई हैं। गांव परिवार और पड़ोस से मिलकर बनता है। इसका जो स्वरूप प्रारंभिक रूप में विकसित हुआ, वही गांव समाज है। इस गांव समाज की व्यवस्था के बेहतर संचालन के लिए जनसामान्य ने जो सहज पद्धति अपनाई, उसे ही पंचायत कहा गया।

“आज की तारीख में पंचायतें स्वयं एक सरकार के रूप में कार्य न करके केवल पहली तथा दूसरी सरकार की एजेंसी मात्र बनकर रह गई हैं। उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पंचायतों को संशोधन द्वारा संवैधानिक ढांचा तो मिल गया।”

पंचायत ने शताब्दियों से गांव समाज को, और प्रकारांतर से भारत की संस्कृति को सुरक्षित और संवर्धित किया है। गांव समाज प्रारंभिक काल से ही स्वराज्य व स्वावलंबन के लिए इसी पंचायत पद्धति को आधार बनाता रहा है।

आजादी के बाद जब देश का संविधान बनना तय हुआ, तभी महात्मा गांधी ने जमीनी स्तर पर आजादी व लोकतंत्र को आम आदमी के जीवन का उपयोगी अंग बनाने के लिए पंचायत को आधार के रूप में लेने की बात कही थी। लेकिन कुछ कारणों से यह संभव नहीं हो सका।

संविधान सभा में एक लम्बी बहस के बाद इस विषय को भविष्य के लिए छोड़ते हुए नीति निर्देशक तत्वों के अन्तर्गत शामिल करके राज्य के ऊपर छोड़ दिया गया। किन्तु संविधान सभा ने पंचायत को एक नई संवैधानिक पहचान देते हुए इसे ‘सेल्फ गवर्नमेंट’ अर्थात अपनी सरकार के रूप में चिह्नित कर दिया था।

इस तरह 26 जनवरी 1950 को भारत का जो संविधान लागू हुआ, उसमें दो सरकारों का प्रावधान किया गया। संविधान के भाग-5 में संघ (केन्द्र सरकार) तथा भाग-6 में राज्य ‘सरकार’ का विस्तृत प्रावधान है। लम्बे समय तक इन्हीं दोनों सरकारों द्वारा देश का शासन चलता रहा। वर्ष 1992 में 73वें संविधान संशोधन द्वारा एक और सरकार का प्रावधान किया गया है।

संविधान के भाग-9 के अन्तर्गत पंचायत तथा 9 (क) के अंतर्गत नगरपालिका के रूप में अपनी सरकार (सेल्फ गवर्नमेंट) का प्रावधान कर दिया गया है। नीति निर्देशक तत्व के अंतर्गत अनुच्छेद 40 में भविष्य की जो संकल्पना की गयी थी, एक तरह से उसे ही समय और परिस्थिति की मांग एवं दबाव के फलस्वरूप मूर्त रूप देना पड़ा।

“पंचायतों को ‘सरकार’ के रूप में इसके लिए प्रतिष्ठित किया गया था कि जमीनी आवश्यकता और परिस्थिति के अनुसार जनभागीदारी के साथ स्थानीय स्तर पर योजना बनाई जा सके और उसे उसी स्तर पर क्रियान्वित किया जा सके।”

इस प्रकार संविधान में किये गये संशोधन के द्वारा पंचायत, केन्द्र और राज्य के बाद स्पष्ट रूप से ‘तीसरी सरकार’ है। हालांकि एक सरकार के रूप में उसके अधिकारों में कमी जरूर है लेकिन अवधारणा एवं प्रारंभिक स्तर पर यह तीसरी सरकार है जिसमें जनता सीधे-सीधे भागीदारी कर सकती है।

अपनी आवश्यकता पर विचार करके निर्णय ले सकती है और अपनी सीमा में इस निर्णय को क्रियान्वित भी कर सकती है। संविधान के अनुच्छेद 243 (छ) के अंतर्गत यह व्यवस्था की गयी है कि किसी राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा पंचायतों को ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान कर सकेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने में समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हो।

चूंकि संविधान के अनुसार तीनों स्तर की पंचायतें मुख्य रूप से चुने हुए प्रतिनिधियों के द्वारा गठित होती हैं|। अत: यह अधिकार और दायित्व प्रकारांतर से चुने हुए प्रतिनिधियों को सामूहिक रूप से प्राप्त होते हैं।

सामान्यत: पंचायतें अपने दायित्व का निर्वहन अपनी समितियों के माध्यम से करती हैं, इन्हें पंचायत की स्थायी समिति, उपसमिति जैसे नामों से सम्बोधित किया जाता है। इनका प्रावधान सामान्यत: तीनों स्तरों की पंचायतों में होता है।

सभी राज्यों में समितियों के माध्यम से ही पंचायतें अपने दायित्व का निर्वहन करती हैं। वैसे समितियों के नाम, संख्या, गठन, अधिकार आदि के सम्बन्ध में राज्यों के बीच एकरूपता तो नहीं है। लेकिन सभी राज्यों के अधिनियमों में इसका प्रावधान है।

उदाहरण के लिए यदि उत्तर प्रदेश में 6 समितियां हैं तो बिहार में 4, झारखंड में 7, कर्नाटक में 3, मध्य प्रदेश में 3, हरियाणा में 5 का प्रावधान हैं। इनमें से कुछ समितियों का सभापति प्रधान अथवा सरपंच स्वयं होता है, शेष का सभापति कोई न कोई सदस्य होता है। सामान्यत: एक समिति में 4 से 6 सदस्य होते है।

राज्य के पंचायती राज अधिनियमों में इन्हीं समितियों को योजनाओं के क्रियान्वयन का दायित्व सौंपा गया है तथा उसी के सापेक्ष अधिकार भी दिए गए। चूंकि ये समितियां सदस्यों के समूह से बनती हैं अत: इन्हीं के माध्यम से सदस्यों को सामूहिक अधिकार प्राप्त होता है।

वास्तव में यह व्यवस्था ग्राम पंचायत, ब्लॉक पंचायत अथवा जिला पंचायत के चुने हुए सदस्यों को क्रियान्वयन की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से जोड़ने तथा भागीदार बनाने की दृष्टि से किया गया है।

ग्यारहवीं अनुसूची के माध्यम से जिन 29 विषयों को पंचायती राज संस्थाओं को सौंपा गया है, उसमें मानव विकास और सामाजिक विकास के विषय मुख्य रूप से शामिल किये हैं। संरचनागत विकास का कार्य भी उसे सौंपा गया है लेकिन यह दूसरे दर्जे पर है। यह अलग बात है कि पंचायतें ढांचागत निर्माण के कार्यों में ही पूरी तरह से लग गयी हैं।

मानव और सामाजिक विकास के मुद्दे उनके लिए गौण हो गए हैं। वास्तव में संविधान संशोधन के बावजूद आज की तारीख में पंचायतें स्वयं एक सरकार के रूप में कार्य न करके केवल ‘पहली तथा दूसरी सरकार’ की एजेंसी मात्र बनकर रह गई हैं। उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पंचायतों को संशोधन द्वारा एक संवैधानिक ढांचा तो मिल गया।

लेकिन सरकार के रूप में कार्य करने हेतु जो संवैधानिक अधिकार प्राप्त होना चाहिए था, उसे राज्यों के विधानमंडलों के रहमोंकरम पर छोड़ दिया गया। परिणामस्वरूप केरल और पश्चिम बंगाल जैसे कुछ राज्यों ने तो पर्याप्त अधिकार सौंपे। लेकिन अधिकांश राज्यों ने इसमें बड़ी कोताही बरती है।

यह परिस्थिति इस कारण निर्मित हुई है कि आजादी के बाद संविधान निर्माण में 1935 के इंडिया एक्ट के एक बड़े हिस्से को यथावत स्वीकार कर लिया गया था। इसी में केंद्र और राज्य सरकार के बीच विषयों के वितरण का भी प्रावधान शामिल था। उसे हम आज संविधान की 7वीं अनुसूची के रूप में जानते हैं।

इस सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्य के बीच विषयों का बंटवारा किया गया है। स्थानीय शासन को एक विषय के रूप में राज्य की सूची में शामिल किया गया है। जबकि संविधान के अनुच्छेद 40 में ग्राम पंचायतों को ‘सेल्फ गवर्नमेंट’ के रूप में दायित्व सौंपने की जिम्मेवारी केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को सौंपी गई है।

इसी के चलते 1989 में नए पंचायती राज का 64वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित हो जाने के बावजूद राज्यसभा में पारित नहीं हो पाया था। क्योंकि उस समय पंचायतों को अधिकार सौंपने का स्पष्ट प्रावधान किया गया था।

उसका राज्यों ने पुरजोर विरोध करते हुए इसे राज्यसभा में पारित नहीं होने दिया। 1992 में जब यह अधिकार पूरी तरह से राज्य के विधानमंडलों की इच्छा पर छोड़ दिया गया, तब जाकर यह पारित हुआ।

यहां एक तथ्य और भी उल्लेखनीय है कि 73वें संविधान संशोधन में अनुच्छेद 243(छ) में पंचायतों को दो कार्य सौंपे गए हैं। प्रथम यह कि उसे आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएं तैयार करनी है तथा दूसरा कि वह केंद्र और राज्य सरकार की ऐसी योजनाओं को भी क्रियान्वित करंेगी जो उनके 29 विषयों से सम्बंधित हैं।

इसमें से पहला कार्य सही अर्थों में उसके सरकार होने का कार्य है। दूसरा कार्य एजेंसी का कार्य है जो पहली और दूसरी सरकार के लिए करना है। आज की तारीख में पंचायतें सिर्फ एजेंसी का कार्य कर रही हैं।

उन्हें सरकार के रूप में इसके लिए प्रतिष्ठित किया गया था कि जमीनी आवश्यकता और परिस्थिति के अनुसार जनभागीदारी के साथ स्थानीय स्तर पर योजना बनाई जा सके और उसे उसी स्तर पर क्रियान्वित किया जा सके।

समावेशी और टिकाऊ विकास की यही पहली शर्त भी है। लेकिन विगत 25 वर्षों की इस यात्रा में पंचायतें अपने इस दायित्व के निर्वहन से कोसों दूर खड़ी हैं। उन्हें न तो इसके लायक बनाया गया और न तो सही अवसर और पर्याप्त साधन मुहैया कराये गए। पंचायतें सही अर्थों में तीसरी सरकार के रूप में प्रतिष्ठित हो सकें, इसके लिए भारत सरकार के स्तर से निरंतर प्रयास किया जाता रहा है। लेकिन राज्य सरकारें बड़े पैमाने पर उदासीन रही हैं।

इस दिशा में 1999 में भारत सरकार के तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री बाबा गौड़ा पाटिल का वह पत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है जो उन्होंने 17 मार्च 1999 को देश के सभी मुख्यमंत्रियों को भेजा था। उन्होंने पत्र की शुरुआत ही इससे की थी कि ‘ग्राम पंचायतों को स्वशासन की इकाई के रूप में गठित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 40 के निर्देश के बावजूद अब तक हुई प्रगति पर्याप्त नहीं है।

कथित विकास की धुन ने इस संस्थाओं को मूलत: राज्य सरकारों के शक्तिशाली तंत्र के पिछलग्गू के रूप में कार्य करने के लिए विवश कर दिया।’ इसी पत्र में उन्होंने वास्तविक रूप से पंचायतों की सरकार बनने के लिए लिखा था कि वास्तविक स्वशासन के पंचायतों के कार्यों और शक्तियों का दायरा काफी व्यापक होना चाहिए।

नि:संदेह विकास कार्यक्रम महत्वपूर्ण हैं, परन्तु वे स्वशासन के मर्म नहीं हो सकते। जब तक भूमि और अन्य संसाधनों के प्रबंधन और झगड़ों को निपटाने के अधिकार ग्राम सभाओं को नहीं सौंपे जाते, तब तक वास्तविक स्वशासन नहीं हो सकता।

भारत सरकार के स्तर से पंचायती राज व्यवस्था को संविधान की मंशा के अनुरूप तीसरे स्तर की सरकार के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए समय-समय पर आयोग एवं समूहों का गठन किया जाता रहा है। इसमें द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग तथा इसी सम्बन्ध में वी रामचंद्रन की अध्यक्षता में बने कार्य समूह (वर्ष 2011) की संस्तुति एवं सुझाव महत्वपूर्ण है।

द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने तो भारत सरकार को दी अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से संविधान के अनुच्छेद 243 (छ) जो पंचायतों के प्राधिकार और दायित्व से सम्बंधित है को, पुन: संशोधित करने का सुझाव देते हुए कहा है ‘इस संविधान के प्रावधानों के अधीन राज्य की विधान परिषद कानून द्वारा उपयुक्त स्तर की पंचायत को यथा आवश्यक अधिकार और प्राधिकार सौंपेगी ताकि वे ऐसे सभी कार्यों के सम्बन्ध में स्वशासन संस्थाओं के रूप में अपने कार्य को सम्पन्न कर सकें जो स्थानीय स्तर पर सम्पन्न किये जा सकते हैं।

इसमें 11वीं अनुसूची में सूचीबद्ध मामलों से सम्बंधित कार्य शामिल है।’ उसने संघ एवं राज्य की सभी संगत कानूनों की तत्काल समीक्षा करने तथा उनको तदनुसार संशोधित करने का सुझाव दिया।

उसने संविधान के अनुच्छेद 252, जिसमें दो या अधिक राज्यों के लिए संसद को विधि बनाने की शक्ति दी गई है, का हवाला देते हुए कहा है कि स्थानीय शासनों और समुदायों को अधिकारों, जिम्मेदारियों और कार्यों को हस्तांतरण का विस्तृत सिद्धांत विहित किया जाना चाहिए।

उसमें  पूरकता का सिद्धांत, लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण, सही मायने में सत्ता का हस्तांतरण तथा नागरिक केन्द्रित व्यवस्था को विशेष रूप से शामिल किया गया है। लगभग इसी प्रकार वी रामचंद्रन की अध्यक्षता वाले कार्य समूह ने स्थानीय सरकार के एक मजबूत सिस्टम के विकास को केंद्र में रख कर अपनी संस्तुतियां दी है।

रिपोर्ट के दूसरे चैप्टर में कार्य समूह की यह चिंता कि पंचायत ‘स्थानीय सरकार’ के रूप में दिखाई नहीं पड़ रही है, उसके कारणों का स्पष्ट उल्लेख किया है जिसमें अधिकारों के हस्तांतरण का न होना, केंद्र व राज्य सरकार की ओर से पंचायत के द्वारा समानांतर अन्य संस्थाओं को खड़ा करना, नौकरशाही का नियंत्रण, सिर्फ केंद्र व राज्य की स्कीमों के लिए धन देना तथा राज्य के अधिनियमों में ग्राम सभा को पर्याप्त अधिकार न देना जैसे कारणों को चिह्नित किया है। इन कारणों से मुक्ति का रास्ता भी उसमें सुझाया है।

इसके लिए उसमें अगले 6 वर्षों (2011 से 2017) तक के लिए एक रोड मैप भी तैयार किया था। पंचायत को संविधान के अनुसार सेल्फ गवर्नमेंट अर्थात अपनी सरकार के रूप में सशक्त, सक्षम तथा जवाबदेह बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं तथा ग्राम सभा को मजबूत व अधिकार सम्पन्न करके पंचायत को उसके प्रति उत्तरदायी बनाने के लिए संस्तुति की है।

इसी के साथ पंचायत के लिए कर्मचारियों का अलग से कैडर बनाने, समानांतर संस्थाओं को पंचायती व्यवस्था में विलय करना, 29 विषयों के समस्त कार्य, कर्मी, कोष पंचायतों को सौंपने तथा स्थानीय नियोजन को प्राथमिकता देने पर जोर दिया। साथ ही चुने हुए प्रतिनिधियों की क्षमता और कुशलता के विकास तथा मतदाताओं की जागरूकता पर भी बल दिया है।

वास्तव में 73वें संविधान संशोधन में कई ऐसी कमियां हैं जो अपनी सरकार को सही अर्थों में प्रभावी बनने में बड़ी बाधा के रूप में खड़ी हैं। इन्हें दूर किये बिना गांधी के ग्राम स्वराज्य का सपना अधूरा ही रहेगा। वैसे तो प्रशासनिक सुधार आयोग ने पंचायत के अधिकारों को लेकर अपनी एक सार्थक संस्तुति दी है जिसका पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है।

लेकिन इसके अतिरिक्त कुछ और भी महत्वपूर्ण बिंदु हैं। इस समय संविधान में नए सिरे से जिन बिन्दुओं पर संशोधन करने की आवश्यकता है उसमें अधिकार व दायित्व प्रदान करने का स्पष्ट प्रावधान, पंचायत के विषयों को सातवीं अनुसूची का हिस्सा बनाने, राज्य वित्त आयोग की संस्तुतियों को प्रभावी बनाने, चुने हुए प्रतिनिधियों के विरुद्ध जांच हेतु लोकपाल गठित करने, अलग से पंचायत कैडर बनाने, समानांतर संस्थाओं को समाप्त करने, स्थानीय स्तर पर सुलभ एवं सस्ता न्याय उपलब्ध कराने हेतु न्याय पंचायतों का प्रावधान करने तथा ग्राम सभाओं को अपनी गांव सरकार की विधायिका के रूप में प्रतिष्ठित करने जैसे मुद्दे शामिल हैं।

वैसे तो इनमें से कुछ मुद्दों पर संसद द्वारा अधिनियम भी बनाया जा सकता है। इसमें ‘न्याय पंचायत’ की पुनर्स्थापना तथा ग्राम सभा को  विधायिका के रूप में प्रतिष्ठित करने का मुद्दा प्रमुख है। इससे यह लगता है कि बिना संसद के हस्तक्षेप के पंचायतों को सही अर्थों में तीसरी सरकार अर्थात जनता की ‘अपनी सरकार’ के रूप में विकसित करना पूरे देश में संभव नहीं रह गया।

लेकिन दूसरी ओर केरल जैसे राज्य में पंचायत व्यवस्था कमोवेश तीसरी सरकार के रूप में काम कर रही है और यह स्थिति वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत ही संभव हुआ है। स्पष्ट है कि यदि राज्य विधानमंडल तथा मंत्रिमंडल चाहे तो बड़ी आसानी से यह व्यवस्था ठीक की जा सकती है।

लेकिन संकट यह भी है कि सरकार की नीतियों और उसके क्रियान्वयन का जो तंत्र अब तक विकसित हुआ है, उसमें आम आदमी को सबसे ज्यादा अविश्वनीय माना गया है। लोकमत की अपेक्षा सामान्य सरकारी कर्मचारी का सुझाव ज्यादा महत्वपूर्ण एवं मान्य है। ऐसे में पंचायतों का महत्वहीन होना स्वाभाविक है।

विश्वास की कमी की जो बात है, वह दोनों तरफ से है। एक तरफ सरकार और प्रशासन में बैठे लोग पहले से ही यह मानकर चल रहे हैं कि पंचायत और उनके प्रतिनिधि कुछ कर नहीं सकते। उनके पास समझ नहीं है। कौशल और जानकारी का अभाव है। उत्तरदायित्व के निर्वहन की क्षमता नहीं है।

दूसरी तरफ पंचायत प्रतिनिधि भी अपने आपको सक्षम साबित करने के लिए प्रयास नहीं कर रहे हैं। पंचायत प्रतिनिधियों में जानकारी, समझ तथा कार्यकौशल का बड़े पैमाने पर अभाव है। इसके चलते पंचायत व्यवस्था के प्रति न तो उनमें अपनत्व का भाव आ पा रहा है और न तो उसको कुशलता के साथ संचालित कर पा रहे हैं।

वास्तव में इसका सबसे बड़ा कारण पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रभावी तरीके से संचालित न होना है । भारत सरकार के स्तर से इसके लिए ‘राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान’ जैसा एक अभिकरण तो स्थापित किया गया है।

लेकिन प्रशिक्षण मूलत: राज्य सरकारों की जिम्मेदारी का हिस्सा है। इस विषय में अधिकांश राज्य गंभीर नहीं हैं। इसके चलते पंचायत प्रतिनिधियों में जानकारी व कौशल का बेहद अभाव है।

इस सबके लिए यह भी जरूरी है कि ग्राम सभा को इस व्यवस्था में सर्वाधिक महत्व दिया जाए। वैसे तो भारत सरकार के स्तर पर ग्राम सभा को काफी महत्व दिया गया है। उसके द्वारा गांव के विकास और शासन के लिए बनाये गए अधिनियमों तथा कार्यक्रमों में निर्णय का अधिकार सामान्यतया ग्रामसभा को दिया गया है।

उदाहरण के लिए ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ तथा ‘ग्राम पंचायत विकास योजना’ में निर्णय का पूरा अधिकार ग्रामसभा को दिया गया है। भारत सरकार की तो शुरुआती दौर से ही यह मंशा रही है कि नयी पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत ग्रामसभाओं को वही स्थान व अधिकार प्राप्त हो जो देश की राज्य व्यवस्था में विधायिका को प्राप्त है । लेकिन दूसरी तरफ ग्रामसभा के प्रति लोगों की जागरूकता का स्तर बहुत कमजोर है।

लोगों को ग्रामसभा और ग्राम पंचायत का अन्तर स्पष्ट नहीं है। कई राज्यों में ग्राम पंचायत ग्रामसभा का सुझाव मानने को बाध्य नहीं है। इसलिए ग्रामसभा की बैठकों में उपस्थिति न के बराबर है।

इसके लिए ग्राम पंचायत के स्तर पर यह सुनिश्चित करना होगा कि ग्राम सभा पंचायती राज की सर्वोच्च इकाई बन सके। यह भाव पंचायत के प्रधान तथा उसके सदस्यों के मन में हमेशा होना चाहिए। ग्रामसभा में लोगों की सक्रिय भागीदारी के लिए बैठक की सूचना का प्रभावी प्रसारण तथा सुविधाजनक समय और स्थल का चयन के साथ सभी को आने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

वार्ड सदस्यों को अपने क्षेत्र के मतदाताओं की ग्रामसभा में उपस्थिति एवं सक्रिय भागीदारी हेतु विशेष प्रयास करना होगा तथा उन्हें वार्ड सभाओं के आयोजन का सिलसिला शुरू करना होगा। ग्रामसभा की बैठकों में खुली और सौहार्दपूर्ण चर्चा का ऐसा वातावरण बने कि सभी निर्णय सर्वसम्मति से हों।

मतदाताओं को भी अपने स्तर पर यह सुनिश्चित करना होगा कि वह बैठकों में अवश्य भाग लें। जहां वे समस्या को सही तरीके से उठायें। सार्वजनिक मुद्दों पर बिना भेदभाव के उचित निर्णय सर्वसहमति से करने के लिए प्रयत्न करना होगा।

स्थानीय साधनों के आधार पर कार्ययोजना का निर्माण तथा उसके प्रभावी परिणामपरक क्रियान्वयन की रणनीति बनवाने का प्रयास भी करना होगा। ग्रामसभा को प्रभावी बनाने के लिए लोगों को जागरूक बनाने की जिम्मेदारी सम्बंधित स्वयंसेवी संस्थाओं को लेनी होगी। यह कार्य सरकार के भरोसे पर नहीं छोड़ा जा सकता है।

ग्रामसभा के सशक्तिकरण और उसके माध्यम से तीसरी सरकार अर्थात अपनी सरकार की परिकल्पना को साकार करने का प्रायोगिक कार्य भी नागरिक समाज द्वारा कुछ चुने हुए ग्रामों में करना होगा।

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