न्यू इंडिया के पुराने सपने

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पने हर वक्त बदल रहे हैं, देश बदल रहा है। लेकिन न्यू इंडिया में अब भी बहुत से सपने पुराने हैं। हर हिंदुस्तानी गृहणी का सपना है—पति वैसा ही रोमैंटिक हो जैसा फिल्मों में होता है।

मुझपर प्रेम कविताएं लिखे, लेकिन बॉलकोनी में पड़ोसन के दिखाई देते ही आंखे फेर ले। शाम को दफ्तर से घर आए तो हाथों में फूलों का गजरा हो, मुझे देखकर कोई गीत गुनगुनाए और फिर मना करने के बावजूद कैंडिल लाइट डिनर पर ले जाए।

लेकिन अगर रेस्तरां में आलिया भट्ट जैसी कोई लड़की ठीक सामने बैठी नजर आ गई तो? तो फिर मेरा रोमैंटिक पति एकदम मर्यादा पुरुषोत्तम बन जाए। अगर देखे भी तो भातृभाव से। पति रोमैंटिक चाहिए लेकिन विद टर्म एंड कंडीशंस।

पुराने ख्वाब नए जमाने के पतियों की आंखों में भी हैं। यू नो आई एम व्हेरी प्रोग्रेसिव। हरेक औरत को अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। बीवी अगर करियर वुमेन हो तो समाज में इज्जत बढ़ती है, परिवार की माली हालत भी अच्छी रहती है।

“हरेक औरत को अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। बीवी अगर करियर वुमेन हो तो समाज में इज्जत बढ़ती है, परिवार की माली हालत भी अच्छी रहती है।”

नौकरी करना और करियर पर ध्यान देना बहुत जरूरी है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि घर के काम-काज पर असर पड़े। घर आखिर औरत से ही बनता है।

मानता हूं कि दाल में नमक एक दिन गलती से ज्यादा पड़ सकता है लेकिन रोज-रोज ऐसी गलती थोड़े ना होनी चाहिए। मेरी मां साल में तीन महीने के लिए ही तो आती हैं, अगर थोड़ी सी सेवा चाहती हैं तो इसमें गलत क्या है?

मां ने उम्रभर दादी की सेवा की, उनके ताने सहे और कभी उफ तक नहीं किया। सपने  पुराने हैं, बस वक्त के साथ थोड़े कस्टमाइज्ड हो गए हैं। औरत हमेशा केयरिंग जीवनसाथी चाहती है लेकिन वही केयरिंग आदमी अगर अपनी मां और बहन का भी ख्याल रखने लग जाए तो मामला केयरिंग से डेयरिंग हो जाता है।

आधुनिक नर-नारी दोनों पुराने लेकिन कस्टमाइज्ड सपनों में जीते हैं और पूरे ना होने पर एक-दूसरे को कोसते हैं। ख्वाब इसलिए ख्वाब कहे जाते हैं क्योंकि वे हकीकत नहीं बन सकते। लेकिन ख्बावों में जीना हर किसी को पसंद है।

“हरेक औरत को अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। बीवी अगर करियर वुमेन हो तो समाज में इज्जत बढ़ती है, परिवार की माली हालत भी अच्छी रहती है।”

सपनों से जिंदगी चले ना चले मगर कारोबार जरूर चलता है। इस देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में सबसे बड़ा कारोबार सपने बेचने का है। साबुन से लेकर सियासत तक हर जगह सपने बेचे जाते हैं। तरह-तरह के सपने जो आपके हिसाब से कस्टमाइज्ड हैं।

कोई क्रीम बेचने वाला महीने भर में गोरा बनाने का दावा करता है और करोड़ो कमाता है। कोई रातो-रात वजन घटाने तो कोई बाल उगाने के ख्वाब दिखाता है। सपने पूरे नहीं होते लेकिन सपने बेचने वालों की जेब भरती रहती है।

कस्टमाइज्ड सपनों का सबसे बड़ा बाजार टीवी पर है। हर सीरियल में एक आदर्श संयुक्त परिवार होता है, जो हकीकत में कहीं नहीं होता। संयुक्त परिवारों की परंपरागत भारतीय सामाजिक संरचना जाने कब की टूट चुकी है।

छोटे शहरों के इक्का-दुक्का परिवारों को छोड़कर कहीं ऐसा नहीं होता जब पूरा खानदान एक छत के नीचे रहता हो। फिर ये तमाम सीरियल इतना चलते क्यों हैं? जवाब ज्यादा मुश्किल नहीं है। उस परिवार में सासू मां ही नहीं होती है बल्कि सास की सास भी होती है।  

“आधुनिक नर-नारी दोनों पुराने लेकिन कस्टमाइज्ड सपनों में जीते हैं और पूरे ना होने पर एक-दूसरे को कोसते हैं। ख्वाब इसलिए ख्वाब कहे जाते हैं क्योंकि वे हकीकत नहीं बन सकते।”

उनके बीच नर्म-गर्म रिश्ते होते हैं। ढेर सारी बहुएं होती हैं। कुछ तुलसी की तरह आदर्श होती हैं और बाकी सब खल-नायिकाएं होती हैं। पति भी तरह-तरह के होते हैं, दर्शक को जो पसंद हो वह छांट लें।

कभी ना खत्म होनेवाले सोप आपेरा दर्शकों को सपनों की ऐसी दुनिया में ले जाते हैं, जिसे वह अपने हिसाब से कस्टमाइज कर सकती है। खुद को नायक या नायिका के रूप में देख सकता है और अपने बाकी रिश्तेदारों को बुरे किरदारों की शक्ल में।

बर्तन मांजने के बाद थकी औरत थोड़ी देर के लिए टीवी के सामने बैठती है और सीरियल देखते वक्त सोचती है— काश! मैं भी किसी ऐसे घर की बहू होती जहां केवल खुशियां ही खुशियां हैं।

उसे लगता है, ऐसे आदर्श परिवार में रहने लायक सिर्फ वही है, ना उसकी कोई देवरानी या जेठानी। टीवी वाली आइडियल ज्वाइंट फैमिली को देखकर वह रश्क करती है.. मेरे ऐसे नसीब कहां!

गृहणी उदास हो जाती है लेकिन जल्द ही मन एक अद्भुत संतोष से भर जाता है, जब चुड़ैल सरीखी किसी सास को टीवी पर देखती है। एकदम ठीक दिखाया है, मेरी सासूजी भी ऐसी ही हैं।

सपनीला सीरियल खत्म होता है और बहू टीवी वाली सास और अपनी सास को एक साथ कोसती हुई फिर से बर्तन मांजने लगती है।

 

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