नौकरशाह बने भ्रष्टाचारियों के संरक्षक

संस्कृति मंत्रालय के नौकरशाह भ्रष्टाचारियों के संरक्षक बने बैठे हैं। मंत्रालय से जुड़ी तकरीबन सभी संस्थाओं में यह चर्चा आम है। वे सहज ही कहते मिल जाते हैं कि आप कुछ भी कर लें, मंत्रालय में बैठे बाबू जांच रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में डाल देंगे।

संस्थाओं से जुड़े लोगों ने बताया कि अगर उन्हें ज्यादा परेशान करेंगे तो नोटिस भेजेंगे। उसमें पूछा जाएगा कि किससे पूछकर आप ने फलां कमेटी बनाई। चूंकि मंत्रालय ने जांच कमेटी बनाने की अनुमति नहीं दी थी, इसलिए वह रिपोर्ट नहीं मानी जाएगी।

एकबारगी इन बातों पर भरोसा करना मुश्किल है, लेकिन सूत्र का दावा है कि सच यही है। ललित कला अकादमी और कलाक्षेत्र फाउंडेशन इसके गवाह हैं। यहां भ्रष्ट लोगों की कहानियों भरी पड़ी हैं। भारी लूट-खसोट के कारण दोनों ही संस्थान बुरे दौर से गुजर रही हैं।

इस बाबात कई रिपोर्टें मंत्रालय में भेजी जा चुकी हैं, लेकिन मंत्रालय में बैठे बड़े बाबुओं ने इन रिपोर्टों की तरफ अब तक कोई ध्यान नहीं दिया है। वे कान में तेल डाले बैठे हैं। उन्होंने आंखें बंद कर रखी हैं। हेराफेरी की मोटी-मोटी फाइलें उनकी आलमारियों में धूल फांक रही हैं।

हालात ऐसे हैं कि न तो नौकरशाहों को कोई कुछ बोलने वाला है। न ही संस्थानों में बैठकर हेराफेरी करने वाले अधिकारियों को। ऐसे कई मामले हैं, जहां से हेराफेरी की खबर मिली है।

पहले बात ‘कलाक्षेत्र फाउंडेशन’ की करते हैं। यहां एक ऑडिटोरियम के नवीनीकरण के लिए सरकार से करोड़ों रुपए लिए गए थे। तब यहां लीला सैमसन की हुकूमत चलती थी। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार का राज था। उस दौर में नवीनीकरण के नाम पर लीला सैमसन करोड़ों रुपए डकार गईं। उस ऑडिटोरियम का नवीनीकरण नहीं हुआ।

यह बात किसी और ने नहीं, बल्कि भारत सरकार के लेखा विभाग (कैग) ने कही है। पूरे मामले की जांच शुरू हुई तो हेराफेरी की परतें एक-एक कर खुलीं। छानबीन में पता चला कि नवीनीकरण के लिए जो निविदा जारी की गई, गड़बड़ी वहीं से शुरू हुई। मनमाने ढंग से निविदा बांटी गई। वहीं से बंदर-बांट आंरभ हुआ। जिसे कामकाज का ठेका मिला, उसने काम के नाम पर पैसे बनाए।

यही हाल ऑडिटोरियम में संगीत के लिए लगने वाले समान के साथ भी हुआ। यहां भी मनमाने तरीके से ठेका दिया गया। जिसने साउड आदि का ठेका लिया, उसने पैसे खाए और काम आधा-अधूरा किया। हेराफेरी का किस्सा महज ऑडिटोरियम तक सीमित नहीं था। छात्रावास के रसोईघर के नवीनीकरण तक में पैसा खाया गया। नौकरियों में धांधली हुई, सो अलग।

संस्थान के मुखिया ने जिसे चाहा, उसे नौकरी दे दी। रिपोर्ट के मुताबिक 2010 में 16 नियुक्तियां हुईं, उन नियुक्तियों में नियम-कानून का कोई ध्यान नहीं रखा गया। नियुक्ति के लिए तत्कालीन अध्यक्ष लीला सैमसन ने मंत्रालय से पूछना भी मुनासिब नहीं समझा। जिन पदों को मंत्रालय ने खत्म कर दिया था, उस पर उन्होंने नियुक्तियां की। वहीं  जिस पद को पदोन्नति से भरा जाता रहा है, उसके लिए विज्ञापन निकाला गया। संविदा पर लोग रखे गए, जो सीधे-सीधे मंत्रालय के नियमों का उल्लंघन था।

निगरानी विभाग की रिपोर्ट में इन बातों का जिक्र है। वह रिपोर्ट संस्कृति मंत्रालय के नौकरशाहों के पास रखी है, पर सभी चुप्पी साधे बैठे हैं। लीला सैमसन हेराफेरी कर टहल रही हैं।

जब इन बातों को उठाया गया तो मंत्रालय ने कहा कि इसकी सीबीआई जांच होगी। मंत्री ने अनुमति भी दे दी। सूत्रों की माने तो अनुमति के बाद भी फाइल सीबीआई को नहीं सौंपी गई। आखिर क्यों? किसके  आदेश पर ऐसा किया गया? इसका जवाब तो मंत्रालय ही देगा। सूत्र की माने तो मंत्रालय के कुछ नौकरशाह नहीं चाहते हैं कि लीला सैमसन के मामले की जांच हो। वे उन्हें बचा रहे हैं।

संस्कृति मंत्रालय के नौकरशाहों ने आंखें बंद कर रखी हैं। उन्हें जांच रिपोर्ट नहीं
दिखाई दे रही है। वे रिपोर्ट को कूड़ेदान में फेंक कर खुद को जिम्मेदारी से मुक्त मान
बैठे हैं। जबकि सरकारी धन का दुरूपयोग करने वाले खुलेआम घूम रहे हैं।

यह अकेला मामला नहीं है, जहां नौकरशाही भ्रष्टाचारियों की ढाल बनी है। ललित कला अकादमी में तो ऐसी लोगों की भरमार है। बहुतेरे अधिकारी हैं जिन पर कई आरोप हैं। जांच के लिए गठित समितियों ने उसे सही भी पाया है।

मसलन अकादमी में हुई वित्तीय हेराफेरी की जांच के लिए आंतरिक ऑडिट हुई थी। उसमें कई अधिकारियों को दोषी पाया गया। केके. चक्रवर्ती और केके. मित्तल सरीखे नौकरशाह हेराफेरी में लिप्त थे। कुछ सालों तक इन दोनों के हाथ में अकादमी की बागडोर रही। इनके कार्यकाल में वकीलों के पीछे पैसे खूब कर्च किए गए। सरकारी धन को पानी की तरह बहाया गया।

इस संबंध में पूरी बात ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज है, लेकिन मंत्रालय के नौकरशाहों की ढिठाई चौकाने वाली है। वे इन मामलों में कोई कार्रवाई करने के लिए तैयार नहीं हैं।

कमोवेश यही स्थिति डॉ. डीपी. सिंहा की रिपोर्ट की भी है। उसमें साफ तौर पर लिखा है कि किस तरह अकादमी के पूर्व अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने धन और पद का दुरुपयोग। डॉ. सिंहा ने रिपोर्ट में लिखा है कि वाजपेयी ने अकादमी के नियमों का धड़ल्ले से उल्लंघन किया। संस्थान के धन का उपयोग निजी कामों के लिए किया।

पूरी कहानी शर्मनाक है। बात 2009 की है, जब अकादमी की कमान वाजपेयी के हाथ में थी। उन्हीं के कार्यकाल में 2011 में वेनिस में कला प्रदर्शनी होनी थी, उसका निरीक्षण करने के बहाने वे अप्रैल 2009 में वेनिस गए। लेकिन, रिपोर्ट में बताती है कि वे वेनिस नहीं गए थे, बल्कि सैर-सपाटे के लिए पेरिस, ब्रूसेल्स और लंदन गए। इसके लिए अकादमी के लाखों रुपए खर्च कर डाले।

वाजपेयी ने वेनिस की दूसरी यात्रा 2010 और तीसरी यात्रा 2011 मई-जून में की। तीसरी यात्रा में उनकी पत्नी भी साथ गई थीं, जिसका खर्च अकादमी के खाते में गया।

इससे साफ है कि अकादमी के पैसे गैर-जरूरी कामों में खर्च होते रहे हैं। खूब हेराफेरी हुई है। अब जांच की बारी आई है तो संस्कृति मंत्रालय   के कुछेक नौकरशाहा रिपोर्ट पर कुंडली मार कर बैठे हैं।

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पिछले चार सालों में जितेन्द्र ने जो रिपोर्ट लिखी है, उससे इनकी पहचान एक खोजी पत्रकार की बनी है। देश-दुनिया की आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी वे मौलिक दृष्टि रखते हैं। सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन का विषय चतुर्वेदी के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

1 टिप्पणी

  1. Today we need such correspondents who can expose corruption and help PM in weeding out corrupt and corruption to give transparent atmosphere to country. I wish all success to Chaturvedi in life to acheive more success.

पाठक की प्रतिक्रिया

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