निर्यात में बढ़ोतरी से ही रुपया संभलेगा

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देश के सामने इस समय कई आर्थिक चुनौतियां हैं जिनका समाधान करना जरूरी है। इनमें से एक है व्यापार-संतुलन बनाए रखना। भारत का निर्यात, आयात से कहीं ज्यादा है और इस कारण बजट का चालू घाटा बढ़ता जा रहा है।

इसी से जुड़ी हुई समस्या है रुपये की कीमत का लगातार घटना। अगस्त माह में रुपया गिरकर एक डॉलर के मुकाबले 70 का हो गया था। बाद में इसमें सुधार आया और यह 69 रुपये के आस-पास घूम रहा है।

रुपये के इस उतार ने विपक्ष को एक मौका दिया है। वह सरकार पर प्रहार कर रहा है। लेकिन इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय कारण हैं और सच्चाई यह भी है कि डॉलर दुनिया की तमाम मुद्राओं के मुकाबले तेज हो गया है।

तुर्की, ईरान जैसे देशों की मुद्राएं तो चारों खाने चित्त हो गई हैं। उनके सामने तो अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ है। उनके पास विदेशी मुद्रा का भंडार बहुत ही कम है और वे विदेशों से जरूरी सामान भी आयात करने योग्य नहीं रह गए हैं।

“सरकार तथा अन्य संस्थाओं को निर्यात को बढ़ावा देने के लिए बड़े वित्तीय कदम उठाने चाहिए ताकि व्यापार-घाटा कम हो और रुपये पर दबाव घटे। अगर हमारा निर्यात लगातार बढ़ता रहा तो रुपये की गिरावट भी रुकेगी। इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।”

अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मजबूत हो जाने से लगभग सभी देशों की मुद्राएं उसके सामने गिरने लगी हैं। भारत के साथ भी हो रहा है और रुपया गिर रहा है।

 भारत की समस्या यह है कि निर्यात जितना होना चाहिए, उतना नहीं है। हालांकि इसमें पहले की तुलना में काफी बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों के मुताबिक हमारा निर्यात मार्च 2018 के 12 महीनों में 303 अरब डॉलर था जो पिछले वर्ष की तुलना में 14.32 प्रतिशत ज्यादा था।

हमारे निर्यात में पेट्रोलियम पदार्थों के अलावा दवाओं, इंजीनियरिंग सामान एवं आभूषणों की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन हमारा आयात 459 अरब डॉलर का रहा जिससे 156.8 अरब डॉलर का  व्यापार घाटा मुंह बाये खड़ा है।

कच्चे तेल के बढ़ते दामों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था को भारी चोट पहुंची है और व्यापार घाटा भी बढ़ गया है। कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़कर 70 डॉलर तक जा पहुंचे थे जबकि दो साल पहले ये 29 डॉलर प्रति बैरल तक जा गिरे थे जिससे भारत जैसे देश पर बड़ा बोझ पड़ा।

“भारत की समस्या यह है कि निर्यात जितना होना चाहिए, उतना नहीं है। हालांकि इसमें पहले की तुलना में काफी बढ़ोतरी हुई है।”

सरकार ने तेल कंपनियों को कीमतें कम करने की इजाजत दे दी जिससे पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छू गए। जनता में असंतोष बढ़ा और विपक्ष को मौका मिला।

भारत को इस साल लगभग 12 अरब डॉलर सालाना का पेट्रेलियम आयात करना पड़ेगा। यह राशि बहुत बड़ी है और इसने हमारे व्यापार-घाटे को चिंताजनक स्तर पर ला दिया है।

ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति की समस्या होने जा रही है और इससे तेल की कीमतों में अनिश्चितता का माहौल है।

कच्चे तेल के अलावा सोना हमारे आयात का दूसरा महत्वपूर्ण सामान है। भारत का दुनिया का सोने का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। चीन और भारत में सोने की खपत को लेकर प्रतिस्पर्धा रहती है।

सोने का आयात कम करने के लिए सरकार ने इस पर काफी टैक्स लगा रखा है लेकिन उससे समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है उलटे उसकी तस्करी बढ़ गई है। अब सरकार इस पर से टैक्स घटाने का विचार भी कर रही है।

लेकिन मूल सवाल है कि निर्यात कैसे बढ़ाया जाए? अमेरिका तथा यूरोप के बाज़ारों में इस समय खपत घट गई है और इससे हमारा निर्यात नहीं बढ़ पा रहा है। वस्त्र उद्योग में हम काफी आगे थे और हमारा निर्यात भी बहुत मजबूत था। लेकिन इस साल मई में इसमें 16.95 प्रतिशत की गिरावट आई है।

भारत में मध्यम और लघु उद्योगों का निर्यात में बहुत योगदान है। लेकिन यह सेक्टर कुछ समय से कठिनाइयों से गुजर रहा है। उसके पास न केवल पूंजी का अभाव है बल्कि टेक्नोलॉजी का भी।

ऋणदाता इस समय काफी सख्ती कर रहे हैं और नये नियम बना रहे हैं। इससे उसे कठिनाइयां आ रही हैं। ऐसे में उसके सामने अपने लक्ष्य पर कायम रहना मुश्किल है। ऐसे में वाणिज्य मंत्रालय को कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए ताकि निर्यात बढ़े।

सरकार तथा अन्य संस्थाओं को निर्यात को बढ़ावा देने के लिए बड़े वित्तीय कदम उठाने चाहिए ताकि व्यापार-घाटा कम हो और रुपये पर दबाव घटे। अगर हमारा निर्यात लगातार बढ़ता रहा तो रुपये की गिरावट भी रुकेगी। इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

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