नाम कमाता प्राधिकरण

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कोई दो बजे का वक्त था। बहुत गहमागहमी थी वहां। अंदर न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की बेंच सुनवाई कर रही थी और बाहर लोग-बाग अपने-अपने मामले की चर्चा में मशगूल थे। कुछ लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे।

तभी बच्चू सिंह से मुलाकत हुई। वे अपने पांच-छह साथियों के साथ राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) आए हुए थे। उनसे बातचीत हुई तो  पता चला कि वे रहने वाले हरियाणा के हैं। उन्हें एक वकील की तलाश थी जो उनका पक्ष प्राधिकरण में रख सके।  

वे अपने गांव शाहपुर में पेड़ों की चल रही कटाई से दुखी थे। वहां उन्होंने हर जगह उसे रोकवाने की कोशिश की। पर उन्हें सफलता नहीं मिली। बच्चू बताते हैं ‘गांव में प्रधान की अनुशंसा पर 150 से ज्यादा हरे पेड़ काट दिए गए।’ वे कहते हैं कि सरकार  और प्रशासन पेड़ लगाने और पर्यावरण को बचाने की बात करता है। लेकिन सच्चाई यह है कि जब भी कोई पेड़ कटता है तो सभी चुप रहते हैं।

न प्रशासन का कोई कुछ बोलता है और न ही कोई समाज से इसके खिलाफ खड़ा होता है। पर मैंने आवाज उठाई। हर स्तर पर इसकी शिकायत की। तहसीलदार से लेकर वन विभाग तक। लेकिन कुछ नहीं हुआ। तब किसी ने प्राधिकरण के बारे में बताया।  

‘हाल फिलहाल प्राधिकरण की तरफ से ऐसे कई आदेश आए हैं जो इसकी बढ़ती हुई शक्ति को प्रदर्शित करते हैं। लेकिन अब प्राधिकरण के आदेश पर हो रही  कार्रवाइयां बेहद अहम हो चुकी हैं।
ऋत्विक दत्ता, पर्यावरण वकील’

यहां इसी मामले को लेकर आए हैं। पर दुविधा यह है कि हमारे पास कोई वकील नहीं है। यह बच्चू सिंह की व्यथा थी। उधर न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार प्रदूषण से जुड़े मामले की सुनवाई कर रहे थे। 100 लोगों से भरे हाल में मामला चल रहा था।

उस दिन उन्होंने आदेश जारी किया कि जो लोग वायु प्रदूषित करते हैं उनसे जुर्माना वसूला जाए। यह फैसला उनके खिलाफ था, जिन्होंने कूड़े में आग लगाई थी। निर्माण गतिविधियों के दौरान धूल-गर्द उड़ाने के खिलाफ प्राधिकरण  के आदेश का अनुपालन नहीं किया।

एक लंबी बहस के बाद पीठ ने कहा कि दिल्ली सरकार तथा निगम कह रहे हैं कि उन्होंने विभिन्न उल्लंघनों के लिए क्षेत्रवार 1000 रुपये से लेकर पांच लाख रुपये तक का हजार्ना भरने का नोटिस जारी किया गया है। लेकिन कुछ उल्लंघनकताअरं ने हजार्ना भरने से मना कर दिया है।

इस पर कोर्ट ने कहा कि जो भी व्यक्ति पर्यावरणीय हजार्ना भरने से मना करता है उसे प्राधिकरण के समक्ष पेश होने को कहा जाए। डीटीसी  से आए अधिकारी देवेन्द्र बताते हैं कि स्मॉग बढ़ने पर यहां आना हो रहा है।

जिसका कारण है कि प्रदूषण बढ़ने में डीटीसी बसों को भी एक कारण माना जाता रहा है। वैसे हम डीटीसी की तरफ से समय- समय पर आते रहते हैं। इस बार आने का कारण पूछने पर वो बताते हैं कि सरकार ने 500 इलेक्ट्रिक बसों को चलाने का प्रस्ताव दिया है।

अब आगे कोर्ट का जो आदेश होगा हम मानेगे। हम पहले भी अपने कुछ सुझाव देते रहे हैं।  उसके मुताबिक कोर्ट का आदेश का पालन करते रहे हैं। हम बात ही कर रहे थे तब तक एक दूसरे मामले की सुनवाई शुरू हो गई। इसमें एनजीओ गो ग्रीन फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए प्राधिकरण ने अपने आदेश में संशोधन से इनकार कर दिया।

इसमें फैसले में नोएडा अथॉरिटी के सेक्टर 123 में बनी लैंडफिल साइट को ही कचरे के अस्थाई निस्तारण के लिए प्रयोग में लाने के निर्देश दिए गए हैं। न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि शहरी ठोस कचरे को सेक्टर 138ए की साइट में न डालने के प्राधिकरण के आदेश में दखल देने की कोई आवश्यकता नहीं है।  

प्राधिकरण को बने सात साल हो चुके हैं। इस दौरान संस्थान ने अपने महत्वपूर्ण फैसलों से एक अलग पहचान बनाई है। कापरनिकस मार्ग पर मौजूद प्राधाकिरण का भवन बहुत भव्य नहीं कहा जा सकता। यहां 50-55 कुर्सियों वाला हॉल है।

उसमें थोड़ी सी ऊंचाई पर स्वतंत्र कुमार के साथ तीन न्यायाधीश बैठेते हैं। कम जगह होने के कारण कई बार वकील, पत्रकार और वादियों को खड़ा रहना पड़ता है। इसका गठन 2010 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम, 2010 के जरिए हुआ।

प्राधिकरण ने बहुत कम समय में ही अपनी ताकत का एहसास पर्यावरण के खिलवाड़ करने वालों को करा दिया। यह पर्यावरण संबंधी मामलों में अधिकरण का समर्पित क्षेत्राधिकार तीव्र पर्यावरणीय न्याय प्रदान करेगा तथा उच्च न्यायालयों में मुकदमेबाजी के भार को कम करने में सहायता करेगा।

अधिकरण को आवेदनों या अपीलों के प्राप्त होने के 6 महीने के अंदर उनके निपटाने का प्रयास करने का कार्य सौंपा गया है।प्राधिकरण के महत्व को अप्रैल, 2014 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू के नेतृत्व वाली एक पीठ की टिप्पणी से समझा जा सकता है।

उसमें दिल्ली में वायु प्रदूषण पर लिए गए प्राधिकरण के कदमों की सराहना करते हुए कहा ‘ये न्यायाधिकरण एक अहम सरकारी संस्था है जो आम जनता की भलाई करना चाह रही है। उन्हें हतोत्साहित करने के बजाय हमें उनकी मदद करनी चाहिए।’

ऋत्विक दत्ता जो कि एक पर्यावरण वकील हैं। उनका कहना है कि यूं तो हाल फिलहाल में प्राधिकरण की तरफ से ऐसे कई आदेश आए हैं जो इसकी बढ़ती हुई शक्ति को प्रदर्शित करते हैं।

लेकिन अब प्राधिकरण के आदेश पर हो रही कार्रवाइयां बेहद अहम हो चुकी हैं। हमने कल्पना नहीं की थी कि प्राधिकरण के आदेश से पूरा जंतर-मंतर साफ कर दिया जायेगा। पर असल समस्या यह है कि कई लोग संस्थान को विकास में बाधक मानते है।  अभी जो इसके सामने सबसे बड़ी समस्या है वो यह है कि कुछ लोगों का मानना है कि प्राधिकरण विकास में बाधक है।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू ने प्राधिकरण के कदमों की सराहना करते हुए कहा कि  ‘न्यायाधिकरण एक अहम सरकारी संस्था है जो आम जनता की भलाई करना चाह रही है। उसे हतोत्साहित करने के बजाय हमें उसकी मदद करनी चाहिए।’

फैसलों से बदली तस्वीर

  • दिल्ली में लगातार बढ़ रहे वायु प्रदूषण के कारण प्राधिकरण ने आदेश दिया है कि 10 वर्ष से पुराने सभी डीजल वाहनों के चलने पर रोक लगाई जाए।
  • ग्रेटर नोएडा सहित कम से कम सात औद्योगिक क्षेत्रों में वायु प्रदूषण फैलाने वाली कई फैक्ट्रियों पर कार्रवाई के निर्देश प्राधिकरण की तरफ से आए। साथ ही उसके आदेश पर दिल्ली के रिहायशी इलाकों में कारखानों पर काफी हद तक रोक लगाई गई।
  • दिल्ली से होकर उत्तर प्रदेश में बहने वाली यमुना नदी के 52 किलोमीटर तक के तटीय इलाके को संरक्षित क्षेत्र घोषित करने की बात भी प्राधिकरण ने सरकार से कहा ।
  • प्राधिकरण की पुणे बेंच ने महाराष्ट्र सरकार से पटाखों से होने वाले वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के अलावा सार्वजनिक जगहों पर पटाखे छुड़ाने वाले आयोजकों पर पर्यावरण टैक्स लगाने को कहा।
  • प्राधिकरण से हिमाचल प्रदेश को एक आदेश जारी किया गया जिसमें रोहतांग दर्रा जाने वाली सभी व्यावसायिक डीजल गाडि़यों पर कर बढ़ाने को कहा गया ।
  • यूपीए सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य के हसदेव-अरण्य वन में कोयला खनन की आज्ञा को प्राधिकरण ने निरस्त किया।

 

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