नहीं उठा हत्या के रहस्य का पर्दा

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प्रेम नगर का खूनी खेल’ यह वह लेख है, जिसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने लिखा था, अपनी हत्या से सात साल पहले। वह लेख पाञ्चजन्य में 20 फरवरी, 1961 को छपा है। क्या विचित्र दुर्योग है! उनकी हत्या भी सात साल बाद उसी महीने में र्हुई।

उस लेख का आमुख इन शब्दों में था- ‘प्रेग नगर चोकोस्लोवाकिया में स्थित है। यद्यपि यह कांगो से हजारों मील दूर है, परंतु सोवियत संघ के गुप्तचर विभाग द्वारा स्थापित वह खूनी स्कूल यहीं पर चालू किया गया जिसमें प्रशिक्षण प्राप्त युवकों ने कांगो में अराजकता निर्माण कर दी। पाठकों की जानकारी के लिए प्रस्तुत पंक्तियों में उस स्कूल की अविस्मरणीय कहानी दी जा रही है।’

इस तरह संपादक ने लेख के बारे में सूचना दी। उस लेख में तथ्यों सहित वर्णन था कि किस तरह कम्युनिस्ट अपने राजनीतिक मंसूबे को पूरा करने के लिए हत्या के तौर-तरीकों की ट्रेनिंग का बाकायदे स्कूल चला रहे हैं।

वह लेख एक चेतावनी थी, उनके लिए जो कम्युनिस्ट खेल को जानना और विफल करना चाहते थे। क्या उस चेतावनी को सरकार, समाज और बौद्धिक वर्ग ने सुना? ऐसा नहीं लगता।

अगर सुना होता तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हत्या का षड्यंत्र सफल नहीं होता। विडंबना देखिए कि अदालत, जांच आयोग और सीबीआई ने अपने-अपने स्तर पर हत्या के रहस्य को खोलने के आधे-अधूरे प्रयास किए और जो बताया, वह किसी के गले नहीं उतरता।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सहयोगी रहे नानाजी देशमुख ने उनकी हत्या के पांच साल बाद लिखा- ‘आज हम दीनदयाल उपाध्याय की 55वीं जयंती मना रहे हैं, परंतु हमारी आंखों में आंसू हैं। पंडितजी की न केवल हत्या की गई, अपितु उनके हत्यारों का पता भी न लगाया जा सका। न तो सीबीआई और न चंद्रचूड़ जांच आयोग ही यह बता सका कि दीनदयालजी की किसने हत्या की और क्यों? ऐसा लगता है कि इस डर से कि सरकार के लिए इसके राजनीतिक परिणाम अच्छे नहीं होंगे, वह चाहती ही नहीं थी कि हत्यारे तथा संरक्षक पकड़े जाएं।’

“पंडित दीनदयाल उपाध्याय को मानने वाले अनुभव करते हैं कि हत्या का राज छिपाया गया। उसे दुर्घटना का दुखद नतीजा साबित करने के लिए इंदिरा गांधी सरकार ने तीर और
तुक्के बेतुके ढंग से जुड़वाए।”

इस कथन में ही पूरी कहानी समाई हुई है। इसे समझने पर हर बात साफ हो जाती है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय को मानने वाले अनुभव करते हैं कि हत्या का राज छिपाया गया।

उसे दुर्घटना का दुखद नतीजा साबित करने के लिए सरकार ने तीर और तुक्के बेतुके ढंग से जुड़वाए। हालांकि, केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार उसमें पूरी तरह सफल नहीं हुई। क्यों और कैसे? घटना के विवरण में इसका जवाब है।

बात 11 फरवरी, 1968 की है। मुगलसराय स्टेशन रेलवे का बड़ा जंक्शन है। उसी के यार्ड में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मृत शरीर मिला। रात करीब साढ़े तीन बजे रेलवे के एक कर्मचारी ने वह दृश्य देखा।

नाम था, ईश्वर दयाल। उसने पाया कि रेलवे लाइन के पास लोहे और कंकड़-पत्थर पर एक निर्जीव शरीर पड़ा है। वह नहीं जानता था कि जिसे वह देख रहा है, वह भारत का एक महापुरुष है। उसने अपना फर्ज निभाया।

सहायक स्टेशन मास्टर को रेलवे के फोन से सूचना दी। सहायक स्टेशन मास्टर ने रेलवे पुलिस को सूचना दी। रेलवे पुलिस ने अपने एक जवान को पहले भेजा और बाद में दो सिपाही फिर भेजे गए। उन्हें शव की निगरानी करनी थी।

वे करते रहे। थोड़ी देर बाद रेलवे पुलिस का दरोगा पहुंचा। उसका नाम था, फतेहबहादुर। हलचल शुरू हुई। ऐसे अवसर पर अगला काम होता है, डॉक्टर को बुलाना। डॉक्टर को पहुंचने में देर लगी। उसी के आस-पास फोटोग्राफर पहुंचा। अंधेरा होने के कारण सूर्योदय का उसने इंतजार किया। फिर फोटो खींचा।

फोटो के बाद शव की तलाशी ली गई। जिसमें रेलवे का पहले दर्जे का टिकट और आरक्षण की परची मिली। घड़ी पर नानाजी देशमुख लिखा था। जेब में 26 रुपये मिले। ये सूचनाएं पुलिस को सतर्क करने के लिए काफी थीं। फिर भी वह काहिल बनी रही।

उसने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पहचान करने का कष्ट नहीं उठाया। उसने शरीर को ‘अज्ञात’ व्यक्ति का माना। पोस्टमार्टम की तैयारी शुरू की। पुलिस ने इस तरह छह घंटे लगाए। फिर शव को प्लेटफार्म पर रखा गया।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जो धोती पहने हुए थे, उससे ही उन्हें ढक दिया गया था।मुगलसराय स्टेशन हमेशा भीड़ से भरा रहता है। उसका यार्ड सबसे बड़ा माना जाता है। रोज उस बड़े यार्ड से चोरियों का पुराना सिलसिला चल रहा है।

कह सकते हैं कि हत्या की साजिश रचने वालों ने सोच-समझकर मुगलसराय को चुना। स्टेशन के प्लेटफार्म पर रखे एक शव ने हर देखने वाले में उत्सुकता जगाई। बात फैली।

लोग उस तरफ आने लगे। उनमें ही रेलवे का एक कर्मचारी था, वनमाली भट्टाचार्य। उसने ही पहचाना। इससे अज्ञात व्यक्ति का शव अपनी पहचान में वापस आया। वे व्यक्ति थे, भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय।

उस कर्मचारी ने जनसंघ के स्थानीय नेताओं को सूचना दी। फिर क्या था, अविलंब जनसंघ के कार्यकर्ता स्टेशन पहुंचे। इससे षड्यंत्रकारियों की मंशा धरी रह गई। वे उन्हें लावारिस बनाने के जुगाड़ में थे।

जैसे ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय का शव पहचाना गया, देशभर में सनसनी फैली। आकुलता बढ़ी। शोक की लहर व्याप्त हो गई। इस बात को याद कर लेना चाहिए कि वह समय राजनीतिक संक्रमण का था। कांग्रेस जा रही थी और गैर-कांग्रेस की हवा बन रही थी।

भारतीय जनसंघ उसका नेतृत्व कर रहा था। उस जनसंघ का नेतृत्व पंडित दीनदयाल उपाध्याय कर रहे थे। उनके जाने का अर्थ था कि जनसंघ अपने सबसे प्रखर बौद्धिक पुरुष को गंवा बैठा।

भारतीय जनसंघ में पूरा विकल्प दे पाने की संभावनाएं प्रकट हो रही थीं। उसे ही समाप्त करने के लिए हत्या का षड्यंत्र रचा गया। ऐसा ही मत ज्यादातर राजनीतिक नेताओं ने तब व्यक्त किया था।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हत्या के दिन ही भारत सरकार ने जांच सीबीआई को सौंप दी। उस समय सीबीआई के निदेशक जॉन लोबो थे। वे ईमानदार अफसर माने जाते थे। वे थे भी।

जैसे ही जांच सीबीआई को सौंपी गई, वे अपनी टीम के साथ मुगलसराय पहुंचे। जांच में जुटे गए। तभी उन्हें वापस बुला लिया गया। पहली आशंका उसी समय व्यक्त की गई कि जांच की दिशा बदली जा रही है। वह फैसला राजनीतिक था।

केंद्र सरकार के उस रवैए से साफ हुआ कि वह राजनीतिक नफा-नुकसान को ध्यान में रखकर सीबीआई को निर्देश दे रही है। इंदिरा गांधी नहीं चाहती थीं कि हत्या का रहस्य खुले और षड्यंत्रकारी बेनकाब हों।

“आज हम दीनदयाल उपाध्याय की 55वीं जयंती मना रहे हैं, परंतु हमारी आंखों में आंसू हैं। पंडितजी की न केवल हत्या की गई, अपितु उनके हत्यारों का पता भी
न लगाया जा सका।”

‘नानाजी देशमुख’   

 

सीबीआई ने अपनी जांच रिपोर्ट में बहुत हैरानी की बात कही। उसने हत्या को साधारण अपराध बताया। रिपोर्ट दी कि दो चोर-उचक्कों ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हत्या कर दी। इरादा उनका चोरी का था। इस पर किसी को विश्वास नहीं हुआ।

विशेष सत्र न्यायाधीश ने एक तरफ सीबीआई की रिपोर्ट पर बिना संदेह किए फैसला सुना दिया। वह फैसला 9, जून 1969 को आया। खबर 10 जून की छपी। इसमें बताया गया कि अभियुक्त भरत और रामअवध को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया। भरत को चोरी के आरोप में चार साल की सजा इसलिए सुनाई कि वह सुधर जाए। दूसरी तरफ विशेष सत्र न्यायाधीश ने यह कहकर सनसनी पैदा कर दी कि ‘असली सच को अभी खोजा जाना है।’

अदालत के फैसले में जो टिप्पणी थी, उससे फिर एक बार गेंद इंदिरा गांधी की सरकार के पाले में आ गई। वे उस समय प्रधानमंत्री थीं। कम्युनिस्टों के समर्थन से सरकार चला रही थी। उनकी राजनीतिक मजबूरियां थीं।

लेकिन अदालत की टिप्पणी से जबरदस्त जनदबाव बना। रोज आवाज तेज होती जा रही थी कि सरकार जांच आयोग बनाए। जांच आयोग की नियुक्ति 23 अक्टूबर, 1969 को हुई। वाई.बी.चंद्रचूड जांच आयोग ने सीबीआई की रिपोर्ट को ही आधार बनाया।

जांच-पड़ताल के दौरान न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने स्वयं जिन रहस्यों को उजागर किया, उन्हें भी एक तार्किक परिणति तक उन्होंने नहीं पहुंचाया। इस बारे में चंद्रचूड़ ने जो सफाई दी, वह उनके विचार और जांच की दिशा को स्पष्ट करने के लिए काफी है।

उनका कथन था- ‘अगर पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हत्या में राजनीतिक षड्यंत्र है तो मुझे षड्यंत्रकारियों के नाम पहचानने की जरूरत नहीं है। मैं अपनी जांच-पड़ताल की सीमा जानता हूं। मैं यह खोजबीन नहीं कर सकता कि हत्या किसने की।’

इस ‘लक्ष्मण रेखा’ में चंद्रचूड़ बने रहे। उन्होंने दूसरे विकल्प खुलने ही नहीं दिए। अगर ऐसा करते तो भरत और रामअवध से तथ्य निकलवा पाते।

इमरजेंसी के दौरान वे दोनों (भरत और रामअवध)  वाराणसी के शिवपुर स्थित सेंट्रल जेल में किसी दूसरे अपराध में सजा काट रहे थे। शातिर अपराधियों के साथ उन्हें अपराधी बंदियों के बैरक में रखा गया था। वहां जाने पर हमें उनका पता चला।

उन दिनों हम 17 राजनीतिक बंदियों को उसी जेल में अलग एक बड़ी बैरक में जिला जेल से कड़े पहरे में स्थानांतरित किया गया था। वहां कुछ दिन गुजारने के बाद मैंने जेल अधीक्षक से कहा कि अगर हो सके तो पुस्तकालय में आने-जाने की सुविधा करा दें और वहीं कुछ बंदियों को पढ़ाना भी चाहता हूं।

अधीक्षक ने अनिच्छापूर्वक इसकी अनुमति दी। उसी सिलसिले में वे दोनों खोजे जा सके। फिर हमने उन दोनों से बातचीत शुरू की। जब वे खुलने लगे तब एक दिन दोनों ने कहा, ‘हमसे महापाप हो गया।’ घटना के बाद वे जान सके थे कि उन सबने जिनकी हत्या की, वे एक महापुरुष थे।

अपना कुकर्म कबूलते हुए पश्चाताप का भाव उनके चेहरे पर उतर आता था। वे यह नहीं बोलते थे कि इस्तेमाल हो गए। पर उनका हाव-भाव यही बताता था।

हत्या को भरत ने अदालत में भी कबूला था। लेकिन उसके सबूत सीबीआई को जुटाने थे, जो उसने नहीं जुटाए। इसकी तह में जितना दूर तक जाने की जरूरत थी, उतना न सीबीआई ने छानबीन की और न चंद्रचूड़ आयोग ने।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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