नर्मदा एक राजनीतिक नदी है

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विश्व में मौजूद नदी घाटियों में नर्मदा घाटी ही है जो यह दावा कर सकती है कि आदि पुरुष ने उसके तट पर जीवन जीया था।

सप्त सैंधव के उस इतिहास से भी काफी पहले जब नर्मदा को ऋषियों ने दक्षिणतम सीमा मानकर उसे पार करना अधर्म घोषित कर दिया था, क्योंकि नर्मदा घाटी के दक्षिणी तट पर रहते थेदानव यानी काले लोग, आदिपुरुष या आदिवासी। इसके बाद समाज विकसित हुआ और नर्मदा के साथ भी वही सलूक हुआ जो विश्व की सभी महान नदियों ने झेला है।

जब पाठक इस लेख को पढ़ रहे होंगे, सबसे बड़े नदी संरक्षण के कथित अभियान का समापन हो चुका होगा। यह दावा मध्य प्रदेश सरकार का है, लेकिन वास्तविकता यह है कि नर्मदा तेजी से प्रदूषित होती नदी है।

सभी मुद्दों से बेखबर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नर्मदा तट पर वोटों
की फसल लहलहाने में व्यस्त हैं।

मलाज खंड के बॉक्साइड उत्खनन से होने वाले प्रदूषण से लेकर बेशुमार डेयरियों तक हर कोई नर्मदा को गंदा करने में तुला है। इसके अलावा एंजोला (शैवाल) की भरमार ने नर्मदा को डराने की हद तक भर दिया है, यदि प्रदेश सरकार इस एंजोला बेहतर प्रबंधन कर पाती तो मध्य प्रदेश दुग्ध उत्पादन में देश में अव्वल होता, कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि एंजोला को पशुओं को खिलाने से दुघ उत्पादन तेजी से बढ़ा है। लेकिन अब तो एंजोला नर्मदा को बांझ करने पर अमादा है।

एंजोला की हरियाली से आंखें मूंद कर सरकार ने नर्मदा में एक नई हरियाली चुनरी योजना की शुरुआत की है, जिसके तहत तट से एक किलोमीटर तक के क्षेत्र में पौधा रोपण किया जा रहा है। लेकिन नेताओंमंत्रियों की मौजूदगी में गाजेबाजे से रोपे गए ये पौधे देखरेख के अभाव में एक हफ्ते भी नहीं जी पाते।

हरियाली चुनरी एक असफल योजना साबित हो रही है। हंगामा होने पर एंजोला को भी कई जगह नदी से हटाया गया, लेकिन इसे निकालकर नदी किनारे ही रख दिया गया, भारी मात्रा में नदी किनारे पड़ा यह शैवाल पहली बारिश में ही फिर से नदी का हिस्सा बन जाएगा।

इन सभी मुद्दों से बेखबर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नर्मदा तट पर वोटों की फसल लहलहाने में व्यस्त हैं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए नर्मदा किनारे बसे शहरों पर खास ध्यान दे रही है। इनमें बालाघाट जैसे कई इलाके कांग्रेस का गढ़ रहे हैं।

सरकार का दावा है कि अमरकंटक में यात्रा के समापन समारोह में पांच लाख लोग जमा होंगे तो क्या अमरकंटक और नर्मदा के उद्गम की धारा इतनी बड़ी संख्या को संभाल सकती है? एनजीटी ने भी सवाल उठाया है कि यात्रा के दौरान जो कैम्पिंग हो रही है, उससे फैल रही गंदगी नर्मदा में ही जा रही है, तो यह संरक्षण कैसे है?

सीपीसीबी कई जगहों पर पानी की गुणवत्ता की मानिटरिंग कर रही है, लेकिन अब तक प्रदूषण के लिए चिन्हित इंडस्ट्रीज पर कोई कार्रवाई नहीं कर पाई है। इसके अलावा खनन की मानिटरिंग करने वाला तो पूरा सिस्टम ही फेल हो गया है। प्रदेश में यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि नर्मदा के खनन में मुख्यमंत्री के रिश्तेदार भी शामिल हैं।

आदिवासियों के भारी विरोध के बावजूद बिजली की जरूरत पर बल देते हुए जबर्दस्ती जमीनों पर कब्जा कर बरगी, बाढ़सागर और गांधीसागर जैसे बड़े बांध बनाए गए, पर्याप्त भराव के बावजूद इस दौरान इन बांधों से बिजली उत्पादन नहीं हो रहा, कारण यह है कि यूनिटें ठप्प पड़ी हैं।

प्राचीनतम नदी और उसकी घाटी में रहने वाले आदिवासी इस संरक्षण यात्रा से दूर हैं। वे जानते हैं कि नर्मदा का संरक्षण नारों, झंडों, बाजों और पूजापाठ से नहीं होगा। 

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