नदी जब बहती थी

0
295

नुपम मिश्र को गए एक साल हो गया। एक बार कुछ उत्साही पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने उनसे कहा कि क्यों नहीं हम लोग गंगा के लिए आमरण अनशन करते? ताकि सरकार गंगा पर, गंगा का पक्ष सुनने के लिए राजी हो जाए।

अनुपम भाई ने कहा कि गंगा धरा पर समाज को तारने आई है, मारने नहीं। नदी जीवन देती है। वह कभी नहीं कहती कि उसकी ममता का कर्ज आमरण अनशन कर उतारा जाए। आपके प्रयास आपके काम में दिखाई देने चाहिए न कि बातों में।

अनुपम जी की बरसी पर यह बात इसलिए याद आई क्योंकि गंगा संरक्षण मंत्री रहीं उमा भारती ने गंगा पर परियोजनाएं अगले साल अक्टूबर तक प्रारंभ न होने पर आमरण अनशन की चेतावनी दी है।

लहरों की तरह अनुपम जी की बातें कानों में टकराती रहती हैं।

“अनुपम जी होते तो उमा जी से कहते, अनशन की नहीं उत्साह की जरूरत है, अब करके दिखाइए, तारीख मत दीजिए, गंगा आपकी तारीखों में नहीं, कोशिशों में नजर आनी चाहिए।”

‘अच्छे-अच्छे काम करते जाना।’जब तक थे एक नदी की तरह सकारात्मकता बांटते रहे। आज जब सरकारें उनके बातों को दरकिनार कर उनकी तस्वीर को हमजोली बताने में जुटी हैं तो जरूरी हो गया है कि व्यक्ति के बजाए विचारों पर बात की जाए और अनुपम जी की विरासत को अतिक्रमण से बचाया जाए।

अनुपम जी कभी भी गंगा और जल केंद्रित सरकारी कार्यक्रम में नहीं गए। हर बार उन्हें बुलाया जाता और वे विनम्रता से कहते, आप अपना काम करें, मैं अपना कर रहा हूं।

नदी जोड़ो परियोजना और बांध निर्माण को लेकर सरकारी हड़बड़ी से वे रोष में थे, कहते थे, ‘आसमान से देखिए तो गंगा और यमुना के उद्गम बिंदु पास-पास नजर आते हैं, लेकिन प्रकृति ने उन्हे एक हजार किलोमीटर अलग-अलग बहाव देने के बाद इलाहाबाद में मिलाया, यह प्रकृति तय करती है कि नदियों को कहां जोड़ना है, हमारा काम है उन्हें सहेजना और जरूरत भर का ले लेना।’

उन्होंने केन-बेतवा लिंक के गंभीर परिणाम की चेतावनी भी दी लेकिन सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी। इससे इतर नए गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी ने वाराणसी से हल्दिया तक जलमार्ग और अन्य योजनाओं का खाका पेश कर दिया, तलछट को लेकर वे एक्शन मोड में नजर आ रहे है।

ये अच्छा है कि वे इसे सिर्फ अर्थ ही नहीं, आस्था के नजरिए से भी देख रहे हैं। हालांकि गंगा के ऊपरी धारा पर निर्णय लेते समय उन्हे ज्यादा संवेदनशील होना होगा। गंगोत्री से हरिद्वार तक पर्यावरणीय नजरिये की जरूरत है और फर्रुखाबाद से फतेहपुर तक के बेल्ट पर सख्ती दिखाने की जरूरत है।

गडकरी ने गंगा किनारे बड़ी संख्या में बांस रोपण की इच्छा जताई है जिससे रोजगार भी पैदा किया जा सके, बांस एक तरह की घास है, मिट्टी कटान रोकने में सहायक होती है।

पिछले साल भी मंत्रालय ने झारखंड में बड़ी मात्रा में पौधा रोपण किए थे। आज की सच्चाई यह है कि उनमें से ज्यादातर पौधे दम तोड़ चुके हैं। 

“अनुपम जी कभी भी गंगा और जल केंद्रित सरकारी कार्यक्रम में नहीं गए। हर बार उन्हें बुलाया जाता और वे विनम्रता से कहते, आप अपना काम करें, मैं अपना कर रहा हूं।”

गंगा मंत्रालय अब तक कुछ क्यों नहीं कर पाया, इस पर मत भिन्नता हो सकती है लेकिन कोशिश ही नजर ना आए, इसका कोई भी बहाना नहीं हो सकता।

अपनी नाकामियों के लिए दूसरे पर दबाव बनाना काम में रुकावट ही पैदा करेगा। जरूरत इस बात की है कि सभी मंत्रालय गंगा पर आपसी सहयोग दिखाएं।

अनुपम जी होते तो उमा जी से कहते, अनशन की नहीं उत्साह की जरूरत है। अब करके दिखाइए, तारीख मत दीजिए, गंगा आपकी तारीखों में नहीं, कोशिशों में नजर आनी चाहिए। प्रकृति का अपना कलेंडर होता है वह धर्म, विचारधारा और मंत्री का पहनावा देखकर प्रतिक्रिया नहीं करती।

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here