नए रिवाज बनाते वेंकैया नायडू

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New Delhi: NDA's vice presidential candidate M. Venkaiah Naidu arrives at Parliament on Aug 3, 2017. (Photo: IANS)

थोड़े ही दिनों में उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू अपनी छाप छोड़ने में सफल हो गए हैं। वे भेदभाव नहीं करते। जो भी बुलाता है, वहां जाते हैं। चाहे वह पुस्तक लोकार्पण का अवसर हो या वेद सम्मेलन। रिवाज को वे तोड़ रहे हैं। बड़े पद पर आसीन अक्सर देर से पहुंचते हैं। लेकिन उपराष्ट्रपति निर्धारित समय से पहले ही पहुंच जाते हैं। हालांकि इससे आयोजकों को खासी परेशानी भी उठानी पड़ती है। इस नए रिवाज से लोग परिचित हो गए हैं। आयोजक सतर्क रहने लगे हैं और उसी तरह सुनने वाले भी। साफ है कि समय के पालन का नया रिवाज बन रहा है।

यह अकेला उदाहरण नहीं है। उन्होंने समय पर फैसला करने का भी एक नया रिवाज शुरू कर दिया है। इससे एक नई बहस छिड़ गई है। इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन कुछ लोगों को तकलीफ भी हो रही है क्योंकि उनके स्वार्थ पर सीधी चोट पड़ रही है। उदाहरण के लिए कह सकते हैं कि कुछ नेता अपनी पार्टी के अनुशासन को तोड़ने के बावजूद कानूनी ओट में छिपकर संसद में बने रहते हैं। संसद से बाहर वे अपनी राजनीति चलाते हैं। अपनी ही पार्टी के खिलाफ दहाड़ते रहते हैं और उसकी ओर से निर्वाचित होने के सारे संसदीय लाभ भी वे छोड़ना नहीं चाहते। इस प्रचलित तौर-तरीके से जहां सिद्धांतों का हनन होता है और अवसरवाद को बढ़ावा मिलता है वहीं विचारहीन राजनीति को पनपने और फैलने में सुविधा हो जाती है। वैसे तो सभी चाहते हैं कि ऐसी राजनीति रुके। लेकिन कोई भी खुद इसका उदाहरण बनना नहीं चाहता। उपराष्ट्रपति ने शरद यादव और अली अनवर की राज्यसभा सदस्यता पर समय के भीतर फैसला सुनाकर अवसरवादी राजनीति पर गहरी चोट की है। वे जानते हैं कि उन्हें आलोचना का शिकार होना पड़ेगा। उनकी आलोचना हो भी रही है।

फैसले को अनुचित कोई नहीं कह रहा है। जिन आधारों पर उपराष्ट्रपति ने सदस्यता समाप्त की है, उसे सभी जायज मान रहे हैं। आलोचना सिर्फ इस पर हो रही है कि जल्दबाजी क्यों की? उपराष्ट्रपति का तर्क कम वजनी नहीं है। उन्होंने तीन महीने की समय सीमा को ध्यान में रखा। अपने निर्णय में दर्ज कराया कि सदस्यता के मामले को देर तक लटकाए रखने से दल बदल विरोधी कानून मजाक हो जाता है। ऐसा पहले हुआ है। इसका एक इतिहास है। उसका यहां वर्णन जरूरी नहीं है। पर इतना याद दिलाना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में तीन महीने की समय सीमा में ऐसे मामलों को निपटाने का निर्देश दे रखा है।

आदर्श स्थिति की कल्पना करना भी आज कल चतुराई नहीं मानी जाती। अगर मानी जाती तो शरद यादव वही करते जो उन्होंने 1976 में किया। वे तब लोकसभा के सदस्य थे। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा रखी थी। वे जेल में थे। वहीं से लोकतंत्र के लिए अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उस समय शरद यादव ने एक आदर्श उपस्थित किया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण उनको संसदीय राजनीति में ले आए थे। जिस राजनीतिक विचारधारा के शरद यादव हैं, उसका भी तकाजा यही कहता है कि जदयू से नाता तोड़ने के बाद उन्हें राज्यसभा सदस्यता खुद छोड़ देनी चाहिए थी। नीतीश कुमार ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे शरद यादव का सम्मान कम हो। लेकिन दोनों में राजनीतिक लाइन पर मतभेद हुए। निर्वाचन आयोग ने नीतीश कुमार के नेतृत्व की जदयू को मान्यता दी है। शरद यादव को खारिज किया है। ऐसी स्थिति में जदयू के नेता की शिकायत पर उपराष्ट्रपति का फैसला आया है।

राजनीति हमेशा वह नहीं होती जो दिखाई पड़ती है। इसे शरद यादव से ज्यादा दूसरा नहीं जानता। उन्होंने अब अदालत की शरण ली है। वे पहले दिन से जानते हैं कि राज्यसभा में नहीं रह सकते। लेकिन हार मानना भी नहीं चाहते। इसी में उनकी राजनीति छिपी हुई है। वे लड़ते हुए परास्त हो जाने की राजनीति कर रहे हैं। इसी से राज्यसभा में पहुंचने की पुन: राह खुलेगी। शरद यादव इसे जानते हैं।

उपराष्ट्रपति ने शरद यादव और अली अनवर की राज्यसभा सदस्यता पर समय के भीतर फैसला सुनाकर अवसरवादी राजनीति पर गहरी चोट की है। वे जानते हैं कि उन्हें आलोचना का शिकार होना पड़ेगा। उनकी आलोचना हो भी रही है।

अड़ंगेबाजी

अयोध्या विवाद पुराना है। वह हल कैसे हो? यह हमेशा से उलझा हुआ प्रश्न रहा है। तीन तरीके से हल निकल सकता है। शुरू से ही यह माना जाता रहा है। या तो दोनों पक्ष एक समझौते पर सहमत हों। या संसद कानून बनाकर हल खोजे। या अदालत निर्णय सुनाए। किसी समझौते पर न पहुंचने के कारण मामला अदालत में है। सबसे ऊंची अदालत में अयोध्या विवाद अंतिम निर्णय के लिए पहुंचा है। इसे रोकने की कपिल सिब्बल जैसे कांग्रेसी वकील कोशिश कर रहे हैं। लगता है कि कपिल सिब्बल में उन आत्माओं का प्रवेश हो गया है जो हमेशा से हल निकालने में बाधक रहे हैं। जैसे सैयद शहाबुद्दीन। उन्हें राजीव गांधी की आत्मा का आह्वान करना चाहिए जिन्होंने अदालत से ताला खुलवाया था।

 

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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