धरोहरों को मिलेगी नई चमक!

0
284

केंद्र सरकार ने दिल्ली के लाल किला और आंध्र प्रदेश के कडापा स्थित गांधीकोटा किला के संरक्षण और संवर्धन का जिम्मा डालमिया औद्योगिक घराने को सौंपा है।

इसके बाद से सरकार की खिलाफत करने वाले धड़ों ने मामले की अपने-अपने तरीके से व्याख्या शुरू कर दी। यहां लाल किले को ‘गिरवी’ रख देने की बात तक कही गई जबकि हकीकत ये है कि सरकार के लिए यह एक अलाभकारी योजना है।

केंद्र सरकार ने पर्यटन मंत्रालय की एक योजना ‘एडॉप्ट ए हेरिटेज’ योजना के तहत यह फैसला लिया है। ‘एडॉप्ट ए हेरिटेज’ भारत सरकार द्वारा पिछले साल जारी की गई एक ऐसी योजना है जिसमें देशभर से सौ से ज्यादा इमारतों को चिह्नित किया गया था।

इन इमारतों में ताजमहल, कांगड़ा फोर्ट, कोणार्क का सूर्य मंदिर और सती घाट जैसे प्रमुख स्थल शामिल हैं। सरकार के इस नये प्रयोग से डालमिया भारत लिमिटेड काफी उत्साहित है।

डालमिया भारत लिमिटेड की ओर से बताया गया कि भारत सरकार की एडॉप्ट ए हेरिटेज (धरोहर को गोद लेने) के तहत हम पहले कॉरपोरेट बने हैं जिसने दिल्ली का लाल किला और कडापा के गांधीकोटा किला के लिए पर्यटन मंत्रालय और भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया है।

इस समझौते के बाद अब डालमिया समूह इन दोनों धरोहरों पर मूलभूत सुविधाएं देगी। सरकार और कारपोरेट के बीच होने वाले इस समझौते की दौड़ में इंडिगो एयर लाइंस और जीएमआर समूह भी शामिल था। लेकिन डालमिया समूह ने इन दोनों को पछाड़ दिया।

समझौते के मुताबिक डालमिया समूह को छह महीने के भीतर लाल किले में मूलभूत सुविधाएं देनी होंगी। डालमिया समूह लाल किला को सैलानियों के बीच और अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए काम करेगा।

साथ ही उसके सुंदरीकरण रखरखाव की जिम्मेदारी संभालेगा। इसमें एप बेस्ड गाइड, डिजिटल स्क्रिनिंग, फ्री वाईफाई, डिजिटल इंटरैक्टिव कियोस्क, पानी की सुविधा, टेक्टाइल मैप टॉयलेट अपग्रेडेशन, रास्तों पर लाइटिंग बैटरी से चलने वाले व्हीकल चार्जिंग स्टेशन सर्विलांस सिस्टम और कैफेटेरिया आदि शामिल हैं।

“समझौते के मुताबिक डालमिया समूह को छह महीने के भीतर लाल किले में मूलभूत सुविधाएं देनी होंगी। डालमिया समूह लाल किला को सैलानियों के बीच और अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए काम करेगा।”

ऐसा नहीं है कि एनडीए सरकार ने पहली बार ऐसा फैसला लिया है। संप्रग सरकार के कार्यकाल (2007) में हुमायूं का मकबरा रखरखाव के लिए  आगा खान फाउंडेशन को सौंप दिया गया था।

जबकि सरकार के राष्ट्रीय संस्कृति कोष (एनसीएफ) के जरिये कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के तहत इंडियन होटल्स कंपनी (आईटीसी) को ताजमहल तथा एपीजे ग्रुप ऑफ होटल्स को जंतर मंतर की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

नवंबर 1996 में राष्ट्रीय संस्कृति कोष (एनसीएफ) की स्थापना गई थी। भारत सरकार ने अधिसूचित किया कि एनपीएफ के अन्तर्गत किया गया कार्य दान आयकर अधिनियम की धारा 10 (23 सी)और 80 जी (2) के तहत करमुक्त होगा।

साफ है कि काफी समय पहले से देश में एक व्यवस्था बनाई गई थी जिसमें ऐसे व्यापारिक घराने देश की विरासतों को बचाने के उद्देश्य के लिए उनका कुछ क्षेत्र या पूरा क्षेत्र अधिग्रहित करते आए हैं।

इसके बदले में उन्हें उनके व्यापारिक कर में कुछ राहत मिलती है। डालमिया मामले में कुछ नया नहीं हुआ।एएसआई के एक अधिकारी बताते हैं कि देशभर में स्थित सांस्कृतिक विरासतों की देख-रेख के लिए पिछली सरकारों में भी कई व्यापारिक घरानों ने उनको गोद लिया था।

चाहे वो आगरा का ताजमहल रहा हो या देशभर में स्थित कई मंदिर। ऐसे स्थानों की पूरी सूची है जिसको अलग-अलग घरानों के द्वारा गोद लिया जा चुका है। इस पहल में ज्यादातर के परिणाम भी काफी बेहतर आए।    

सरकार के इस फैसले के विरोध में कई बातें कही जा रही है। लेकिन इसी बीच जामा मस्जिद के सलाहकार तारिक बुखारी ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर जामा मस्जिद की मरम्मत का आग्रह किया।

जिसके बाद मस्जिद की मरम्मत की गई। तारीक कहते हैं कि सरकार जामा मस्जिद की बेहतरी के लिए  और कई कदम उठाए। हमें मोदी सरकार से अपेक्षा है कि वो हमारी दरख्वास्त पर गौर करेगी।

मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे पूरी तरह से राजनीति से जोड़ा दिया है। दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ लालकिले पर प्रदर्शन भी किया।

“लाल किला, ताजमहल, इंडिया गेट, संसद भवन और राष्ट्रपति भवन ऐसे विरासत स्थल हैं जो भारत की प्रतिष्ठा से जुड़े हैं। जाहिर है इनसे जुड़े फैसले परोक्ष रूप से जनता से जुड़ जाते है। लाल किले पर मचे बवाल का कुछ ऐसा ही कारण है।”

निर्णय का विरोध करते हुए अजय माकन ने कहा कि कांग्रेसी कार्यकर्ता हर वर्ष पांच करोड़ रुपये इकठ्ठा करके केंद्र सरकार को भेजेंगे ताकि सरकार उस पैसे से लालकिले का रखरखाव कर सके।

कांग्रेस के विरोध के साथ-साथ भारतीय इतिहासकार इरफान हबीब ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया है। उनका कहना है कि सरकार को अपने फैसले पर एक बार फिर विचार करना चाहिए।

अगर उनको ऐतिहासिक धरोहरों को गोद लेना है तो पहले छोटी धरोहरों को इसमें शामिल करना चाहिए। पहले ही इस तरह की किसी बड़ी धरोहरों को इसमें शामिल करने से मकसद सफल नहीं होगा।

एएसआई के अधिकारी मामले पर बचकर बयान दे रहे हैं। अधिकारी बताते हैं कि अगर इस मामले से राजनीति को हटाकर देखा जाए तो फैसला बिल्कुल ठीक लगता है।

लेकिन जब किसी मसले पर राजनीति शुरू होती है तो उस काम की अच्छाइयां गौण हो जाती हैं। लेकिन कुछ सवाल वाजिब भी हैं, जिसका जवाब सरकार को साफगोई से जनता तक पहुंचाना होगा।

लाल किला, ताजमहल, इंडिया गेट, संसद भवन और राष्ट्रपति भवन ऐसे विरासत स्थल हैं जो भारत की प्रतिष्ठा से जुड़े हैं। ये स्मारक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जाहिर है इनसे जुड़े फैसले परोक्ष रूप से जनता से जुड़ जाते है। लाल किले पर मचे बवाल का कुछ ऐसा ही कारण है।

अगर ऐसा न होता तो आंध्रप्रदेश के कडापा में स्थित गांधीकोटा किला इस विवाद में गुमनाम न होता। फिलहाल फैसले के परिणाम को बिना देखे इतना तीखा विरोध ठीक नहीं लगता।

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here