दो नए सबूत

0
382

तीन दशक से ज्यादा पुराने बोफोर्स रिश्वत मामले में नया मोड़ आ गया है। जिसे समाप्त हुआ मान लिया गया था, वह आरोप और उससे जुड़े विवाद फिर से ताजा हो गए हैं। 

बोफोर्स सौदा 1437 करोड़ रुपए का था जो 24 मार्च, 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी बोफोर्स के बीच तय हुआ था। आरोप लगा कि 64 करोड़ रुपए की रिश्वत ली और दी गई है। 

सबसे पहले इसे 16 अप्रैल, 1987 को स्वीडिश रेडियो ने अपने समाचार में लगाया। विवाद तब से ही चला आ रहा है। वह आरोप प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर हमेशा के लिए चिपक गया। 

यही कारण था कि राजीव गांधी की पार्टी को 1989 के चुनाव में बुरी पराजय झेलनी पड़ी। उन्हें सत्ता से बेदखल होना पड़ा। विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्रीत्व काल में पहली बार 22 जनवरी, 1990 को एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू हुई। 

जांच जैसे ही बढ़ी कि उनकी सरकार को गिराने में राजीव गांधी सफल हो गए। उसके बाद कांग्रेस की सरकार आई। उससे यह उम्मीद  नहीं की जा सकती थी कि वह जांच होने दे। 

प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के कार्यकाल में ही बोफोर्स सौदे का मास्टमाइंड क्वात्रोची भारत से 29 और 30  जुलाई, 1993 की रात भागने में सफल हो गया। 

इससे सीबीआई के न केवल हाथ बंध गए, बल्कि जांच की दिशा ही बदल गई। उसे अपनी ताकत क्वात्रोची को भारत लाने में लगानी पड़ी। 

उसके खिलाफ गिरफ्तारी का गैर जमानती वारंट जारी हुआ। आरोप पत्र दाखिल हुए। लेकिन हाथ कुछ हासिल नहीं हुआ। इस दौरान क्वात्रोची की संपत्ति जब्त हुई। वह लंदन में थी। उसे वह वापस पाने में सफल रहा। 

5 साल पहले क्वात्रोची का देहांत हुआ। इसी तरह अनेक आरोपियों की मृत्यु हो चुकी है। डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के दिनों में 31 मई, 2005 को दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश आर. एस. सोढ़ी ने हिन्दुजा बंधुओं को सभी आरोपों से बरी कर दिया। 

बोफोर्स कंपनी को भी आरोपों से बरी करते हुए सीबीआई पर तीखी टिप्पणी की। उस समय भारत सरकार ने उस फैसले के खिलाफ सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट जाने की अनुमति नहीं दी। 

लेकिन वकील अजय अग्रवाल ने एक पुनर्विचार याचिका दाखिल कर हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। आज सबसे बड़ा सवाल है कि 13 साल बाद क्यों इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में लाया जा रहा है? 

इसी से जुड़ा हुआ यह भी है कि अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सरकार को पहले सलाह दी कि सीबीआई को विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर नहीं करनी चाहिए। 

उन्होंने इसका कारण बताया कि काफी विलंब हो चुका है। कायदे से सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ 90 दिन के अंदर याचिका दायर करनी चाहिए थी। 

बाद में अटार्नी जनरल ने अपनी सलाह बदली और विशेष अनुमति याचिका दायर करने के पक्ष में सलाह दी। सीबीआई का तर्क है कि अपराध तो अपराध होता है। 

उसकी कोई मियाद नहीं होती। नए साक्ष्य जब भी आ जाएं तो उसे आधार बनाकर मुकदमे को शुरू किया जा सकता है। क्या सीबीआई के पास नए साक्ष्य हैं? यही उसका दावा है कि उसके पास ठोस प्रमाण आ गए हैं। 

जिसकी इन दिनों चर्चा है और खबरों में जिसका बार-बार उल्लेख किया जा रहा है,वह माइकल हर्शमैन का एक इंटरव्यू है जिसे अक्टूबर, 2017 को एक टेलीविजन चैनल को दिया। 

उसमें उसने यह दावा किया है कि ‘फेयरफैक्स’ ने मांट ब्लांक नामक स्विस बैंक के खाते का पता लगा लिया था। इस पर राजीव गांधी बहुत खफा हो गए थे। 

आपे से बाहर हो गए थे। सीबीआई इस आरोप की फिर से जांच करना चाहती है। विशेष अनुमति याचिका का यह एक प्रमुख और नया आधार बताया जा रहा है। 

इस नए आधार से सीबीआई को अपनी पुरानी जांच से मिले एक ठोस सबूत की बहुत मजबूत कड़ी मिल गई है। इसका रहस्य सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान खुल सकता है। 

बात उस समय की है जब एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री थे। उस समय सीबीआई ने एक पारिवारिक चित्र प्राप्त कर लिया था जिसमें क्वात्रोची और राजीव गांधी का परिवार है। 

यह तो आम जानकारी है कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में क्वात्रोची की गाड़ी बिना जांच के ही 7 रेसकोर्स आती-जाती थी। बोफोर्स के मुकदमे में क्वात्रोची मुख्य अभियुक्त था। 

उसकी राजीव गांधी-सोनिया गांधी से नजदीकीपन दिखाने के लिए सीबीआई को सबूत चाहिए था जिससे मुकदमा ठहर सके। 

सीबीआई ने जमीन आसमान एक कर वह चित्र राजीव गांधी के दून स्कूल के सहपाठी से प्राप्त कर लिया था। यही वह ठोस दूसरा साक्ष्य है। 

कहते हैं कि जैसे ही सोनिया गांधी को उस चित्र की जानकारी मिली, अगले दिन ही देवगौड़ा की सरकार गिरा दी गई। संभवत: देवगौड़ा भी यह नहीं जानते। बहाना तो दूसरा बनाया गया था जो।

शेयर करें
पिछला लेखनहीं उठा हत्या के रहस्य का पर्दा
अगला लेखपहला भाषण
mm
विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here