देखो! कितना अश्लील है

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हरी नींद में था कि फोन की कर्कश आवाज से आंख खुली। फोन पर मेरे एक पत्रकार मित्र थे, उन्होंने पूछा-क्या कर रहे हो? मैंने जवाब दिया-सो रहा हूं। उन्होंने अगला सवाल दागा- रात के साढ़े ग्यारह बजे आजकल कौन सोता है? मंैने कहा–भइया मैं सो जाता हूं, बात क्या है, बताओ तो सही। वे बोले-जरा टीवी ऑन करो और देखो तुम्हारे परमप्रिय संपादक मित्र के चैनल पर कितना अश्लील फुटेज चल रहा है।

एक बाबा का स्टिंग ऑपरेशन है। मैंने पूछा- क्या सचमुच बहुत अश्लील है? उन्होंने जवाब दिया-हां बहुत ही ज्यादा अश्लील है, बिल्कुल दिखाए जाने लायक नहीं है। लेकिन तुम्हारे संपादक मित्र पिछले डेढ़ घंटे से दिखा रहे हैं और वो भी प्राइम टाइम में। मैंने कहा– और तुम पिछले डेढ़ घंटे से वही अश्लील खबर देख रहे हो बिना पलक झपकाए? इस बात पर नाराज होकर उन्होंने फोन काट दिया।

‘देखो! कितना अश्लील है’ यह भारतीय समाज एक स्थायी भाव है। हरिशंकर परसाई ने अश्लीलता के खिलाफ मुहिम पर एक दिलचस्प लेख लिखा था। एक बार कुछ उत्साही नौजवानों ने अश्लील साहित्य जब्त करके जलाने की ठानी। दुकानों पर छापे मारकर ढेर सारी अश्लील किताबें कब्जे में ले ली गईं।

लेकिन जब जलाने की बारी आई तो सबने कहा- भाई इतनी मेहनत से जब्त किया है, जलाने से पहले एक बार पढ़ तो लें। वक्त गुजरता गया। हर कोई टालमटोल करता गया। कोई कहता-अभी तो मैंने पढ़ी ही नहीं है। कोई कहता- फलां रिश्तेदार मांगकर ले गए हैं। उनके लौटाते ही मैं किताब की होली जलाने आ जाउंगा।

जब्त अश्लील साहित्य लौटकर कभी नहीं आया, इसलिए होली नहीं जली। बढ़ती अश्लीलता को लेकर समाज पहले जिस तरह चिंतित था, उसी तरह चिंतित आज भी है। न्यूज चैनल अश्लील वीडियो वाली किसी खबर के प्रसारण से पहले पूरी भूमिका बनाते हैं-यह करतूत देखकर आप हैरान हो जाएंगे। बिल्कुल दिखाये जाने लायक नहीं है, लेकिन हम जनहित में दिखा रहे हैं।

इसी भूमिका में आधे घंटे निकल जाते हैं। जनता टीवी के सामने डटी रहती है। वह जानती है कि आगे दिखाई जानेवाली चीज बहुत गंदी है, देखे जाने लायक बिल्कुल नहीं है। लेकिन चैनल जनहित में दिखा रहा है, इसलिए जनहित में देखना उसका कर्तव्य है।

चैनल के एंकर अश्लील वीडियो के नायक, नायिका या खलनायक को जी भरकर गालियां देते हैं। वे जनता से पूछते हैं-क्या ये हरकत शोभनीय है? कितनी घटिया हरकत है, जरा देखिए तो एक बार फिर। पब्लिक भी कहती है कि राम-राम यह तो बहुत ही अश्लील है।

इसके बाद जनता अगले बुलेटिन की प्रतीक्षा करती है और इस तरह चैनल की टीआरपी धकाधक बढ़ती जाती है। मुझे याद है, बहुत साल पहले एफ टीवी नाम के एक विदेशी चैनल पर अश्लील होने का इल्जाम लगा था। इसकी जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति बनाई गई थी, जिसमें पूर्व न्यायधीश, शिक्षाविद और समाजशास्त्री जैसे कई बुजुर्ग शामिल थे।

अखबारों ने खबर छापी पैनल के विशेषज्ञों ने बंद कमरे में कई घंटे तक एफ टीवी के फुटेज देखे और उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह चैनल देखे जाने लायक बिल्कुल नहीं है। इस पर तो बैन होना ही चाहिए। वाकई बिना परीक्षण के किसी भी चीज को अच्छा या बुरा कैसे कह सकते हैं?

अश्लीलता परोसने वालों से भारतीय समाज बहुत नाराज रहता है। लेकिन यह नाराजगी कुछ ऐसी है, जैसे कोई किसी होटल वाले को कहे- तेल मसाले वाले पकवान खिला-खिलाकर तुम लोगो ने मेरा हाजमा खराब कर दिया है। नेताओं के चुनावी मंच पर बार बालाएं नाचती हैं। लोग नेताजी को जमकर गालियां देते हैं। लेकिन रैली में भीड़ नाच देखने के लिए उमड़ती है,भाषण सुनने के लिए नहीं।

गांवों और कस्बों में रामलीला का मंचन होता है। रावण के दरबार में अश्लील नाच शुरू हो जाता है। जनता कहती है- घोर कलियुग आ गया है। रामलीला में ऐसा नाच! लेकिन देखने वाले हैं, इसीलिए ऐसा नाच होता है। मैने टीवी पर एक कथावाचक महात्मा जी को देखा। बता रहे थे कि घोर कलियुग आएगा तो क्या होगा। कई भयानक चीजों के अलावा उन्होंने कहा-जगह-जगह नंगे नाच होंगे।

समझ में नहीं आया कि कथामृत का पान कर रहे लोगो को डरा रहे हैं या उनके मन में आस जगा रहे हैं। अश्लीलता को लेकर भारतीय समाज के नजरिये को लेकर मुझे हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव की टिप्पणी बहुत दिलचस्प लगती है–गजोधर अंग्रेजी फिल्म देखकर आया। उसने कहा- संकटा बहुत गलत दिखाया है फिलिम में। ऐसा नहीं दिखाना चाहिए, इससे भारतीय संस्कृति का अपमान होता है। लेकिन सच बतायें संकटा मजा बहुत आया।

पाठक की प्रतिक्रिया

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