दामन पर दाग ही दाग

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त्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग गया है। राज्य की प्रतियोगी परीक्षाओं में एक के बाद एक धांधली की घटनाओं से प्रतियोगी छात्रों का विश्वास दरक गया है। यह सिलसिला सपा शासनकाल (2012) से चल रहा है।

भाजपा शासनकाल में तमाम सख्ती के बावजूद आयोग के भीतर माफिया गिरोह अब भी सक्रिय है। एक और धांधली का कारनामा विगत 19 जून को देखने को मिला।

इलाहाबाद के जीआईसी इण्टर कालेज परीक्षा केन्द्र पर पीसीएस मुख्य परीक्षा 2017 का गलत प्रश्न पत्र वितरित हो जाने से आक्रोशित प्रतियोगी छात्रों ने शहर में बवाल किया।

परीक्षा की आयोजक संस्था उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग द्वारा तत्काल 19 जून की दोनों पाली की परिक्षाओं को रद्द किये जाने और उसकी सूचना दिये जाने के बाद भी प्रतियोगी छात्रों का गुस्सा कम नहीं हुआ।

पहले आयोग के कार्यालय पर धरना प्रदर्शन किया गया, पुलिस द्वारा वहां से खदेड़े जाने के बाद छात्रों ने आयोग के आस-पास कई स्थानों पर चक्का जाम किया, पत्थरबाजी की और राजकीय सम्पत्तियों को नुकसान पंहुचाया।

परिवहन निगम की एक बस भी जला दी गई। पुलिस ने उपद्रवी छात्रों को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया और आधे दर्जन से अधिक प्रतियोगी छात्र, छात्राओं को गिरफ्तार किया। यद्यपि ऐसे छात्र,छात्राओं को उनकी परिक्षाओं के दृष्टिगत अगले दिन निजी मुचलके पर छोड़ दिया गया ।

“उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा-व्यवस्था सवालों के घेरे में है। अखिलेश यादव के शासन काल में पक्षपात का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह कायम है।”

लोक सेवा आयोग के इतिहास में शायद यह पहला अवसर था जब पीसीएस परीक्षा का गलत प्रश्न पत्र वितरित हो गया। सामान्य क्रम में यह एक मानवीय चूक प्रतीत होती है लेकिन पिछले कुछ वर्षों से आयोग की कार्यप्रणाली लगातार संदिग्ध रही है।

वह अपनी विश्वसनीयता खो चुका है और इसी कारण प्रतियोगी छात्र इस  घटना को भी चूक नहीं, साजिश मान रहे हैं। पिछले 5-7 वर्षों के इतिहास को पलटने पर आयोग के दामन पर दाग ही दाग दिखाई पड़ते हैं जिनके कारण तमाम मेधावी छात्रों का भविष्य ही खत्म हो गया।

सपा के शासनकाल में आयोग जाति विशेष का चयन आयोग बन कर रह गया। सारे नियमों कानूनों को दरकिनार कर आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष अनिल यादव मनमानी करते हुए भ्रष्टाचार की नई परिभाषा लिख गये।

यद्यपि प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद  सपा शासनकाल में हुई परिक्षाओं जिनमें पीसीएस, पीसीएस(जे), लोवर सबार्डिनेट, आरओएआरओ जैसी मुख्य  परीक्षाएं शामिल हैं, की जांच सी.बी.आई कर रही है।

“डा0 अनिल यादव आयोग के पहले ऐसे अध्यक्ष थे जिनके चयन को उच्च न्यायालय ने अवैधानिक मानते हुये रद्द कर दिया। योग्यता पर सवाल उठे थे।”

लोक सेवा आयोग की विवास्पद कार्य प्रणाली पहली बार पीसीएस परीक्षा 2011 में सामने आई थी। अध्यक्ष बनने के तत्काल बाद डा0 अनिल यादव ने भर्ती परिक्षाओं में त्रिस्तरीय आरक्षण लागू करने का निर्णय लिया।

जुलाई 2013 में पीसीएस 2011 का परीक्षा परिणाम इसी आधार पर जारी हुआ। प्रतियोगी छात्रों ने इसका व्यापक विरोध किया और न्यायालय की रोक के बाद सरकार के हस्तक्षेप पर यह निर्णय वापस हुआ।

इसके बाद तो आयोग की लगभग सभी परीक्षाओं पर अंगुली उठी, कभी परीक्षाओं में पूछे गये प्रश्नों के गलत उत्तर को सही मानने का मामला हो या फिर आयोग में चल रही गड़बड़ी को छिपाने के लिए विवादित फैसले को लागू करने का मामला, सभी पर आन्दोलन हुए और मामले न्यायालय तक गये और लगभग हर मामले में न्यायालय का निर्णय आयोग के विपरीत गया।

आयोग ने इससे कोई सबक नहीं लिया और वह अपनी मनमानी करता रहा। अभी भी 2011 से 2016 तक के प्रकरणों पर 930 रिट याचिकाए विभिन्न न्यायालयों में लम्बित बतायी जा रही हैं।

दरअसल 2012 में प्रदेश में सपा का शासन आते ही आयोग का भी राजनीतिकरण हो गया। आयोग में निठल्ले, माफिया और गुड़ों को प्राथमिकता दी गयी।

आयोग के अध्यक्ष बनाये गये अनिल यादव के विरुद्ध दाखिल जनहित याचिका में सरकार की ओर से वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आगरा ने स्वीकार किया कि आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव पर गुंड़ा एक्ट के तहत जिला बदर की कार्यवाही की गयी है।

इसी प्रकार आयोग के विरुद्ध चल रही सी.बी.आई. जांच में पता चला कि आयोग का एक अनुभाग अधिकारी अपनी कोचिंग चला रहा है। सी.बी.आई. ने उसे पकड़ा लेकिन आयोग ने उसका अनुभाग से स्थानान्तण करके अन्यत्र बैठा दिया।

दरअसल आयोग की विवादास्पद कार्य प्रणाली और एक के बाद घट रही संदिग्ध घटनाओं ने प्रतियोगी छात्रों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि यह सब पूर्व नियोजित और साजिश के तहत हो रहा है। आयोग आज भी माफिया गिरोह के जबड़े में है।

प्रदेश में सरकार भले ही बदल गई है लेकिन आयोग की कार्य प्रणाली में सुधार नहीं हुआ है। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के मीडि़या प्रभारी अवनीश पाण्ड़ेय कहते है कि उन्हें पूर्व में ही इस परीक्षा में गडबड़ी की आंशका थी। इसलिए आयोग के अफसरों को ज्ञापन सौपा था लेकिन आयोग ने कोई सतर्कता नहीं बरती।

पीसीएस मुख्य परीक्षा, 2017 भी विवादों से परे नहीं है। इसकी प्रारम्भिक परीक्षा में गलत जवाब का मामला सामने आया था। प्रतियोगी छात्रों की याचिका पर उच्च न्यायालय से गलत जवाब बदलने के आदेश भी हुए लेकिन आयोग ने शीर्ष न्यायालय की शरण ली और उसी के आदेश पर पीसीएस 2017 की मुख्य परीक्षा हो रही है।

दूसरी ओर इस परीक्षा को शुरू से टलवाये जाने का प्रयास किया जा रहा था। परीक्षा टलवाए जाने के पीछे क्या मंतव्य था, यह तो स्पष्ट नहीं हुआ लेकिन जानकारों का कहना है कि प्रतियोगी छात्रों के हितैषी होने का दावा करने वाले कई संगठन तैयार हो गये हैं।

उनकी पैठ आयोग में बैठे माफिया गिरोह में भी है और उनका एक मात्र उद्देश्य सतही लोकप्रियता प्राप्त करना और अधिक से अधिक छात्रों को अपने साथ जोड़ना है। 19 जून को ऐसे ही संगठन और छात्र राजनीति से जुड़े लोगों के शामिल होने के बाद ही प्रतियोगी छात्रों का आन्दोलन  हिंसक रूप ले लिया था।

इसी बीच एक और घटना घटी। 20 जून को सोशल मीडि़या पर परीक्षा के समाज शास्त्र के प्रश्न पत्र आउट होने की खबर के साथ ही पेपर वायरल हुआ। लेकिन संतोष की बात रही कि  इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। गलत पेपर वितरण के मामले में चूक से अलग एक कहानी सामने आ रही है।

आयोग के सचिव जगदीश की नियुक्ति सीबीआई जांच शुरू होने के बाद हुई है। उनका आयोग के पिछले कारनामों से कोई सरोकार नहीं है। सीबीआई की जांच टीम जो भी अभिलेख मांग रही है वह उसे उपलब्ध करा रहे हैं।

यह बात आयोग में बैठे माफिया गिरोह को नागवार लग रही है। वह गिरोह येन-केन प्रकारेण जगदीश को यहां से हटवाना चाहता है। नये सचिव के आने के बाद उसे समझने में वक्त लगेगा और माफियाओं को बच निकलने का अवसर मिल सकता हैं।

आयोग के कर्मचारी भी इसे चूक नहीं मान रहें हैं। ये घटनाएं स्पष्ट करती हैं कि आयोग में अभी भी सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है। आयोग अभी भी माफिया गिरोह की जकड़ में है और वह सरकार बदलने के बाद भी उसको अपने ढंग से चला रहे हैं। इससे न जाने कितने होनेहारों का भविष्य बर्बाद होने की कगार पर है।

 

 

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग गया है। राज्य की प्रतियोगी परीक्षाओं में एक के बाद एक धांधली की घटनाओं से प्रतियोगी छात्रों का विश्वास दरक गया है। यह सिलसिला सपा शासनकाल (2012) से चल रहा है।

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