दलदल में न्यायपालिका

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पिछले कई महीनों से उच्चतम न्यायालय और न्यायाधीश बेवजह समाचारों की वजह से विवादों के घेरे में हैं। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के खिलाफ महाभियोग का विवाद अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि उत्तराखण्ड के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ को शीर्ष न्यायालय में न्यायाधीश नहीं बनाने पर नया बखेड़ा खड़ा हो गया है।

विपक्ष के अनुसार न्यायमूर्ति जोसेफ ने उत्तराखण्ड में राष्ट्रपति शासन के आदेश को निरस्त किया था, इसलिए उनको पहले आंध्र प्रदेश-तेलंगाना का मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाया गया और अब उन्हें सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत नहीं किया जा रहा है।

एमओपी (मेमोरण्डम ऑफ प्रोसिजर) के तहत न्यायाधीश के लिए अनुशंसित नाम को सरकार द्वारा कोलेजियम के पास पुनर्विचार के लिए भेजा जा सकता है, परन्तु इन्दु मल्होत्रा को न्यायाधीश बनाने और जोसेफ के नाम पर आपत्ति से विवाद ने नया मोड़ ले लिया।

सरकार की तरफ से केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मोर्चा संभाला और उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को विस्तृत पत्र लिखकर न्यायाधीश की नियुक्ति में सभी वर्गों और राज्यों के प्रतिनिधित्व की मांग कर डाली।

सरकार के अनुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया ज्यादा पारदर्शी और न्यायोचित होनी चाहिए। उच्च न्यायालय से उच्चतम न्यायालय में प्रोन्नति के लिए न्यायाधीशों के नामों के चयन में ‘पिक एण्ड चूज’ प्रक्रिया में कोलेजियम की ओर से न्यायोचित कारण और तर्क नहीं दिया जाना सरकार को गवारा नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि एनजेएसी (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) कानून रद्द करते समय उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की बात कही थी तो फिर अब सरकार के सुझाव की कोलेजियम द्वारा कैसे अवहेलना की जा सकती है?

“उच्चतम न्यायालय में अनुसूचित जाति और जनजाति का कोई न्यायाधीश नहीं है। केएम जोसेफ को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नहीं बनाने पर यह मुद्दा आगे चलकर राजनीतिक बवंडर में बदल सकता है।”

दूसरी तरफ आलोचकों के अनुसार जोसेफ को उच्चतम न्यायालय  का न्यायाधीश न बनाए जाने के लिए सरकार द्वारा दिए जा रहे तर्क, तथ्यों और परंपराओं के विपरीत हैं।

कानून मंत्री ने अपने पत्र में जजों की वरिष्ठता का जिक्र करते हुए कहा है कि देश के सभी उच्च न्यायालयों की वरिष्ठता सूची में जोसेफ 42वें स्थान पर हैं और वरिष्ठता क्रम में उनके ऊपर 11 मुख्य न्यायाधीश हैं।

इस बारे में दिल्ली स्थित संस्था सेन्टर फॉर एकाउंटेबिलिटी एण्ड सिस्टमिक चेंज (सीएएससी) द्वारा न्यायाधीशों की वरिष्ठता सूची के अध्ययन के अनुसार केएम जोसेफ की मुख्य न्यायाधीश पद पर 31 जुलाई 2014 को नियुक्ति हुई थी और वे देश में 24 उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों में सबसे वरिष्ठ हैं।

जोसेफ के बाद वरिष्ठता सूची में गुजरात के मुख्य न्यायाधीश आर सुभाष रेड्डी का नाम है जिनकी नियुक्ति 13 फरवरी 2016 को हुई थी।

अमूमन उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ही उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बनते हैं तो फिर न्यायाधीशों की पुरानी वरिष्ठता के मुद्दे पर जोसेफ के मामले को उलझाने से सरकार की मंशा में संदेह होना स्वाभाविक है।

सवाल यह भी है कि यदि जोसेफ उच्च न्यायालयों की न्यायाधीशों की सूची में जूनियर हैं तो फिर उन्हें वर्तमान सरकार द्वारा 4 साल पहले 2014 में उत्तराखण्ड का मुख्य न्यायाधीश क्यों बनाया गया था ?

उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश बनने के लिए राज्यवार आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है और इसलिए दिल्ली, मुम्बई, इलाहाबाद समेत अनेक उच्च न्यायालयों  से उच्चतम न्यायालय में कई न्यायाधीश हैं।

“सवाल यह भी है कि यदि जोसेफ उच्च न्यायालयों की न्यायाधीशों की सूची में जूनियर हैं तो फिर उन्हें वर्तमान सरकार द्वारा 4 साल पहले 2014 में उत्तराखण्ड का मुख्य न्यायाधीश क्यों बनाया गया था ?”

कानून मंत्री द्वारा लिखे गए पत्र के अनुसार जोसेफ की नियुक्ति से उच्चतम न्यायालय में केरल के दो न्यायाधीश हो जाएंगे जबकि देश के 10 उच्च न्यायालयों का उच्चतम न्यायालय में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।

पत्र के अनुसार छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश टीबी राधाकृष्णन व केरल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एंटनी डोमिनिक भी केरल उच्च न्यायालय से हैं।

कानून मंत्री के पत्र के बाद कोलेजियम की बैठक में कोलकत्ता, राजस्थान और तेलंगाना-आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालयों से भी उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के पद प्रोन्नत करने का सैद्धान्तिक फैसला लिया गया।

जोसेफ समेत अन्य नामों पर अगली बैठक में विचार के बाद केन्द्र सरकार द्वारा कोलेजियम को नई अनुशंसा भेजने पर वरिष्ठता सूची पर फिर एक बहस छिड़ सकती है।

सवाल यह है कि कोलेजियम द्वारा जोसेफ के नाम की संस्तुति सर्वसम्मति से होने पर क्या उन्हें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनाया जाएगा या फिर उनकी प्रोन्नति वरिष्ठता के मकड़जाल में फंस कर रह जाएगी?

एससी/एसटी कानून के तहत गिरफ्तारी पर दिशा-निर्देशों के फैसले के बाद यह बात सामने आई कि उच्चतम न्यायालय में अनुसूचित जाति और जनजाति का कोई न्यायाधीश नहीं है।

जोसेफ को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नहीं बनाने के लिए कानून मंत्री के पत्र में एससी/एसटी वर्ग के शून्य प्रतिनिधित्व का मुद्दा आगे चलकर राजनीतिक बवंडर में बदल सकता है।

उच्चतम न्यायालय में अनुसूचित जाति के आखिरी न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन थे जो मुख्य न्यायाधीश बनकर मई 2010 में सेवानिवृत्त हुए।

देश में अनुसूचित जनजाति की बड़ी आबादी है और उस वर्ग से उच्चतम न्यायालय में आज तक कितने न्यायाधीश हुए, इसके सही आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हैं।

संविधान के अनुसार उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है और सिर्फ मेरिट के आधार पर न्यायाधीशों की नियुक्ति होनी चाहिए।

यदि राज्यों को क्षेत्रवार आरक्षण मिलने का चलन हो गया तो फिर 22 फीसद अनुसूचित जाति/जनजाति की आबादी के उच्चतम न्यायालय में प्रतिनिधित्व को कैसे दरकिनार किया जा सकेगा?

संविधान के अनुच्छेद-124 और 217 के तहत राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों  की नियुक्ति की जाती है।

इन्दिरा गांधी के शासन और आपातकाल के दौर में राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर न्यायाधीशों की नियुक्ति और प्रोन्नति होने से न्यायिक व्यवस्था में गड़बड़ी की शुरुआत हुई।

राजीव गांधी की सरकार के बाद कमजोर गठबन्धन सरकारों के दौर में उच्चतम न्यायालय की नौ जजों की संविधान पीठ द्वारा 1993 में दिये गये निर्णय के माध्यम से न्याय पालिका ने न्यायाधीशों की नियुक्ति पर एकाधिकार हासिल कर लिया।

इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में 1998 में दुबारा मान्यता दे दी। कोलेजियम व्यवस्था के तहत न्यायाधीश ही न्यायाधीश को नियुक्त करने लगे जो दुनिया के कम ही देशों में होता है।

मोदी सरकार ने न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रणाली में सुधार के लिए संसद द्वारा सर्वसम्मति से राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का कानून पारित कराया।

इस कानून में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए छह सदस्यीय आयोग के गठन का प्रावधान था जिसमें उच्चतम न्यायालय के तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ दो विधि विशेषज्ञ और केन्द्रीय कानून मंत्री को शामिल किया जाना था।

उच्चतम न्यायालय के अनुसार अदालतों में सरकारी मुकदमों की संख्या बहुत ज्यादा है, इसलिए कानून मंत्री को आयोग का सदस्य बनाने से न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का हनन हो सकता है।

इस तकनीकी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने एनजेएसी कानून को संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध बताते हुए निरस्त कर दिया। एनजेएसी कानून निरस्त होने के बाद 1993 से जारी कोलेजियम व्यवस्था फिर बहाल हो गई, जिसके तहत उच्चतम न्यायालय के पांच वरिष्ठ न्यायाधीश सभी नियुक्तियों की अनुशंसा करते हैं।

उनकी नियुक्ति के लिए केन्द्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय ने एक प्रक्रिया का निर्धारण किया है जिसे मेमोरेण्डम ऑफ प्रोसिजर या एमओपी कहा जाता है।

केएन गोविन्दाचार्य ने उच्चतम न्यायालय और सरकार के सम्मुख अर्जी दायर करके एमओपी (मेमोरेण्डम ऑफ प्रोसिजर) में बदलाव के साथ संविधान की अनुसूची-तीन के तहत न्यायाधीशों को शपथ-पत्र देने के प्रावधान को लागू करने की मांग की, जिस पर अभी तक कोई कारवाई नहीं हुई।

देश में सरकारी नौकरी के लिए करोड़ों लोग कतार में हैं तो फिर न्यायाधीशों के पद के लिए आकर्षण स्वाभाविक है। न्यायाधीश बनने के बाद भारी वेतन के साथ सभी सुख-सुविधाएं और संवैधानिक संरक्षण मिलता है जिसके तहत उन्हें महाभियोग के बगैर नहीं हटाया जा सकता।

रिपोर्टों के अनुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायाधीश, बड़े वकील, नेता और अफसरों से जुड़े 200 बड़े परिवारों का हस्तक्षेप रहता है।

कुछ दिनों पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय से 33 वकीलों का नाम न्यायाधीश बनने के लिए भेजा गया, जिनमें से 11 लोग उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों  के नजदीकी रिश्तेदार थे।

गोविन्दाचार्य द्वारा प्रस्तावित शपथ-पत्र को यदि लागू किया जाए तो न्यायाधीशों के सम्बन्धों का खुलासा होने से नियुक्तियों में पारदर्शिता के साथ भाई-भतीजावाद के मामलों में कमी आएगी।

आजादी के बाद देश में एक भी न्यायाधीश महाभियोग के तहत नहीं हटाया गया परन्तु इस सुधार को लागू करने के बाद, झूठा शपथ-पत्र देने पर उनको महाभियोग के बगैर भी हटाया जा सकेगा।

उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने भी कोलेजियम व्यवस्था की विकृतियों पर गम्भीर टिप्पणियां करते हुए ‘पेरोस्त्रोइका और ग्लास्तनोस्त’ जैसे सुधारों की जरूरत पर बल दिया लेकिन सुधारों के लिए ठोस कारवाई नहीं होने से आम जनता में हताशा है।

24 उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 1079 स्वीकृत पद हैं जिनमें से 415 पदों पर नियुक्तियां नहीं होने से रिक्तियां हैं। पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर न्यायाधीशों की नियुक्तियों में विलम्ब से आहत होने पर सार्वजनिक तौर पर रो पड़े थे।

इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने परस्पर विमर्श से मसले को सुलझाने का आश्वासन दिया था। इस साल उच्चतम न्यायालय में कोलेजियम के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अनूठी प्रेस कान्फे्रंस कर डाली।

असली वजह जानने के लिए पूरा देश आज भी बेचैन है। इस घटनाक्रम के बाद उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला दिया कि मुख्य न्यायाधीश ही मास्टर ऑफ रोस्टर हैं और उन्हें मुकदमों के आवंटन का अधिकार है।

सवाल यह है कि क्या मुख्य न्यायाधीश अपने से सम्बन्धित मामलों की स्वयं सुनवाई कर सकते हैं? पूर्व कानून मंत्री शान्ति भूषण ने मांग की है कि कोलेजियम के पांच न्यायाधीश मिलकर महत्वपूर्ण मामलों में रोस्टर का निर्धारण करें।

इस मामले पर उच्चतम न्यायालय  का फैसला आना बाकी है। कोलेजियम के सदस्य जस्टिस लोकुर ने सरकार द्वारा सिफारिशें दबाकर बैठ जाने के रवैये पर ऐतराज जताते हुए मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा था और अब उन्होंने खुली अदालत में सरकार से जवाब तलब किया है।

उन्होंने एक मामले में सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है कि कोलेजियम की सिफारिशों के बावजूद उत्तर-पूर्वी राज्यों के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति क्यों नहीं हो रही है?

सरकार की तरफ से जवाब देते हुए एटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि कोलेजियम द्वारा रिक्तियों के अनुसार नामों की सिफारिशें अग्रिम भेजी जानी चाहिए।

उनके अनुसार कुछ उच्च न्यायालयों में 40 न्यायाधीशों की रिक्तिया हैं जबकि कोलेजियम ने मात्र तीन-चार नामों की ही सिफारिश की है, फिर सरकार के ऊपर सुस्ती का आरोप कैसे लगाया जा सकता है।

नियुक्तियों पर विवाद अब अदालतों की दहलीज पार करके राजनीतिज्ञों की अखाड़ेबाजी में तब्दील हो गया है। अदालतों के अन्दर और बाहर हो रही घटनाओं से यह स्पष्ट है कि सरकार, विपक्ष, वकील और न्यायाधीशों का ही न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा नही बचा है तो फिर इस लचर अदालती व्यवस्था पर जनता कैसे भरोसा करे?

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