ताजा होती बंटवारे की स्मृति

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दे ने 71वां स्वतंत्रता दिवस मनाया है। अगस्त का पूरा महीना उत्सव सरीखा रहा, लेकिन इसी दौरान राजधानी दिल्ली के बीचोंबीच बीकानेर हाउस में एक प्रदर्शनी लगी, जिसने देश बंटवारे के दर्द को ताजा कर दिया।

9 से 24 अगस्त तक चली इस प्रदर्शनी को ‘1947 आर्काइवशीर्षक से लगाया गया था। प्रदर्शनी में कुछ वैसे सामान रखे गए थे, जिसे बंटवारे के वक्त आम लोगों ने इस्तेमाल किया था।

प्रदर्शनी में एक छोटी छुरी रखी दिखी। उसके साथ एक पर्ची में जो लिखा है, उसके अनुसार छुरी भाग मल्होत्रा नामक व्यक्ति की है। बंटवारे के समय हुए साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान सुरक्षा के लिहाज से मल्होत्रा ने उस छुरी को अपने साथ रखा था।

कहा जाता है कि ऐसे लोगों की संख्या काफी थी, जो हिंसा और भय के वातावरण में अपने पास यथासंभव धारदार हथियार रखने को विवश थे, ताकि मुश्किल घड़ी में परिवार और स्वयं की रक्षा कर सकें।

मुल्क के बंटवारे से प्रभावित लोगों से बातचीत कर बनी डॉक्यूमेंट्री भी यहां
दिखाई गई। बीकानेर हाउस के एक खूबसूरत कक्ष में प्रदर्शनी लगी थी, जो कक्ष प्रवेश
करते ही बंटवारे के दर्द का आभास करा रही थी।

उस छुरी के साथ ही धातु से बनी यह सीटी रखी है। वह नंद किशोर निजवान की है। निजवान स्वतंत्रता से पहले ब्रिटिश सेना में शामिल थे। बंटवारे के वक्त वे इस सीटी को अपने साथ भारत लेकर आए थे। देश बंटवारे के वक्त निजवान 19 साल के थे।

मुल्क के बंटवारे से प्रभावित लोगों से बातचीत कर बनी डॉक्यूमेंट्री भी यहां दिखाई गई। बीकानेर हाउस के एक खूबसूरत कक्ष में प्रदर्शनी लगी थी, जो कक्ष प्रवेश करते ही बंटवारे के दर्द का आभास करा रही थी।

70 साल पहले जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ था तो देश का बंटवारा भी हो गया। एक नए देश बनापाकिस्तान। भारत और पाकिस्तान की सीमाओं की घोषणा स्वतंत्रता के दो दिन बाद 17 अगस्त को हुई। अफरातफरी और हिंसा के बीच लाखों जिंदगियां तबाह हुई। काफी कम अंतराल में करोड़ों लोग सीमा के आरपार आए और गए। उस दौरान जो घटनाएं हुईं ‘1947 आर्काइवने प्रदर्शनी के जरिए उस स्मृति को जिंदा किया है।

इसकी वजह यही है कि समय के साथ वो स्मृतियां धुंधली पड़ती जा रही थी। जिस पीढ़ी ने बंटवारे को देखा और भोगा है, वह तेज़ी से खत्म हो रही है। उनके साथ उनकी यादें भी, लेकिन उनकी स्मृतियों को उनकी ही आवाज में संरक्षित करने की कोशिश सराहनीय है। प्रदर्शनी में दर्द का इतिहास तो है ही, लेकिन मानवता के भी खुश खूबसूरत पल सुनने को मिलते हैं।

यहां पत्थर और लकड़ी से बना यह मूसल रखा है, जो इसर दास निजवान का है। वे इसे पाकिस्तान के शहर डेरा गाजी खान से रोहतक ले आए थे। इसर दास निजवान एक हकीम थे और इस मूसल की मदद से दवाइयां पीसने का काम करते थे। उसी तरह इंद्र प्रकाश पोपली का रिफ्यूजी पहचान पत्र भी रखा दिखाई देता है। उस पत्र के अनुसार पोपली का जन्म मुल्तान में हुआ था। विभाजन के दौरान वे दिल्ली चले आए।

ऐसी कई ऐतिहासिक महत्व की चीजें बीकानेर हाउस में प्रदर्शित थीं। वहां लगी मानचित्र को देखकर कोई भी अनुमान लगा सकता था कि बंटवारे ने देश के हर कोने को प्रभावित किया। दिल्ली और लाहौर के बीच आनेजाने वालों का तो कोई हिसाब ही नहीं है।

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