ताकि बहती रहें नदियां

0
447

र्यावर्त को सात नदियों का देश कहा गया है। वे सात नदियां कौन सी थी? उनमें थोड़ा संशय है, फिर भी माना जाता है कि वे सातों नदियां नर्मदा के उत्तर में बहने वाली नदियां थी।

आज भी भारत का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन सात बड़ी नदियों पर ही निर्भर करता है। कावेरी, कृष्णा, गोदावरी, नर्मदा, सिंधु, सतलुज और गंगा।

यह युगों में होने वाली घटना है और उसका साक्षी बन रहा है वह समाज जो नदी पथ पर बसता है, नदी को गुनता है और बुनता है। हजारों साल पहले ऋषि अगस्त गंगा का जल लेकर कावेरी तक पहुंचे थे और उत्तर से दक्षिण को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने की पहल की थी।

आज जब 59 वर्षीय आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव ने दक्षिण से उत्तर की ओर यात्रा शुरू की तो लगा समय लौट आया है।इनर इंजीनियरिंगके प्रणेता सद्गुरु जग्गी वासुदेव खुद गाड़ी ड्राइव कर कोयंबटूर से दिल्ली तक यात्रा कर रहे हैं।

एक माह की इस यात्रा में वे 16 राज्यों से गुजरेंगे और कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, नर्मदा और गंगा सहित कई छोटी नदियों के मौसमी नदियों में परिवरर्तित होते जाने पर जन जागरूकता फैलाएंगे।

इस अभियान की अहमियत समझाते हुए सद्गुरू ने जोर दिया, ”सिर्फ  एक पीढ़ी में हमारी बारहमासी नदियां मौसमी हो गई हैं। कई छोटी नदियां पहले ही सूख चुकी हैं। अगर इस गंभीर स्थिति को पलटने के लिए हमने अभी कदम नहीं उठाया तो हम अगली पीढ़ी को संघर्ष और कमी की विरासत ही दे पाएंगे।तीन सिंतबर से शुरु हुई यह रैली 2 अक्टूबर को नई दिल्ली में संपन्न होगी।   

इस अभियान का ध्येय वाक्य हैं– ‘हर कोई जो पानी का इस्तेमाल करता है उसे नदी अभियान में शामिल होना चाहिए।यह आकार भी ले रहा है, जिस शहर में सद्गुरु का काफिला पहुंचता है, वहां लोगों की भीड़ उनकी एक झलक पाने के लिए उमड़ आती है। लोगों के बीच पहुंच कर सद्गुरु पेड़ लगाने और पानी बचाने की शपथ दिलाते है और हजारों हाथ एक साथ उठकर उनकी आवाज को बुलंद करते हैं।

नदियां हमारे अस्तित्व का दूसरा नाम है। उनके बहते रहने से सभ्यता पनपी।लेकिन
आज सब कुछ थम गया सा लगता है। नदी सूख रही है और सभ्यता ठहरी हुई है।

वे समझाते हैं कि कैसे आजादी के बाद से तीन गुना बढ़ी हमारी जनसंख्या का दबाव नदियों पर गया है और उन्हें दबाव मुक्त करना जरूरी है। अभियान से जुड़े टोल फ्री नंबर पर हर रोज लाखों मिस कॉल रहे हैं। करीब तीस करोड़ लोगों को मिस कॉल के जरिए नदी अभियान से जोड़ें जाने का लक्ष्य है।

ईशा फाउंडेशन हर मिस कॉल को एक वोट की तरह गिन रहा है। सद्गुरु का मानना है कि यह वोट सरकार को यह बताने के लिए है कि नदी को लेकर नीति स्पष्ट हो और निर्णायक कानून बने। इस पूरे अभियान के चार चरण हैं। वे  हैंजागरूकता फैलाना, नीतिगत प्रस्ताव पेश करना, इसे लागू करना और सबसे महत्वपूर्ण उसकी निगरानी करना।

रैली में शामिल लोगों की ओर हाथ उठाकर सद्गुरु कहते हैंकाटने में पांच मिनट लगता है और बढ़ने में पांच साल। पांच मिनट वाला काम हम कर चुके हैं। अब वक्त हैपांच साल की मेहनत का। इस नदी अभियान में सबसे ज्यादा जोर पौधारोपण पर दिया जा रहा है। जंगल की जमीन पर राज्य सरकारों से पौधारोपण करने को कहा जा रहा है और निजी खेती मालिकों से अपील की जा रही है कि वे नदी किनारे की जमीन पर बागवानी करें।

सद्गुरु के ईशा फाउंडेशन के परामर्श के बाद ही मध्य प्रदेश सरकार ने नर्मदा के किनारे छह करोड़ पौधे रोपने का विश्व रिकार्ड बनाया है। हालांकि पौधे रोपने के बाद उनकी देखभाल ना के बराबर है।

ईशा फाउंडेशन से जुड़े मुंबई के हैरी कहते हैं, हम इस स्थिति को बदलने के लिए कृत संकल्पित हैं, आज सरकारी पौधारोपण में कैजुअल्टी की दर नब्बे फीसद से ज्यादा है यानी हर दस में से बामुश्किल एकाध पौधा ही पेड़ बन पाता है। इसके उलट फाउंडेशन द्वारा तमिलनाडु में किए गए पौधारोपण की केजुअल्टी दर मात्र बीस फीसद है।

महाराष्ट्र सरकार ने भी गोदावरी के तट पर 50 करोड़ पौधारोपण का लक्ष्य रखा है। फाउंडेशन से जुड़े पर्यावरण विज्ञानियों और कानूनविदों की एक विशेषज्ञ समिति एक व्यापक नीति दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया में है। नीति मसौदे में भी नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए दोनों किनारों पर एक किलोमीटर की चौड़ाई में और छोटी धाराओं पर आधा किलोमीटर की चौड़ाई में पेड़ लगाने पर जोर दिया गया है। जानकारों का मानना है कि इससे नम मिट्टी से नदियों को साल भर पानी मिलेगा और बाढ़, सूखा तथा मिट्टी के कटाव में भी कमी आएगी।

इस रैली का उद्देश्य लोगों में नदी के प्रति भावनात्मक जुड़ाव पैदा करना है। रैलियों में शामिल लोगों को बताया जा रहा है कि हमारा शरीर हो या पृथ्वी दोनों में पानी की मात्रा तीन चौथाई है और इसकी रक्षा करने से जीवन संभव है। रैली में 13 राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल होंगे। जब रैली उनके राज्य से गुजरेगी और हर राज्य सद्गुरु के साथ नदी को पुनर्जीवित करने की शपथ लेगा।

रैली फॉर रिवरको सफल बनाने के लिए बॉलीवुड और दक्षिण के कलाकारों ने भी कमर कस रखी है। हर शहर में रैली के दौरान होने वाले कई कार्यक्रमों में फिल्मी हस्तियां, खिलाड़ी और दूसरे सेलीब्रिटीज शिरकत कर रहे हैं।

अब वक्त गया है कि राष्ट्र अपनी नदियों के बारे में मनन करे।
और हटा देउन बाधाओं को जो रोकती हैं हमारी जीवन धारा को। इसी उद्देश्य से सद्गुरु जग्गी
वासुदेव दक्षिण से उत्तर की यात्रा कर रहे हैं।

हालांकि आयोजकों की पूरी कोशिश है कि रैली को सेलीब्रिटीज ओरियंटेड नजर आए। लेकिन विभिन्न क्षेत्र से जुड़ी हस्तियां होने से उनके प्रशंसक भी आयोजन से जुड़ रहे हैं। इसके अलावा सीमा सुरक्षा बल, इफको, आईआरसीटीसी, रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया जैसे कई सरकारी और गैर सरकारी संगठन भी अभियान से जुड़ी गतिविधियों को संभाल रहे हैं।

बड़ी संख्या में कॉरपोरेट क्षेत्र भी इस अभियान को समर्थन कर रहा है। इंटरनेट के जरिए अपील लोगों तक पहुंचाने के लिए ऑनलाइन, ऑफलाइन चर्चाएं और प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं। बच्चों के लिए प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है, जिसमें उन्हें समझाया जा रहा है कि हमारी नदियां भयानक संकट के दौर से गुजर रही है। कई छोटी नदियां गायब हो चुकी है। लगभग हर बड़ी नदी राज्यों के बीच लड़ाई का मुद्दा बन चुकी है।

पानी जीवन की सबसे बुनियादी जरूरतों में से एक है। बच्चों के बीच इस व्यापक प्रसार का विचार यह है कि आने वाले वर्षों में नदी संवेदी पीढ़ी तैयार हो सके।

सद्गुरु का यह अभियान ऐसे समय शुरू हुआ है, जब तकरीबन हर नदी बाढ़ की चपेट में हैं। गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू ने राज्य सभा में बाढ़ की विभिषिका बताते हुए इसे नदी का स्वाभाविक गुण बताया, लेकिन सद्गुरु इशारा करते हैं कि ज्यादातर बाढ़ पीड़ित इलाके बाढ़ आने से ठीक पहले सूखे से जूझ रहे थे। यानी या तो बाढ़ होगी या सूखा।

पानी के उपयोग की आदर्श स्थिति खत्म होती जा रही है। साल के कई महीनों तक नदियां समुद्र तक नहीं पहुंचती, नतीजन समुद्र जमीन की ओर बढ़ता है जिससे तटीय जीवन खारा पानी के दुष्परिणाम झेलने के लिए मजबूर हो जाता है।

कावेरी को तमिलनाडु काफूड बास्केटमाना जाता है। क्योंकि राज्य का दोतिहाई अनाज इसी के किनारे उपजता है। तमिलनाडु में 39 फीसद और कर्नाटक में 11 फीसद सिंचित क्षेत्र कावेरी से पानी लेते हैं। लेकिन आज हालात यह है कि कावेरी अपने स्रोत पर ही सूख गई है।

विडंबना यह है कि 2014 में भयानक सूखे को झेलने वाला तमिलनाडु अगले ही साल भीषण बाढ़ की चपेट में गया। ये दोनों ही घटनाएं बेहद कम अंतराल में कावेरी के क्षेत्र में घटी। सबसे बड़ी प्रायद्वीपीय नदी गोदावरी की स्थिति भी दयनीय है।

गोदावरी और कृष्णा डेल्टा एकदूसरे के काफी करीब हैं और मिलकर लगभग एक करोड़ लोगों का पेट भरते हैं। पिछले साल गोदावरी में दो बार बाढ़ आई और नदी के रास्ते में आने वाले तीनों राज्यों में जानमाल का नुकसान हुआ। केवल आंध्र प्रदेश में ही करीब साढ़े पांच लाख लोग बेघर हो गए। इस सैलाब के दो महीने पहले ही गोदावरी नासिक में अपने स्रोत पर सूख चुकी थी और कुंभ मेले के दौरान डुबकी लगाने के लिए भूजल को पंप करके नदी में डाला गया।

कृष्णा की स्थिति भी चिंता में डालने वाली है। 2001 से 2003 तक लंबे सूखे के कारण कृष्णा सिर्फ एक धारा बनकर रह गई थी। पूरे तीन साल के दौरान शायद ही वह कभी समुद्र तक पहुंच पाई हो, लेकिन पिछले दोतीन सालों से उसमें लगातार बाढ़ रही है। यहां तक कि 2009 में तो कृष्णा में शताब्दी में सर्वाधिक जलस्तर दर्ज किया गया।

रैली फॉर रिवर का मध्य प्रदेश में पड़ाव इंदौर और भोपाल है। दोनों के पास अपनी कोई मुख्य नदी नहीं है, लेकिन नर्मदा पर इन शहरों की निर्भरता बढ़ती ही जा रही है। शाहगंज से पानी खींचकर भोपाल को पिलाया जा रहा है और इंदौर के आसपास मालवा का बड़ा इलाका सिंचाई के लिए नर्मदा पर ही निर्भर है। उज्जैन कुंभ को नर्मदा के पानी से ही सफल बनाने का दावा किया जा सका, क्योंकि वहां मौजूद क्षिप्रा में अपना कोई जल ही नहीं है।

नर्मदा की 101 सहायक नदियों में से 60 सहायक नदियां या तो मौसमी बन गई हैं या सूख गई हैं। नर्मदा पर डैम की शृंखला बनी हुई है जो अरब सागर तक जाती है जिसके कारण नर्मदा समुद्र तक नहीं पहुंच पाती। जिससे समुद्र आगे की ओर बढ़ रहा है, जिससे खारापन बढ़ा है, मिट्टी का क्षरण हो रहा है और उद्योगों को भारी नुकसान हुआ है।

गुजरात के कई हिस्से सिर्फ तीन दिन में सूखे से बाढ़ की चपेट में गए, जब नर्मदा और बाकी नदियों का जलस्तर बढ़ गया। 141 बाढ़ प्रभावित गांवों से करीब बीस हजार लोगों को बचाया गया। विडंबना यह है कि जब राज्य के कुछ हिस्से बाढ़ में डूबे हुए थे, उस समय उसका लगभग चालीस फीसद हिस्सा बारिश की कमी से जूझ रहा था।

इसी साल मई में इलाहाबाद प्रयाग में लोग गंगा को पैदल पार कर रहे थे और आज बाढ़ में मरने वालों का आंकड़ा हर रोज बढ़ता ही जा रहा है। यह स्थिति भारत की तकरीबन हर नदी में देखी जा सकती है। कुल मिलाकर कावेरी अपना चालीस फीसद जल प्रवाह खो चुकी है और कृष्णा और नर्मदा में पानी 60 फीसद तक कम हो चुका है।

नदी अभियान को हर क्षेत्र की शख्सियत का समर्थन मिल रहा है। तमाम राजनीतिक
दलों के नेता, धार्मिक नेता, बॉलीवुड, कन्नड़, तेलुगु, तमिल फिल्म अभिनेता,
क्रिकेटर और कॉरपोरेट प्रमुख, सभी ने ट्विटर पर नदी अभियान को समर्थन दिया है।

सद्गुरु चेताते हैं कि भारत 25 फीसद हिस्सा तेजी से रेगिस्तान बनने की ओर अग्रसर है और पेड़ ही इस कुचक्र को तोड़ सकते हैं। पेड़ की जड़े मिट्टी को छेददार बना देती है जिससे वह बारिश के समय पानी को सोख लेती है और उसे थाम कर रखती है। मिट्टी में मौजूद यह जल सालभर धीरे धीरे नदी में मिलता रहता है। अगर पेड़ नहीं होंगे तो मिट्टी बारिश के पानी को नहीं सोखेगी और बाढ़ आएगी और बारिश के बाद सूखा आएगा क्योंकि मिट्टी में नमी नहीं होगी।

हम इतनी तेजी से जमीन और जलाशयों को तबाह कर रहे हैं कि पंद्रह से बीस सालों के  अंदर हम लोगों को खाना नहीं  खिला पाएंगे और उनकी प्यास नहीं बुझा पाएंगे। वे कहते हैं ये कोई प्रलय की भविष्यवाणी नहीं है।

इस बात के स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं कि हम उसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। एक नदी को प्रभावित करने वाली सभी चीजें हमारे वश में नहीं है, फिर भी हम कुछ ठोस कदम उठा कर नदी के बहाव और साथ ही उसके आसपास की आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दे सकते हैं। सरकारों को दोष देने के बजाए सबसे सरल और प्रभावशाली तरीका है जलाशयों के आसपास पेड़ों की संख्या को बढ़ाया जाए।

हालांकि इस यात्रा में गंगा का पूरा मैदानी भाग और पूर्वी भारत अछूता है, लेकिन सद् गुरु कहते हैं कि नदी अभियान निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और वे जल्दी ही देश के उन हिस्सों में भी जाएंगे जो इस रैली में शामिल नहीं हो सके।

वैसे भी सभी राज्यों के बीच नदियों को लेकर एक सामंजस्य की बेहद जरूरत है, अभी तो सभी राज्य इस तरह बर्ताव कर रहे हैं मानों वे अपने आप में एक अलग अस्तित्व हों। हालात यह हो गए हैं कि ट्रेनों और ट्रकों से पानी ढोकर प्रभावित इलाकों में पहुंचाया जा रहा है। यही हाल रहा तो जल्दी गृह युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

सद्गुरु जोर देकर कहते हैंपांच तत्वों को आदर देने की संस्कृति को वापस लाने का समय गया है। वे कहते हैंपूरे जीवनकाल में नदी को बचाने का यह अंतिम मौका है, हमारे जीवनकाल में नहीं, भारतवर्ष के  जीवनकाल में। 

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here