डॉ. वैदिक का अन्याय

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ घोर अन्याय किया है। कैसे किया है, यह जैसे ही वे जानेंगे, उनको अफसोस होगा।

हो सकता है कि वे अपनी भूल के लिए क्षमा मांगें। उस भूल को सुधारने के लिए तप करें। भारतीय जीवन रीति में यह विधि सर्वज्ञात है। अपनी भूल सुधारने की प्रक्रिया ही तपश्चर्या होती है।

मूल बात तो अन्याय की है। उसे पहले जानें और समझें।नया इंडियाअखबार में डॉ. वेदप्रताप वैदिक रोज लिखते हैं। वह पहले पन्ने पर नीचे छपता है। उसमें उनकी तस्वीर होती है। उनका लिखा होता छोटा है, पर किसी एक सामयिक विषय पर उसमें उनकी टिप्पणी होती है। उसे पढ़ा जाता है। यह मानकर पढ़ा जाता है कि पत्रकारिता के परदादा का लिखा हुआ है। इसलिए सच ही होना चाहिए।

उसी लिखे में 11 अगस्त को जो छपा उसका शीर्षक था– ‘जैसे मोदी, वैसी सोनिया।उन दोनों में क्या कोई तुलना हो सकती है? लेकिन वैदिक जी ने की है। उनका यह दृष्टिकोण हो सकता है। पत्रकारिता की यह वास्तव में तलवारबाजी है।

लेकिन हद तो उन्होंने तब की जब यह लिखा किहमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इसभारत छोड़ोका सहीसही नाम ही पता नहीं। मोदी ने कहा किभारत छोड़ोआंदोलन का नारा थाकरेंगे या मरेंगे। जबकि नारा यह नहीं था। नारा थाकरो या मरोयह लिखकर डॉ. वैदिक ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गलत ठहराने की भारी भूल की है, जबकि प्रधानमंत्री पूरी तरह सही हैं।

क्या ऐसा उन्होंने जानकारी के अभाव में किया है?  मिथ्या ज्ञान के अहंकार में किया है? इस बारे में कोई नतीजा निकालने का जिम्मा उनका है, वे खुद क्या सोचते हैं। भारत छोड़ो आंदोलन के नारे को महात्मा गांधी ने दिया था। उसके बारे में आम धारणा वही है, जिसे डॉ. वैदिक ने लिखा है।

प्रधानमंत्री ने गांधी जी के आत्मीय शब्द को पकड़ा। उसे बताया
और 2017 में समसामयिक बनाने के लिए अपनी सृजनशीलता से बोधपरक नारा दिया
करेंगे और कर के रहेंगे

लेकिन वह सच नहीं है। सरासर नासमझी से निकली हुई वह एक भ्रामक धारणा है। जो बनी हुई है। इसे तीन आधारों पर स्पष्ट करना जरूरी है। पहला आधार है हिन्दी कागांधी मार्ग इसके जुलाईअगस्त 2008 के अंक में संपादक अनुपम मिश्र नेकरेंगे या मरेंगेशीर्षक से गांधी जी के उस भाषण का सार उन्हीं के नाम से छापा।

अपनी ओर से जो लिखा वह पढ़ लेने से भ्रम दूर हो जाता है।बहुत बड़ा अंतर था– ‘करेंगे या मरेंगेतथाकरो या मरोइसे उन्होंने समझाया और लिखा कि 8 अगस्त, 1942 को गांधी जी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में दो बार बोले। उनके मूल हिन्दी भाषण का अंग्रेजी और उस अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद ही चलता रहा है।इसी अनुवाद मेंकरेंगे या मरेंगेजैसे सुंदर आत्मीय, दृढ़ संकल्प काकरो या मरोजैसा कठोर, आदेशनुमा अनुवाद चलता रहा है।

दूसरा आधारगांधी मार्गके उसी अंक में पांच बजे सुबह 9 अगस्त, 1942 के शीर्षक से छपा गांधी जी का संदेश है जिसके अंत में दिया गया है– ‘करेंगे या मरेंगे गांधी जी ने हिन्दी में लिख दिया था– ‘करेंगे या मरेंगेगांधी मार्गमें छपी सामग्री के स्रोत की भी जानकारी लेख के अंत में दी गई है।

तीसरा है राष्ट्रीय अभिलेखागार में लगी प्रदर्शनी। जिसमें आजादी का संदेश लगाया गया है। उसमें भीकरेंगे या मरेंगेही है।

होना तो यह चाहिए था कि डॉ. वेदप्रताप वैदिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सद्प्रयास की सराहना करते। कहते कि इतिहास की तमाम भूलों को यह प्रधानमंत्री सुधार रहा है। उसमें ही एक यह भी है। प्रधानमंत्री ने गांधी जी के आत्मीय शब्द को पकड़ा। उसे बताया और 2017 में समसामयिक बनाने के लिए अपनी सृजनशीलता से बोधपरक नारा दिया– ‘करेंगे और कर के रहेंगे

सोचिए, इससे हर भारतीय में आत्मविश्वास का भाव जगता है या नहीं? इसी दृष्टि से डॉ. वैदिक को अनुभव करना चाहिए कि उनसे बड़ा अन्याय हो गया है। 

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

37 टिप्पणी

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