जैसे थे जयपाल सिंह

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मिथक का कई बार सच्चाई से सीधा नाता नहीं होता। सच्चाई कुछ और होती है। एक बार जब मिथक बन जाता है तो वही चलता रहता है। इसे गहरे उतरकर जानना हो तो माने-जाने पत्रकार बलवीर दत्त की पुस्तक मनोयोग से पढ़नी चाहिए। पुस्तक है-‘जयपाल सिंह’। झारखंड बना, लेकिन उनकी मृत्यु के तीन दशक बाद। जयपाल सिंह इसलिए हमेशा याद किए जाते रहेंगे, क्योंकि उन्होंने ‘झारखंड’ के लिए एक पार्टी बनाई थी। इसे वे सब जानते हैं जो जयपाल सिंह के नाम से परिचित हैं।

लेकिन उनकी जो जीवनी बलवीर दत्त ने लिखी है, वह जो अज्ञात था उस कहानी को कहती है। इसलिए ‘जयपाल सिंह’ ऐसी जीवनी है जो पाठक को हर पन्ने पर चकित करती है। वह सोचने के लिए विवश होता है कि क्या ऐसा भी था?

उसे समाधान तब होता है, जब वह ‘जयपाल सिंह’ में ही प्रमाण प्राप्त कर लेता है। यह पुस्तक पिछले साल आई। इसे पढ़ने पर यह लगता है कि लेखक ने सालों की खोज के बाद इसे लिखा है। यह सिर्फ जयपाल सिंह की जीवनी ही नहीं है।

इसमें उस समय की राजनीति और समाज की पूरी हलचल को पाठक चित्रवत देख सकता है। उस दौर की राजनीति का इसमें ऐसा चित्रण है जो संभवत: पहली बार एक पुस्तक में आ सका है।

कितने लोग जानते हैं कि झारखंड आदिवासी बहुल राज्य नहीं है। यह तथ्य इसमें है। एक ऐसा तथ्य भी इसमें है जो अन्यत्र नहीं मिलता। वह यह कि बिरसा मुंडा और जयपाल सिंह दोनों मुंडा कबीले से थे। यह उनमें समानता है। ‘लेकिन उनमें असमानताएं अधिक थी।’

बलवीर दत्त ने इनकी असमानताओं को तटस्थ भाव से उभारा है। इनमें तुलना उन्होंने इसलिए की, क्योंकि वे अपने जीवनकाल में ही अलौकिक पुरुष माने गए।

बिरसा मुंडा को अवतारी पुरुष माना जाता है। जो क्रांतिकारी थे और समाज सुधारक भी। ठीक विपरीत थे जयपाल सिंह। जो विशुद्ध राजनीतिक थे। उनमें अनमोल प्रतिभा थी।

लेखक ने अफसोस से लिखा है कि ‘उन्होंने उसका सही ढंग से उपयोग नहीं किया।’ एक और नया तथ्य इस पुस्तक से मिलता है कि जयपाल सिंह ‘आदिवासियों के सर्वमान्य नेता नहीं बन सके।’

जिसे आदिवासी समाज ने अलौकिक रूप में देखा हो, वह एक छोटे समुदाय का ही नेता था, यह तथ्य क्या चौंकाता नहीं? जो भी हो, पुस्तक में इसके पर्याप्त प्रमाण हैं।

जयपाल सिंह आत्म केंद्रित, भ्रमित और पलायनवादी थे। इसके विवरण से लेखक ने उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण किया है। बिना कहे यह बात बताई है कि झारखंड राज्य पहले भी बन सकता था। नहीं बना तो जयपाल सिंह ही दोषी हैं।

जयपाल सिंह के राजनीतिक जीवन की शुरुआत जिस तरह हुई, उसमें ही उनके व्यक्तित्व के दोष और दुर्गुण दोनों सामने आते हैं। वे कठोर जीवन अपनाने के लिए तैयार हो जाते तो डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सहयोगी होते।

सुविधा और शरीर सुख को प्राथमिकता देने की मानसिकता वाले जयपाल सिंह ने तब के गवर्नर सर मारिस हेलट की सलाह मानी। यह बात 1938 की है। वे आदिवासी महासभा के नेता बने। जिसे ईसाई मिशनरियों ने शुरू कराया था।

जो अंग्रेजों की चाल का एक मंच था। बलवीर दत्त ने विस्तार से उनके जीवन के हर मोड़ का वर्णन किया है। जिसमें उनकी जहां कमजोरियां सामने आती हैं वहीं जयपाल सिंह की विशेषताएं भी प्रकट होती हैं।

जैसे उन्हें पादरी बनाने में मिशन को सफलता नहीं मिली। मुस्लिम लीग से गठजोड़ उन्होंने किया, लेकिन उसके पीछे नहीं चले। इसलिए संविधान सभा का बहिष्कार नहीं किया।

जयपाल सिंह व्यवहारिक नेता थे। आजादी के बाद आदिवासी महासंघ को झारखंड पार्टी में बदला। इन दोनों के वे 24 साल  लगातार अध्यक्ष रहे। ऐसा उदाहरण सिर्फ सोनिया गांधी का है। क्यों और कैसे झारखंड संसदीय राजनीति की मंडी बना? इसे ‘जयपाल सिंह’ में खोज सकते हैं।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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