जेपी इंफ्राटेक का महाघोटाला

जेपी की योजना पैसा लेकर भागने की है। तभी जेपी इंफ्राटेक लि. को दिवालिया घोषित किया गया है। कंपनी के निवेशकों (खरीददार) का यही दावा है।

उनका आरोप है कि जयप्रकाश समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनोज गौड़ निवेशकों के 25 हजार करोड़ रुपए हजम करना चाहते हैं, जो दिवालिया हुए बिना संभव नहीं था। इसलिए कंपनी को उस रास्ते पर धकेल दिया। इससे वह निवेशकों का पैसा देने से बच जाएंगे। साथ ही उन हजारों लोगों को आवास देने की जिम्मेदारी से भी मुक्त हो जाएगे, जिसके नाम पर खरीददारों से रुपए लिए थे।

इस वजह से निवेशक आक्रोशित हैं। वे सड़कों पर उतर आए हैं। आए दिन दिल्ली से लेकर नोएडा तक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि जेपी ने साजिश के तहत खुद को दिवालिया बना लिया है। इस खेल में उनके साथ प्राधिकरण के अधिकारी भी शामिल हैं।

नेफोमा एसोसिएशन के अध्यक्ष अन्नू खान ने उसी बात को आगे बढ़ाया। वे कहते हैंनोएडा प्राधिकरण, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण और यमुना एक्सप्रेस वे प्राधिकरण के अधिकारियों ने बिल्डर के साथ मिलकर हेराफेरी की है। उन लोगों ने बिल्डरों से रिश्वत लेकर मनमाने ढंग से रियल इस्टेट के नाम पर जमीन आवंटित कर दी

जेपी इंफ्राटेक दिवालिया हो गया है। निवेशक इसे जेपी समूह की
साजिशमानते हैं। उनका मानना है कि समूह ने यह फैसला जानबूझ कर लिया। उनकी मंशा
निवेशकों का पैसा लौटाने की नहीं है।

उनके मुताबिक उस जमीन पर बिल्डरों ने कंक्रीट का ढांचा खड़ा किया। वही दिखाकर खरीददारों से पैसे ऐंठे और उसे अपने दूसरे धंधे में लगा दिया। बिल्डरों को लेकर इस तरह की चर्चा आम है। रियल इस्टेट से जुड़े दीपक बंसल कहते हैंबिल्डर खुद को अचानक दिवालिया घोषित नहीं कर रहे हैं। यह उनकी सोची समझी चाल है

वे आगे कहते हैंइसमें प्रशासन के लोग भी शामिल हैं। सबको पता था कि बिल्डर क्या करने वाले हैं? लेकिन किसी ने मुंह नहीं खोला बंसल के मुताबिक शासन और प्रशासन को मालूम रहा होगा कि जेपी क्या करने वाला है। लेकिन किसी ने कुछ बोला नहीं। वे कहते हैं कि कोई बोलता भी कैसे़? सबको अपना हिस्सा मिल चुका था। इसलिए सब उनके रहनुमा बन गए।

दीपक बंसल के दावे में कितनी सच्चाई है, वह जांच का विषय है। पर जेपी के खरीददारों ने जो दावा किया है, वह सनसनीखेज है। वे जेपी इंफ्राटेक की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए, कंपनी के लूटतंत्र और दिवालिया होने के षड्यंत्र का भंडाफोड़ करते हैं।

जेपी का लूटतंत्र

खरीददारों का कहना है कि पहले जेपी समूह ने सहारा श्री की तरह जमीन ली। वह जमीन जेपी को किस तरह कौड़ियों के दाम मिल गई, उसका अलग किस्सा है। जो भी हो, मायावती सरकार ने जेपी इंडस्ट्रीज लि. को तकरीबन 10000 एकड़ जमीन दी। वह यमुना एक्सप्रेसवे और आवासीय परिसर बनाने के लिए दी गई थी।

जेपी इंड्रस्टीज लि. ने जमीन जेपी इफ्राटेक लि. को दे दी। उसे हाइवे और आवासीय परिसर तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी। यहीं से सारा खेल शुरू हुआ। हुआ यूं, जेपी इंफ्राटेक ने हाइवे और आवासीय परिसर बनाने का ठेका जेपी एसोसिएट को दिया।

मतलब जेपी इंफ्राटेक ने जेपी एसोसिएट लि. को अपना बिल्डर चुना। इस लिहाज से वह जेपी इंफ्राटेक की जमीन पर क्रंकीट का ढांचा खड़ा करने लगे। उसी को दिखाकर जेपी इंफ्राटेक ने खरीददारों से पैसे ऐंठे और उनसे कहा गया कि फला तारीख तक मकान मिल जाएगा। पर ऐसा हुआ नहीं। मकान मिलने की तारीख बढ़ती रही। वह दिन से महीनों और फिर साल में तब्दील हो गई।

खरीददार कहते हैं कि कंपनी ने उस पैसे को अन्य जगहों पर निवेश कर दिया। उनका दावा है कि जेपी अस्पताल खरीददारों के ही पैसे से बना है। खरीददार कहते हैं कि 2015-16 में जेपी इंफ्राटेक लि. ने 2600 रुपए जेपी एसोसिएट को दिए। उसके लिए जेपी इंफ्राटेक ने जमीन गिरवी रख दी।

ऐसा एक बार नहीं हुआ है। अगर जेपी इंफ्राटेक की वार्षिक रिपोर्ट को सरसरी तौर पर भी देखा जाए तो भी इस तरह के कई मामले सामने जाते हैं। खरीददार कहते हैं कि मनोज गौड़ कंपनी के पास धन होने का दावा करते रहते हैं। ऐसा वे पिछले चार साल से कह रहे हैं। इसलिए वे आवासीय योजना पूरा नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन जब बात जेपी समूह के अन्य कंपनियों की आती है तो जेपी इंफ्राटेक के पास पैसे जाते हैं।

जेपी इंफ्राटेक लि. खरीददारों का हजारों करोड़ रुपए लेकर भागने की फिराक
में है। जेपी विश टाउन में बना जेपी अस्पताल खरीददारों के पैसे से बना है।

निवेशकों की माने तो जेपी की वार्षिक रिपोर्ट से पता चलता है कि कंपनी ने खरीददारों के पैसे से नई कंपनियां खड़ी की हैं। जहां तक बात आवासीय योजना की है तो उसे कूड़ेदान में डाल दिया। जब कोर्ट का डंडा पड़ा तो बचने का तरीका निकाला लिया। वह हैदिवालिया होने का।

इससे कंपनी को नुकसान होता नहीं। उसमें अगर कंपनी रियल इस्टेट की हो तो फिर कहना ही क्या। इसकी वजह दिवालिया कानून है। इस कानून में कंपनी की संपत्ति पर बस तीन लोगों का दावा रहता है। पहला प्राधिकरण, दूसरा बैंक और तीसरा बिल्डर। इसलिए दिवालिया कंपनी की संपत्ति को नीलाम करने से जो धन मिलता है उसे पहले इन्हीं तीनों में बांटा जाता है। खरीददार तो कहीं आता ही नहीं।

खरीददार कहते हैं कि जेपी इस बात को जानते थे। लिहाजा जेपी इंफ्राटेक ने बतौर बिल्डर जेपी एसोसिएट को चुना। कानून के मुताबिक जेपी इंफ्राटेक की संपत्ति को बेचने से जो धन आएगा उसमें बिल्डर होने की वजह से जेपी एसोसिएट का भी हिस्सा होगा।

निवेशकों का कहना है कि जेपी समूह ने पूरा खेल बहुत सोच समझ कर रचा था। इसे हम समझ नहीं पाए और जेपी के झांसे में गए।

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