जीवन और लेखन में कभी भी

0
305

कार्यक्रम तय समय पर प्रारंभ हुआ। पंडित ओम प्रकाश मिश्र के बटोहिया गायन से। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी, राम बहादुर राय, डॉ सच्चिदानंद जोशी मंच पर थे। यह सम्मान का सत्र था।

कोलकाता के शेक्सपीयर सरणी स्थित भारतीय भाषा परिषद में साहित्यकार और पत्रकार महान चिंतक डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र का सम्मान होना था। इस मंच पर केशरीनाथ त्रिपाठी के हाथों से श्री मिश्र पर केन्द्रित एक पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया। सत्र का संचालन प्रोफेसर कृपा शंकर चौबे ने किया।

महामहिम राज्यपाल श्री त्रिपाठी ने कहा कि ”राष्ट्र सर्वोपरि है, यह भावना केवल आर्थिक दृष्टि को ध्यान में रखकर लिखा गया साहित्य जागृत नहीं कर सकता। वह विभेद पैदा कर सकता है।

ऐसे समय में मिश्रजी ने जो राह हमें दिखाई है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण है।” वरिष्ठ पत्रकार एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने कहा, ‘हमारे आज के प्रतीक पुरुष और हर दृष्टि से अनुकरणीय, संस्कृति के जीते जागते उदाहरण कृति पुरुष कृष्ण बिहारी मिश्र मेरे लिए उस विद्यापति जैसे हैं, जिन्हें स्नान कराने गंगा उनके घर पहुंची थी।’

बलिया जिले के बलिहार गांव में जन्मे कृष्ण बिहारी मिश्र का जन्म चाहे उत्तर प्रदेश में हुआ हो लेकिन उनकी साहित्य सृजन की भूमि, कर्म भूमि कोलकाता ही बनी।

सारस्वत साधक कृष्ण बिहारी मिश्र के साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में अवदान को आप इस तरह भी समझ सकते हैं कि वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र की संस्कृति संवाद शृंखला में शामिल सातवें कृति पुरुष हैं।

जैसाकि उनके परिचय के साथ जो जन्म तिथि अंकित है, उस हिसाब से वे अब 82 साल के हो गए हैं, उनके जन्म का साल उनके परिचय के साथ 1936 दर्ज है।  श्री मिश्र बबुना देवी और घनश्याम मिश्र की इकलौती संतान हैं।

उनकी पढ़ाई लिखाई काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की है। वहां श्री मिश्र हजारी प्रसाद द्विवेदी और आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के प्रिय शिष्य थे।

कोलकाता में जब मिश्रजी के पिताजी घर ले रहे थे, उस वक्त मां बबुना देवी ने आशंका जताई थी कि वहां घर ले रहे हो, ऐसा न हो कि कृष्ण बिहारी कोलकाता के ही होकर रह जाएं और बलिया का बलिहार गांव छूट ही जाए।

मां की बात सच साबित हुई। वे कोलकाता ऐसे गए कि कोलकाता के ही होकर रह गए। श्री मिश्र ने कोलकाता विश्वविद्यालय से हिन्दी पत्रकारिता में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। मिश्रजी जितने उत्तर प्रदेश के हैं, उतने ही पश्चिम बंगाल के हैं।

इसी प्रकार मिश्रजी जितने हिन्दी पत्रकारिता के हैं, उतने ही हिन्दी साहित्य के भी हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण कार्य के लिए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने डी लिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया।

ज्ञानपीठ ने साहित्य के लिए उन्हें मूर्तिदेवी सम्मान दिया और डॉ हेडगेवार पुरस्कार से सम्मानित किए गए। 11 फरवरी को कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद में हुए एक दिवसीय आयोजन के संबंध में बात करते हुए कृष्ण बिहारी मिश्र का परिचय देना इसलिए जरूरी था।

क्योंकि इस पूरे दिन के आयोजन के केन्द्र में वही थे। सारस्वत साधक कृष्ण बिहारी मिश्र के साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में अवदान को आप इस तरह भी समझ सकते हैं कि वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र की संस्कृति संवाद शृंखला में शामिल सातवें कृति पुरुष हैं।

उनसे पहले जिन छह संस्कृति साधकों की पहचान कला केन्द्र ने की, वे नाम हैं, नामवर सिंह, स्वामी रामनुजाचार्य, डॉ एमएस सुब्बालक्ष्मी, प्रो देवेन्द्र स्वरूप, प्रोफेसर बीबी लाल, लोकनायक जयप्रकाश। इसी कड़ी में सातवां नाम डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र का है।

सम्मान सत्र के अतिरिक्त तीन सत्र पूरे दिन में हुए और अंत में कृष्ण बिहारीजी के ऊपर तैयार एक वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया गया। कृष्ण बिहारी मिश्र अपने वक्तव्य में बेहद भावूक थे।

जिस सहजता से वह उन्हें सुनने और उनके सम्मान का साक्षी होने आए लोगों से मिल रहे थे, वह वास्तव में उनके पूरे व्यक्तित्व की तरफ आकर्षित करने वाला था। 82 साल की उम्र में उनकी सक्रियता भी देखते ही बनती थी।

अपने वक्तव्य में वे बेबाक लगे। गांधी की चम्पारण यात्रा के शताब्दी वर्ष को बिहार में जिस तरह मनाया गया, उसे श्री मिश्र ने घिनौना कहा। बकौल मिश्र, ‘गांधीजी के नाम पर जो आयोजन हुए, वे चंपारण में हुए, और न जाने कहां-कहां हुए? उनमें कितना तमाशा था? गांधीजी के जीवन चरित्र से कुछ भी लेना-देना नहीं था।

वे एक बेहद सहज हृदय साहित्यकार-पत्रकार हैं। उम्र के आठ दशक
को पार कर जाने के बाद भी उनकी सक्रियता कम नहीं हुई है।

एक मजाक था जो गांधीजी के नाम पर हो रहा था।’ श्री मिश्र ने यह भी कहा कि ‘गांधीजी का विरोध अंग्रेजों से नहीं, अंग्रेजी से था।’ इंदिरा राष्ट्रीय कला केन्द्र और इसके अध्यक्ष राम बहादुर राय के प्रति उन्होंने अपना आभार प्रकट किया।

उद्घाटन सत्र के बाद कार्यक्रम आगे बढ़ा। पहला सत्र कृष्ण बिहारी मिश्र की पत्रकारिता और संपादन पर केन्द्रित था। अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने की। वक्ता के तौर पर विजय दत्त श्रीधर, डॉ सच्चिदानंद जोशी, प्रो रामेश्वर मिश्र की सहभागिता रही।

इस सत्र का संचालन अजयेन्द्रनाथ त्रिवेदी ने किया। संवाद का दूसरा सत्र निबंध और संस्कृतिमूलक चिंतन पर था। अध्यक्षता कैलाश चंद पंत ने की। इस सत्र में उदयन वाजपेयी, वंदना मुकेश शर्मा की सहभागिता रही। कमलेश कृष्ण ने इस सत्र का संचालन किया।

दूसरे सत्र तक कार्यक्रम अपनी समय सीमा को पार कर चुका था। कृष्ण बिहारी मिश्र चर्चा का मुख्य विषय जरूर थे लेकिन वक्ता बोलने की पर्याप्त आजादी ले रहे थे। इसकी वजह से समय का अनुशासन भी टूटा और विषय से भटकाव की स्थिति भी उत्पन्न हुई।

दिन का अंतिम सत्र महत्वपूर्ण था। यह सत्र कृष्ण बिहारीजी के संस्मरण और जीवनी पर केन्द्रित था। तीसरे सत्र तक शाम हो गई थी। अगली पंक्ति में मेरी नजर गई। वहां अपनी धोती को सहेजते कृष्ण बिहारीजी बैठे हुए थे।

82 वर्षीय श्री मिश्र को सुबह से शाम तक अपने साथ पाकर ऐसा लग रहा था कि कोलकाता में आयोजन होने के नाते वह उसमें अपनी भूमिका सिर्फ आयोजन के केन्द्र में होने तक की नहीं मान रहे थे।

बल्कि आयोजन स्थल कोलकाता होने की वजह से वे अपनी भूमिका मेजबान की भी मान रहे थे। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि कितनी बड़ी-बड़ी विभूतियां उनके घर तक आई हैं। वे एक बेहद सहज हृदय साहित्यकार-पत्रकार हैं।

उम्र के आठ दशक को पार कर जाने के बाद भी उनकी सक्रियता कम नहीं हुई है। संस्मरण और जीवनी वाले सत्र की अध्यक्षता विजय बहादुर सिंह ने की।

इस सत्र में राम बहादुर राय, प्रोफेसर अवधेश प्रधान, डॉ प्रेमशंकर त्रिपाठी और डॉ अरूण होता की भागीदारी रही। सत्र का संचालन डॉ अभिजीत कुमार सिंह ने किया।

पूरे दिन के आयोजन का समापन अभिषेक चतुर्वेदी द्वारा तैयार वृत्तचित्र ”साहित्य भूषण कृष्ण बिहारी मिश्र” से हुआ।  कार्यक्रम तय समय सीमा से अधिक समय तक चला। शाम से रात हो चली थी।

यह कृष्ण बिहारी मिश्र के प्रति कोलकाता के लोगों का प्रेम था, जिसकी वजह से पूरा सभागार धन्यवाद ज्ञापन तक सभागार में बना रहा। ऐसा कम ही देखने को मिलता है।

गौरतलब है कि एक वक्ता को बीच में कृष्ण बिहारी मिश्र के एक प्रशंसक ने रोकने का प्रयास किया। वक्ता ने श्री मिश्र की आर्थिक स्थिति को लेकर निजी टिप्पणी की थी जिससे उनके प्रशंसक को ठेस को पहुंची थी।

ऐसा दृश्य आज के समय में दुर्लभ है। उनके लेखन और जीवन में एक साम्य दिखता है कि उन्होंने दोनों भूमिकाओं में मूल्यों से समझौता करना स्वीकार नहीं किया।

‘आज के प्रतीक पुरुष और हर दृष्टि से अनुकरणीय, संस्कृति के जीते जागते उदाहरण कृति पुरुष कृष्ण बिहारी मिश्र उस विद्यापति जैसे हैं, जिन्हें स्नान कराने गंगा उनके घर पहुंची थी।’

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here