जवाब मांगते सवाल

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म्मू कश्मीर के कठुआ में एक अबोध बालिका से कथित सामुहिक दुराचार और हत्या प्रकरण में आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट उसकी सुनवाई जम्मू की बजाय पंजाब के पठानकोट में करने का आदेश दे चुकी है।

यह भी कि उसकी सुनवाई रोजाना होगी। लेकिन मामले में जो सवाल पहले अनुत्तरित थे, वे अब भी हैं। एक- जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दुराचार की पुष्टि नहीं हुई तो आरोप पत्र में सामूहिक दुराचार की बात क्यों लिखी गई? दो- 10 दिन के भीतर तीन जांच टीमों का गठन क्यों किया गया?

तीन- एक जांच टीम में दो ऐसे पुलिस अफसरों को क्यों रखा गया जिन पर एक लड़की से दुराचार और दुराचार के सबूत मिटाने के आरोप लगे थे? चार-जांच टीमों में जम्मू की बजाय कश्मीर के अधिकारी क्यों रखे गए?

पांच- सांझीराम पटवारी के जिस पुत्र विशाल जंगोत्रा को दुराचार का आरोपी बनाया गया, वह वारदात के दिन उत्तर प्रदेश के मेरठ में अपनी परीक्षा दे रहा था, इसकी जांच क्यों नहीं की गई? छह- वारदात के दिन उसकी लोकेशन मेरठ के एक एटीएम से पैसे निकालते मिली तो उसका संज्ञान क्यों नहीं लिया गया? ऐसे अनेक सवाल तर्कसंगत उत्तर की तलाश कर रहे हैं।

सच अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है। जिस सच की ओर सोशल मीडिया का एक समूह दबे स्वर में संकेत कर रहा था, उस सच से सामना हुआ दिल्ली से जम्मू गई जीआईए (ग्रुप आफ इंटेक्टुअल्स एण्ड एकेडिमीशियंस) की एक पांच सदस्यीय टीम का।

“17 जनवरी, 2018 को जब बच्ची का शव रसाना गांव में पाया गया तो इलाके के हिंदू और मुस्लिम समान रूप से दुखी और गुस्से में थे। जब 17 जनवरी को इलाके के लोगों ने प्रदर्शन किया तो उसमें सैंकड़ों की संख्या में हिंदू शामिल थे।”

इस टीम में पांच महिलाएं शामिल थीं। नागपुर जिला न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश मीरा खड़केकर, सुप्रीम कोर्ट की वकील मोनिका अरोड़ा, वरिष्ठ पत्रकार सर्जना शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय के ख्यातिनाम कालेज मिरांडा हाउस में सहायक प्रोफेसर सोनाली चितलकर और सामाजिक कायकर्ता मोनिका अग्रवाल ने वहां तीन दिन (23 से 25 अप्रैल) तक दौरा कर मामले की तह तक जाने की कोशिश की।

सारे विरोधाभास, पूर्वाग्रहभरा आरोप पत्र, प्रकरण में हस्तक्षेप करने वाले बाहरी तत्वों के बारे में पता किया। उनकी मुलाकात न्याय मांगने वाले सांझीराम परिवार,कथित वारदात वाले रसाना गांव के लोगों के साथ ही कई सामाजिक संगठनों और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से भी हुई।

वहां से लौटकर एक प्रतिनिधिमंडल केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह से मिला। इन दोनों को अपनी रिपोर्ट सौंपकर मामले की सीबाआई जांच की मांग की।

जांच टीम की सदस्य सर्जना शर्मा बताती हैं कि मामले में बड़ी साजिश रची गई। पहले ही दिन से उसे हिंदू-मुस्लिम रंग देने की कोशिश की गई। साजिश के तहत ही चालान को अदालत में दाखिल करने से पहले मीडिया के चुनिंदा हिस्से को पीडि़ता के नाम और फोटो सहित उपलब्ध करा दिया गया।

मीडिया उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुप्रचारित करने में जुट गया।

अब वारदात के बारे में। ये घटना 10 जनवरी 2018 से 17 जनवरी 2018 के बीच घटित हुई बताई गई।

हालांकि, मीडिया की सुर्खियों में इससे जुड़ी खबरें मार्च 2018 से आनी शुरू हुईं। अप्रैल तक राष्ट्रीय और अतंरराष्ट्रीय मीडिया में ये एक बड़ी खबन बन गई, जिस पर देशव्यापी चर्चा शुरू हो गई। धीरे-धीरे इस घटना ने सांप्रदायिक रंग ले लिया।

जांच टीमों पर सवाल

12 जनवरी, 2018 से 23 जनवरी, 2018 की अल्पावधि में एक के बाद एक तीन जांच दलों का गठन किया गया। एक-12 जनवरी, 2018 से 18 जनवरी, 2018 तक हीरानगर के थानाध्यक्ष ने जांच की।  

दो- 19 जनवरी, 2018 से 20 जनवरी, 2018 तक सांबा के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक आदिल हामिद रज़ा ने जांच की। तीन- 23 जनवरी, 2018 से प्रकरण जम्मू पुलिस की अपराध शाखा को सौंप दिया गया। इस जांच टीम के तीन सदस्य कश्मीरी हैं।

एक-नावेद पीरज़ादा,अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक,अपराध शाखा) कश्मीर (जांच दल का प्रमुख)। दो- निसार हुसैन, उप पुलिस अधीक्षक अपराध शाखा, जम्मू (इनके खिलाफ एक अन्य मामले में सबूत मिटाने का आरोप)।

तीन- श्वेतांबारी शर्मा, उप पुलिस अधीक्षक अपराध शाखा जम्मू। चार- इरफान वानी, उप निरीक्षक अपराध शाखा, जम्मू (कश्मीरी, एक हिंदू युवक की हिरासत में मौत और उसकी नाबालिग बहन से बलात्कार के मामले में आरोपी)।

छह- तारिक अहमद, सहायक उपनिरीक्षक, कश्मीर (कश्मीरी)। टीम में अपर पुलिस अधीक्षक (अपराध शाखा) जम्मू के अलावा तीन कश्मीरी हैं। जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में ऐसे संवेदनशील मामले में जांच दल के पांच में से तीन सदस्य कश्मीरी क्यों? टीम के दो सदस्य सहायक उपनिरीक्षक  इरफान वानी और उप पुलिस अधीक्षक निसार हुसैन पर गंभीर अपराध के आरोप हैं।

दो रिपोर्ट में विरोधाभास

एक-आरोप पत्र में जिक्र है कि कम-से-कम तीन व्यक्तियों ने कई दिन तक सामूहिक दुराचार किया। पोस्ट मार्टम रिपोर्ट में वर्णित जख्मों से ये मेल नहीं खाता। (एक अन्य 8 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या के एक मामले की पोस्टमार्टम रिपोर्ट की तुलना करने पर टीम ने पाया कि उस बच्ची के गुप्तांगों पर गहरे जख्म थे और अत्यधिक रक्तस्त्राव हुआ।)

“कठुआ प्रकरण निरंतर सुर्खियों में है ।इस पर अदालत का जो भी फैसला हो लेकिन वे सवाल बने रहेंगे जिनको जम्मू के लोग उठा रहे हैं।”

लेकिन, कठुआ प्रकरण की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बच्ची के शरीर पर ऐसे जख्मों का कतई जिक्र नहीं है। पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार केवल खरोंचों का जिक्र है, जख्मों का नहीं।

दो-आरोप पत्र में  लिखा गया है कि मौका-ए-वारदात ‘देवी-स्थान’ है जबकि वास्तव में यह ‘देव-स्थान’ है। इसमें रसाना और आस-पास के गांवों के कुल-देवता स्थापित हैं। एक कमरे का ये ‘देव-स्थान’ 2035 फीट का है और इसमें नाममात्र के फर्नीचर हैं।

गांव के लोगों ने बताया कि 13,14 और 15 जनवरी को यहां लोगों की आवाजाही बड़ी संख्या में रही। लोग अपने कुल-देवताओं की पूजा करने आ रहे थे।  13 जनवरी को लोहड़ी, 14 जनवरी को मकर संक्रांति और 15 जनवरी, 2018 को हवन और भंडारा हुआ।

पहला सवाल- क्या साढ़े तीन फीट की मेज के नीचे चार फीट लंबी लड़की को छुपाना संभव है? दो- क्या ऐसे किसी कमरे में एक लड़की को छिपाया जा सकता है जहां पर तीन दरवाजे और तीन खिड़कियां हैं? खिड़कियों पर शीशे या लकड़ी के पल्ले नहीं हैं, केवल लोहे की ग्रिल है।

तीन- क्या ये एक ऐसी सुनसान जगह है जहां आठ साल की एक लड़की को बेहोशी की दवा देकर छुपाया जा सकता है? चार- आरोप पत्र के अनुसार अपराध के दिनों में विशाल जंगोत्रा रसाना गांव में मौजूद था।

हालांकि, विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार विशाल जंगोत्रा उत्तर-प्रदेश के मेरठ में था और अपराध के दिन उसने परीक्षा भी दी और अपने इलाके में एटीएम का इस्तेमाल भी किया।

पांच- वह स्थान जहां बच्ची का शव मिला। आरोपी सांझी राम के घर के पास बच्ची का शव पाया गया। (सांझी राम के घर के पास बच्ची के शव की बरामदगी कई सवाल खड़े करती है। एक कथित हत्यारा अपने घर से महज 100 मीटर की दूरी पर शव क्यों फेंकेगा?

जबकि, रसाना गांव के आस-पास जंगल ही जंगल हैं, नाले और तालाब हैं।) छह- आरोप पत्र के अनुसार मृतक बच्ची को भूखा रखा गया और बेहोशी की दवा दी गई। जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि उसकी आंतों में पचा हुआ भोजन था। (यदि बच्ची की आंतों में पचा हुआ भोजन था तो उसने मल-मूत्र त्याग कहां किया? ‘देव-स्थान’ में मल-मूत्र के कोई सुबूत नहीं मिले हैं)।

सात- घटना के कई दिनों बाद बच्ची का एक बाल क्राइम टीम को मिला जो उसके बालों से मैच करता है। (घटना जनवरी, 2018 को हुई थी। गांव के लोगों के अनुसार ‘देव-स्थान’ की हर रोज सफाई की जाती है। सवाल ये उठता है कि इतने दिनों के बाद एक ही बाल क्यों मिला? आरोप पत्र के अनुसार बच्ची को भारी दरी में लपेटकर रखा गया था, फिर दरी से बच्ची के बाल क्यों नहीं मिले?

इतने सारे सवालों के जवाब मिलने मुश्किल लगते हैं। कारण साफ है। मामले में जबरदस्त राजनीति हो रही है। सत्तारूढ़ पीडीपी के नेता और खुद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने गैर जिम्मेदारी का परिचय दिया है। भारतीय जनता पार्टी ‘बैकफुट’ पर है।

मामले में हस्तक्षेप करने वाले उसके कोटे के दो मंत्रियों का इस्तीफा ले लिया गया। माना जा सकता है कि प्रकरण जितना गंभीर है उतना ही जटिल भी।

उसकी तह तक शायद ही पहंचा जा सके। सर्जना शर्मा बताती हैं कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री से मिलने के बाद आशा है कि इस मामले में न्याय होगा।

कौन थे मोटरसाइकिल सवार?

16 जनवरी, 2018 को देर शाम रसाना गांव के एकमात्र ट्रांसफर में जोरदार धमाका हुआ और पूरा गांव अंधेरे में डूब गया। गांव के निवासी बिशन दास शर्मा (सेना से रिटायर) ने रात को ढाई बजे देखा कि बुलेट मोटरसाइकिल पर सवार दो व्यक्ति कंबल ओढे हुए गांव में ऊपर की तरफ जा रहे थे।

बिशन दास शर्मा का घर गांव में प्रवेश करते ही दाईं ओर पड़ता है। 16 जनवरी की रात को ढाई बजे लघुशंका के लिए उठे थे। लगभग आधे घंटे के बाद मोटरसाइकिल सवार गांव से वापस चले गए।

उन्होंने वापसी की आवाज भी सुनी। अगली सुबह यानी 17 जनवरी की सुबह बच्ची का शव सांझीराम के घर के पीछे पाया गया। बिशन दास शर्मा ने जांच टीम को बार-बार ये बात बताई, लेकिन इस पहलू पर उसने कोई जांच नहीं की।

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