जरूर पढ़ें- कूड़ा-धन

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पुस्तक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक पत्र है। जिसमें उन्होंने आशा व्यक्त की है कि ‘आपने अपनी पुस्तक में कचरा प्रबंधन से जुड़ी जिन नई तकनीकों और विकल्पों को समाहित किया है उनसे लोगों को इस दिशा में कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी।’ वास्तव में यह पुस्तक प्रेरक की भूमिका निभाने में समर्थ है।

जिस पुस्तक की उपयोगी जानकारी घर-घर पहुंचाई जानी चाहिए, उसके बारे में मीडिया में चुप्पी है। यह अफसोस की बात है। ऐसा भी नहीं है कि मीडिया को पुस्तक की जानकारी न हो।

ज्यादा दिन नहीं हुए। कांस्टीट्युशन क्लब में  केंद्रीय मंत्रियों की मौजूदगी में उसका लोकार्पण हुआ। लेकिन इस असाधारण पुस्तक के बारे में कहीं कुछ न लिखा गया और न बोला गया।

पुस्तक है-कूड़ा-धन। खोज-खोज कर दीपक चौरसिया ने इसमें घर-बाहर की सफाई के गुर बताए हैं। जो उपयोगी तो हैं ही, आसान भी हैं।

पत्रकार दीपक चौरसिया ने ऐसा सराहनीय काम किया है जो हर किसी के लिए अनुकरणीय है।

इस पुस्तक की अनेक विशेषताएं हैं। सबसे पहली यह कि इसे पढ़ते वक्त मन पर बोझ नहीं पड़ता। लगता है कि सूचनाओं के सागर में आनंदपूर्वक गोते लगा रहे हैं।

“खोज-खोज कर दीपक चौरसिया ने इसमें घर-बाहर की सफाई के गुर बताए हैं। जो उपयोगी तो हैं ही, आसान भी हैं।”

आनंद इस बात का कि अपने आस-पास की दुनिया को इस पुस्तक की सूचनाओं से बदला जा सकता है। हम किसी को कोसने में माहिर हैं। ठीक इसके विपरीत यह पुस्तक व्यवहारिक पहल की प्रेरणा देती है।

इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक पत्र है। जिसमें उन्होंने आशा व्यक्त की है कि ‘आपने अपनी पुस्तक में कचरा प्रबंधन से जुड़ी जिन नई तकनीकों और विकल्पों को समाहित किया है उनसे लोगों को इस दिशा में कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी।’

वास्तव में यह पुस्तक प्रेरक की भूमिका निभाने में समर्थ है। पुस्तक कोई भारी भरकम नहीं है। सिर्फ 182 पेज की है। लेकिन इसमें प्रामाणिक और व्यवहारिक सूचनाओं का बड़ा खजाना है। इसमें कुल दस अध्याय हैं।

हर अध्याय आधुनिक और शहरी जीवन की रोजमर्रा वाली समस्याओं का हल बताता है। प्रस्तावना में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने पुस्तक को सकारात्मक और सार्थक बताया है।

दीपक चौरसिया ने विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया है कि ‘मैं तो केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के अनुभवों को संकल्ति भर कर रहा हूं।’ पर इतना ही नहीं है।

सच यह है कि दीपक चौरसिया ने लगन पूर्वक स्वच्छ भारत मिशन को जमीन पर साकार करने के अनमोल सूत्र इसमें दे दिए हैं। इसके तथ्य, व्यवहारिक प्रयोग और उसके वर्णन पढ़कर कोई भी अचंभित रहे बिना नहीं रह सकता।

जैसे यह कि कूड़े के प्रबंधन से पांच लाख करोड़ की कमाई हो सकती है। लाखों लोगों को रोजगार मिल सकता है। ऐसी बातें नितिन गडकरी अक्सर कहते और समझाते हैं।

लेकिन उनके कहे को कम लोग सुनते हैं। जो सुनते हैं वे इसलिए कि उनका आदर करते हैं। यह पुस्तक उनके कहे में कितनी सचाई है और उससे कितनी कमाई हो सकती है, इसका उदाहरण सहित विवरण देती है।

‘‘पुस्तक कोई भारी भरकम नहीं है। सिर्फ 182 पेज की है। लेकिन इसमें प्रामाणिक और व्यवहारिक सूचनाओं का बड़ा खजाना है। इसमें कुल दस अध्याय हैं।’’

स्वच्छ भारत के मिशन से कचरे के प्रबंधन का प्रश्न मुंहबाए खड़ा था। किसी को इसका जवाब सूझ नहीं रहा था। तभी नितिन गडकरी ने अचंभित करते हुए मानो नया मंत्र दिया- कचरे से कमाई।

उसके प्रयोग उन्होंने करके दिखाए हैं। जब इसकी जानकारी दीपक चौरसिया को बातचीत में मिली तो उन्हें यकीन नहीं आया। लेकिन प्रत्यक्ष देखा। नागपुर के प्रयोग का कमाल देखा।

फिर वे ऐसे प्रयोगों की खोज में लगे। उससे पहले उन्होंने नितिन गडकरी का लंबा इंटरव्यू किया। जो पुस्तक में है। उस अध्याय का शीर्षक है कूड़े का अर्थशास्त्र।

पुस्तक के हर अध्याय और हर पन्ने पर कचरे से क्या-क्या कमाल हो सकता है इसके उदाहरण दिए गए हैं। ऐसे उदाहरणों से युवा उद्यमी बहुत कुछ सीख सकते हैं।

इस पुस्तक में घर के कचरे का प्रबंधन कैसा हो और वह किस तरह कमाई का भी जरिया बन सकता है इसके भी प्रयोगों को इसमें समझाया गया है।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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