जय किसान

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देर से ही सही, लेकिन खरीफ की फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य  (एमएसपी) लागत का डेढ़ गुना किया जाना खेती-किसानी के संकट निवारण की दिशा में बड़ी पहल है।

केंद्र सरकार द्वारा खरीफ की 14 फसलों के लिए एमएसपी में उत्साहवर्धक बढ़ोतरी से न सिर्फ कृषि जगत को राहत मिली, बल्कि पिछले कई वषों से फसलों के गिरते दाम व एमएसपी न मिलने से हताश किसानों को उम्मीद की एक किरण नजर आई है।

खरीफ वर्ष 2018-19 के लिए साधारण धान के एमएसपी में 200 रुपये प्रति क्विंटल के इजाफे के साथ इसकी कीमत 1750 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित की गई है जो कि घोषित 1166 रुपये के लागत मूल्य से 50.09 फीसद अधिक है।

पिछले वर्ष धान का एमएसपी 1550 रुपये प्रति क्विंटल था। पिछले कई वषों से इसके एमएसपी में सांकेतिक बढ़ोतरी की तुलना में इस बार धान उत्पादकों को प्रति  क्विंटल 200 रुपये की भारी बढ़ोतरी मिलेगी।

इससे पूर्व राजग शासन के दौरान इसमें महज 50 से 80 रुपये प्रति क्विंटल की ही बढ़ोतरी की गई थी। वर्ष 2012-13 के संप्रग शासन के दौरान धान के एमएसपी में सर्वाधिक 170 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई थी जिसके बाद से किसान एमएसपी के अच्छे दिनों की बाट जोह रहे थे।

“सभी किसानों को एमएसपी का लाभ दिलाना उनकी गरीबी को दूर करने का एक प्रमुख साधन हो सकता है। लेकिन इस मार्ग में कुछ समस्याएं भी हैं।”

सच है कि नए एमएसपी में सभी फसलों की लागत पर 50 फीसद का लाभकारी मूल्य निर्धारित किया गया है, लेकिन इस तथ्य की अनदेखी भी नहीं की जा सकती कि इन फसलों की लागत में भी बढ़ोतरी हुई है जो अन्य वषों की तुलना में अधिक है।

वहीं इनके एमएसपी में हुई बढ़ोतरी से सरकार पर खाद्य सब्सिडी का बोझ बढ़कर दो लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंचने का अनुमान है। लागत पर 50 फीसद का मूल्य देने के अंकगणित में यह भी अनुमानित है कि इससे राजकोष पर लगभग 15,000 करोड़ रुपये का बोझ बढ़ेगा।

इस बीच महंगाई दर में वृद्धि से आशंकित अर्थशास्त्रियों समेत चंद अर्थजीवियों की प्रतिक्रिया हैरान करने वाली रही। अफसोसजनक है कि जब कभी ऋणमाफी, खाद्य सब्सिडी, एमएसपी या अन्य किसानी सहयोग की पहल होती है तो वित्तीय संस्थानों द्वारा उत्साहवर्धक सराहना नहीं की जाती।

हजारों करोड़ रुपये की औद्योगिक सब्सिडी तथा लाखों करोड़ रुपये का एनपीए उन्हें नहीं खटकता है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिश से राजकोष पर 1.02 लाख करोड़ रुपये का बोझ आया था।

“एमएसपी पर भारी सरकारी खरीद से भारतीय खाद्य निगम पर भंडारण का दबाव बढ़ता है। पिछले पांच वर्षों के दौरान भारतीय खाद्य निगम के पास बफर स्टॉक की मात्रा बफर स्टाकिंग मानकों से दोगुनी रही है।”

लगभग एक करोड़ कर्मचारियों के उत्थान की दिशा में 60 करोड़ कृषक परिवार बाधक नहीं बनते, लेकिन किसान हितैषी नीतियों पर संस्थागत हायतौबा किसान विरोधी मंशा को ही दर्शाती है।

इस फैसले से वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा फसलों की कीमत डेढ़ गुना करने का बजटीय आश्वासन तो जरूर पूरा हुआ है, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी व प्रधानमंत्री द्वारा स्वामीनाथन फॉर्मूले को हूबहू लागू कर एमएसपी के अतिरिक्त 50 फीसद का लाभकारी मूल्य दिए जाने का वादा अधूरा प्रतीत होता है।

नई घोषणा में लागत मूल्य निर्धारण प्रक्रिया को लेकर किसान व उनके संगठनों की मांग पूरी नहीं हुई है जिस कारण तमाम किसान संगठनों ने अपनी नकारात्मक प्रतिक्रिया भी दर्ज कराई है।

यह सच है कि कृषि उत्पादों के दाम तय करने वाले कृषि लागत एवं मूल्य आयोग यानी सीएसीपी द्वारा लागत मूल्य तय करने वाली प्रक्रिया लंबे समय से सवालों के घेरे में रही है।

मौजूदा लागत मूल्य निर्धारण में भी ए-2, एफ-एल को आधार बनाकर फसलों के लागत मूल्य के आनुपातिक एमएसपी बढ़ाया गया है किसान संगठनों द्वारा सी-2 प्रणाली को आधार मानकर लागत के अतिरिक्त 50 फीसद का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने की मांग रही है।

संगठनों का आरोप है कि उन्हें सी-2 व्यवस्था के तहत 50 फीसद का लाभकारी मूल्य दिए जाने का वादा किया गया था। इन आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच तथ्यों की स्पष्टता हेतु ए 2-एफएल की तकनीकी को समझना आवश्यक है।

सीएसीपी द्वारा तीन चरणों में फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित होता है। प्रक्रिया ए-2 के तहत किसानों द्वारा खेती में उपयुक्त सभी सामग्री जिसमें बीज, उर्वरक, कीटनाशक, मजदूरी तथा मशीनों का किराया शामिल होता है।

चूंकि कृषक परिवार भी खेती में शामिल होते हैं तो उनका पारिवारिक श्रम यानी एफ-एल को भी इस प्रक्रिया में जोड़ा जाता है जो ए-2 और एफएल का योग होता है। इन दोनों से इतर ‘व्यापक लागत’ यानी सी-2 व्यवस्था के तहत अन्य लागतों के साथ अपनी भूमि व पूंजी का किराया भी शामिल होता है जो ए2-एफएल से अधिक व्यापक होता है। यही किसानों की मांग रही है।

सी-2 प्रणाली के तहत धान के नए एमएसपी में महज 15 फीसद का इजाफा हुआ है जबकि ए 2-एफएल के तहत बढ़ोतरी का आंकड़ा 50 फीसद तक पहुंच रहा है। राष्ट्रीय किसान आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एमएस स्वामीनाथन ने भी एमएसपी निर्धारण की इसी प्रक्रिया की सिफारिश की है।

उनके द्वारा यह विचार भी रखा जा चुका है कि किसानों की कर्ज माफी के बजाय सरकार द्वारा सी-2 व्यवस्था से एमएसपी प्रदान करने की पहल ज्यादा कल्याणकारी होगी।

हालांकि बजट में उत्पादों की डेढ़ गुना कीमत देने के वादे के बीच कृषि भूमि के किराये को लागत मूल्य से वंचित रखने की सिफारिश किसान संगठनों को पहले ही निराश कर चुकी है। एमएसपी में अनुशंसित स्तर से कम हुई बढ़ोतरी के असंतोष के बावजूद किसानी संकट को काबू करने की दिशा में यह निश्चित ही सराहनीय प्रयास है।

कृषि व कृषक सुरक्षा की ओर एक कदम बढ़ाने के बाद अब सरकार के समक्ष चुनौती होगी कि प्रत्येक फसल उत्पाद की खरीदारी नए एमएसपी पर सुनिश्चित की जाए। हाल के महीनों में कई राज्यों से मूंगफली, कपास, सोयाबीन, बाजरा, मूंग, ज्वार, अरहर, मक्का और उड़द के मंडी भाव और एमएसपी में बड़ा भारी अंतर खा गया है।

कहीं धान में नमी की मात्रा बताकर किसानों को एमएसपी से दूर रखा जाता है तो कभी उत्पादन में बहुतायत या अन्य विवशताओं के कारण औने-पौने दाम पर उन्हें अनाज बेचने को मजबूर होना पड़ता है। संसद में भी यह बात स्वीकारी जा चुकी है कि किसानों को निर्धारित एमएसपी नहीं मिल पा रहा है।

इस स्थिति में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भावांतर भुगतान योजना की पहल सराहनीय रही, लेकिन इससे एमएसपी प्रणाली की विफलता भी सार्वजनिक हुई है।

2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने को वचनबद्ध सरकार को न सिर्फ 23 फसलों के एमएसपी अदायगी पर सख्त नजर रखनी होगी, बल्कि आलू, प्याज, टमाटर, हरी मिर्च, मौसमी फल, सब्जियों तथा दूध के लाभकारी मूल्य की भी कड़ी निगरानी रखनी होगी।

चुनावी आचार संहिता के कारण आगामी बजट में किसानों के लिए विशेष घोषणा की गुंजाइश नहीं दिखती। ऐसे में निर्धारित एमएसपी के भुगतान में कड़ी निगरानी किसानों के लिए तात्कालिक राहत एवं अन्य आयोगों की तर्ज पर किसान आयोग का गठन कर उनके अनुकूल नीति-निर्माण व समस्याओं का त्वरित निपटारा मौजूदा सरकार की बड़ी सफलता होगी।

(लेखक जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं)

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