जड़ से जुड़ा विद्यापीठ

0
149

पको एक अच्छी खबर देनी है। मेरी नौकरी लग गई है। बेंगलुरु में। एक वेब पोर्टल में। मुझे उसका गुजराती पोर्टल देखना होता है। एक रात काजल ने फोन पर यह जानकारी दी।

काजल गुजरात विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग से इसी सालएमएयानी स्नातकोत्तर कर निकली हैं। एक विजिटिंग फैकल्टी के रूप में मेरा उससे गुरुशिष्य का रिश्ता बना हुआ है।

कुछ दिनों बाद मैंने यह सोच कर उसे फोन किया कि उसकीटीथिंग ट्रबल्सकी खबर ले ली जाए। आखिर गुजरात विद्यापीठ के सुरक्षित वातावरण से निकलकर इतने बड़े शहर में है। फिर दफ्तर में भी कुछ शुरुआती समस्याएं होंगी। पर उसका जवाब प्रभावपूर्ण था।

काजल ने बताया, ‘मुझे यहां कोई समस्या नहीं है। मैं यहां पीजी में रहती हूं। कई लड़कियों की आपस में या मकान मालिकों से लड़ाइयां होती रहती हैं। पर मुझे किसी से कोई श्किायत नहीं है।उसने आगे कहा, ‘मुझे यहां अच्छा ही लग रहा है। विद्यापीठ के हॉस्टल में हमें जिन न्यूनतम सुविधाओं, कड़े अनुशासन समूह जीवन में रहना सिखाया जाता है, उसके बाद हम कहीं भी चले जाएं, कोई दिक्कत होने वाली नहीं है।

काजल ने अपने दफ्तर के अनुभव को भी साझा किया। उसने कहा कि हमारी ट्रेनिंग प्रिंट मीडिया में हुई थी, जहां खबर लिखने का समय मिल जाता था। पोर्टल में सब कुछ बहुत जल्दीजल्दी करना होता है। शुरू में दिक्कत हुई, पर अब सब ठीक है।

विद्यापीठ के गेस्ट हाउस में वैसे तो रोज मोर की आवाज ही सुबह जगाने के लिए काफी होती है, पर उस दिन लोगों के शोर ने पांच बजे उठा दिया। कमरे से बाहर निकल नीचे झांका तो दिल्ली से आए केंद्रीय अधिकारियों का दल सुबहसबेरे चाय की चुस्कियों लेते और गप्पें मारते दिखे थे। मैं भी उनके बीच पहुंच गई।

यहां 70 प्रतिशत बच्चे ऐसे होते हैं, जिनके परिवार में पहले कभी किसी ने पढ़ाई नहीं की है। सभी बच्चे गांवों से आते हैं। उन्हें गांधी मूल्यों के साथ पहले तो शिक्षा, फिर सामाजिक व आर्थिक
मुख्यधारा में लाना चुनौती है।

फिर पता चला कि पूरे विद्यापीठ की सफाई वे ही करेंगे। छात्र नहीं। इन सभी अधिकारियों की पदोन्नति होने वाला है। केंद्र की नई नीति के तहत उससे पहले उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे संस्थानों में जाकर सामाजिक जीवन का अनुभव लेना अनिवार्य कर दिया गया है। मकसद इस अनुभव से वे जनोपयोगी नीति निर्माण कर सकेंगे।

 

यह जानकर मेरा कौतूहल बढ़ गया कि ये वरिष्ठ अधिकारी सड़कों पर झाड़ू लगाएंगे! पर, बारिश ने बात बिगाड़ दी। अगले दिन सुबह वे सभी वापस जाने को तैयार थे। मैंने एक अधिकारी से पूछा– ‘रात को नींद कैसी आई?’ इस पर वे बोले– ‘ऐसा लग रहा है कि एक लंबे समय के बाद इतनी अच्छी नींद ली है।

शायद यहां के प्राकृतिक वातावरण का असर है। इस जगह को देखकर ही लगता है कि यहां का आदमी बाहरी चीजों पर नहीं, बल्कि अपने भीतर पर निर्भर करता है।

एक दिन ट्रस्टियों की बैठक के बाद अतिथि गृह के कॉमनहॉल में कुलनायक अनामिक शाह कुछ अन्य लोग बैठे विद्यापीठ के बारे में बात कर रहे थे। रात के कोई नौ बज रहे होंगे। तभी हॉस्टल की कुछ छात्राएं वहां अपने वॉटरकूलर को भरने के लिए आईं। शाह भाई ने उन्हें देखा तो तुरंत उठकर उनके पास गए। फिर पूछा, ‘इस समय तुम सबको यहां क्यों आना पड़ रहा है?’

छात्राओं ने बताया कि हॉस्टल में ठंडा पानी खत्म हो जाता है तो हमलोग यहां से भरकर ले जाती हैं। मैं उन्हें दो दिनों से पानी भरने के लिए आते देख रही थी। पर उसके बाद वे नहीं आईं। इसलिए नहीं कि उन्हें रोक दिया गया था, बल्कि इसलिए कि उनकी पानी की समस्या को हल कर दिया गया था।

मुझे नहीं पता कि कितने विश्वविद्यालयों में कुलनायक का छात्रों के साथ इतना सीधा रिश्ता होता है, पर यहां मैंने देखा कि वे उन्हें 24 घंटे उपलब्ध रहते हैं। छात्रों के बेहतर भविष्य के लिए हर सुझाव का स्वागत करने वाले। बशर्ते वह विद्यापीठ के मूल सिद्धांतों के अनुकूल हो।

विद्यापीठ के कुलसचिव राजेंद्र खिमाणी ने बताया, ‘यहां 70 प्रतिशत बच्चे ऐसे होते हैं, जिनके परिवार में पहले कभी किसी ने पढ़ाई नहीं की है। यहां सभी बच्चे गांवों से आते हैं। उन्हें गांधी मूल्यों के साथ पहले तो शिक्षा, फिर सामाजिक आर्थिक मुख्यधारा में लाना हमारी मुख्य चुनौती है, पर हम इससे घबराते नहीं हैं, क्योंकि गुजरात विद्यापीठ की तो नींव ही गांधीजी ने इसी चुनौती के साथ रखी थी।

शाह भाई का कहना था, ‘हमारे यहां आने वाले बच्चों का एक बड़ा वर्ग आदिवासियों का है। यहां पढ़ाई गुजराती में होती है, पर वे गुजराती भी नहीं जानते। यहां आदिवासियों की 24 प्रजातियां हैं और हर प्रजाति की बोली अलग है। ऐसे बच्चों को गुजराती सिखाने के लिए हमने गुजराती भाषा की तीन स्तरों पर पुस्तकें तैयार की हैं और उनकी छह लाख प्रतियां आदिवासी गांवों में बंटवाई हैं। यह बच्चों प्रौढ़ दोनों के लिए हैं।

उन्होंने बताया कि आदिवासी बच्चों में रक्त की कमी के एक खास वंशानुगत रोग को दूर करने पर भी हम काम कर रहे है। गांधीजी के मूल्यों के मुताबिक विद्यापीठ गांवों के इस कमजोर तबके के प्रति अपनी विशेष जिम्मेदारी समझता है। उन्होंने इस बात की भी जानकारी दी कि यहां के आदिवासी शोध संस्थान केंद्र में विभिन्न प्रजातियों पर शोध का काम बड़े पैमाने पर हो रहा है, जो सरकार की आदिवासियों के प्रति नीति निर्माण में सहायक सिद्ध हुआ है।

स्मरण रहे कि 1920 में जब गांधीजी के कहने पर बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई छोड़ असहयोग आंदोलन में कूद गए तो वे पढ़ाई से विमुख हो जाएं, इसलिए 18 अक्टूबर, 1920 को उन्होंने गुजरात विद्यापीठ की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य उनके आदर्शों के अनुरूप राष्ट्रनिर्माण के लिए चरित्रवान, सबल, संस्कारवान और कर्तव्यनिष्ठ कार्यकर्ताओं का निर्माण करना था।

उनका यह भी मानना था कि भारत का उत्कर्ष शहरों पर नहीं, बल्कि गांवों पर निर्भर है इसलिए यहां की शिक्षा में ग्रामवासियों को विशेष महत्व दिया जाएगा। पहले 1930-1935 और फिर 1942-1945 में यहां के छात्र गांधीजी की अपील पर आजादी के आंदोलन में सीधे शामिल रहे, जिससे इन सालों में विद्यापीठ पढ़ाई के लिहाज से बंद ही रहा। 1945 से फिर नए सिरे से शुरुआत हुई।

1949 में महादेव देसाई समाजसेवा महाविद्यालय की स्थापना की गई। उस समय सरदार वल्लभ भाई पटेल इसके कुलपति थे। इससे पहले स्वयं गांधीजी ने इस पद को सुशोभित  किया था। 1963 में जब मोरार जी देसाई कुलपति बने तो इसे यूजीसी के साथ जोड़ दिया गया। तभी इसे डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला।

”गांधीजी कहते थे जन जन स्वराज भोगवे। विद्यापीठ अधूरे स्वराज को पूरा पाने का मार्ग सूचक है। पर जो चुनौतियां सामने खड़ी हैं, उन्हें झेलते हुए विद्यापीठ को और गहराई
से काम करना होगा।” – इला भट्ट

यहां स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई के साथसाथ एमफिल पीएचडी भी होने लगी। आज यहां 17 से अधिक विषयों की शिक्षा बच्चे प्राप्त कर रहे हैं। यह पढ़ाई महादेव देसाई समाजसेवा महाविद्यालय से होती है। उसी की दो शाखाएं रांधेजा सादरा गांव में हैं। बीएड, एमएड पीएचडी की पढ़ाई के लिए अलग से शिक्षण महाविद्यालय है।

पर क्या यहां कॉलेज स्तर की ही पढ़ाई होती है? मैंने देखा कि परिसर के एक हिस्से में रोज छोटे बच्चे पढ़ने आते हैं और उस पर लिखा है– ‘विनय मंदिर पूछने पर पता चला कि यहां नर्सरी से बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है। रांधेजा सादरा केंद्रों पर भी नर्सरी से बारहवीं और फिर स्नातक स्तर तक की पढ़ाई बच्चे करते हैं। स्नातकोत्तर के लिए उन्हें गुजरात विद्यापीठ में आना होता है।

यहां प्रार्थना और सामूहिक श्रम में सभी हिस्सा लेते हैं। अपने हॉस्टल में खाना बनाने से लेकर शौचालय और परिसर की सफाई के साथसाथ खेतीबागवानी के काम विद्यार्थियों को बारीबारी से समूह में करना होता है। सुबह और शाम प्रार्थना होती है। एक बार उपासना करनी होती है। एक घंटे की इस उपासना में दस मिनट की प्रार्थना के बाद करीब पौन घंटा सूत काता जाता है। तब ऐसा लगता है, मानो विद्यापीठ ठहर सा गया है।
उपासना में कुलनायक से लेकर चतुर्थ श्रेणी तक के कर्मचारियों का शामिल होना जरूरी है। इसी तरह परिसर में सभी के लिए खादी पहनना भी जरूरी है। एक घंटा उपासना, एक घंटा श्रम एक घंटा उद्योग यही तीन घंटे हैं, जो विद्यापीठ के बच्चे को दूसरों से एकदम अलग और बेहतरीन बनाते हैं। वहां से एमसीए कर रही अहमदाबाद की एक छात्रा का कहना था यह जानते हुए भी कि यहां का हॉस्टल जीवन काफी कठोर मेहनतकश है मैंने यहां दाखिला लिया, क्योंकि डिग्री में गुजरात विद्यापीठ का नाम हो तो आज देश ही नहीं विदेशों में भी नौकरी में प्राथमिकता मिलती है। कारण हैसमूह जीवन का अनुभव।बेहद कम फीस एक दूसरा बड़ा आकर्षण है, जो दूरदराज के बच्चों को यहां तक खींच कर ले आता है।

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here