घूंघट के पट खोल रे.. आधार नंबर बोल रे.

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बर एकदम ताजा है। विश्व-प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने ‘आधार’ को हिंदी वर्ड ऑफ द ईयर चुना है। हिंदी भाषी होने के नाते सीना गर्व से फूल गया। आशा है, आप मुहावरे का मर्म समझेंगे और सीने का वास्तविक नाप मुझसे नहीं पूछेंगे।

वैसे आधार को भाषा के दायरे में बांधना ठीक नहीं है। मेरे हिसाब से आधार हिंदी ही नहीं बल्कि किसी भी भाषा में इस ब्रहांड का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होनेवाला शब्द है। आप चाहें तो एक आसान गणित लगाकर क्रॉस चेक कर सकते हैं।

सबसे पहले यह याद कीजिए कि आपसे दिन भर में कितनी बार आधार नंबर मांगा गया और बदले में आपने कितनी बार आधार शब्द दोहराया। जो संख्या होगी वही भारतीय औसत होगा। उस औसत को देश की कुल आबादी से गुना कीजिये। फिर जो संख्या आये उसे 365 से गुना कीजिए ।

इस तरह आपको पता चल जाएगा कि भारत में एक साल में कितनी बार आधार शब्द बोला जाता है। मेरा दावा है कि जो संख्या आएगी वह बाबा रामदेव के बताए  गए  विदेश में जमा काले धन के आंकड़े से जरा भी कम नहीं होगी।

बहुत ही विलक्षण शब्द है आधार। सोते जागते उठते बैठते हर कोई दोहराता है। आधार सचमुच आधार है क्योंकि इसके बिना अंधकार ही अंधकार है। कोई दो महीने पुरानी बात है। झारखंड में एक गरीब बच्ची भूख से बिलबिलाकर मर गई।

आधार की विलक्षणता को देखते हुए अदालत ने देश की जनता को समझाया है कि प्राइवेसी का रोना बंद करो और चुपचाप जाकर कार्ड बनवा लो।

मरते वक्त वह ‘भात दो-भात दो’ रट रही थी। घर में अन्न का एक भी दाना नहीं था। उसकी विधवा मां को सस्ता सरकारी अनाज मिलना बंद हो गया था क्योंकि आधार कार्ड नहीं था।

आधार जीवन की गारंटी हो या ना हो, लेकिन इसके बिना अब मरना पक्का है। लेकिन मरने के बाद अंत्येष्टि हो पाएगी या नहीं, यह पक्का नहीं है। हिंदी के किसी अखबार में पढ़ा कि एक श्मशान घाट पर शोकाकुल लोगों से मृतक का आधार नंबर मांगा गया।

मैं त्रिकालदर्शी नहीं हूं, इसलिए इस बात की पुष्टि नहीं कर सकता कि डोमराजा के यहां तैनात सत्यवादी हरिश्चंद्र ने तारामती से कफन मांगा था या फिर आधार नंबर? क्या पता यह विलक्षण व्यवस्था सतयुग में भी हमारे यहां रही हो।

आधार की विलक्षणता को देखते हुए अदालत ने देश की जनता को समझाया है कि प्राइवेसी का रोना बंद करो और चुपचाप जाकर कार्ड बनवा लो। फोटो खिंचवाकर मशीन पर अंगूठे का निशान ही तो देना है। आलस में आफत क्यों मोल लेते हो।

आफत से घबराने वाले मुझ जैसे असंख्य लोगों ने बहुत पहले ही आधार कार्ड बनवा लिया है और बिना मांगे हर जगह नंबर बांट भी दिया है।  

हाल ही में ख़बर आई कि आपके आधार नंबर के साथ जो निजी जानकारियां लिंक की गई हैं, उन्हें कोई भी आसानी से हासिल कर सकता है।

अंग्रेजी अखबार ट्रिब्यून ने इस बारे में लंबी चौड़ी खबर छापी थी और यह दावा किया था कि कई एजेंसियां आधारधारकों से जुड़ी  निजी जानकारियां औने-पौने दाम पर बेच रही हैं। कानून व आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस दावे को निराधार बताया है।

रवि बाबू असाधारण मेधा के व्यक्ति हैं। उन्होंने कहा है तो ठीक ही कहा होगा। कुछ समय पहले उन्होंने नोटबंदी के एक ऐसे नैतिक लाभ की ओर ध्यान आकर्षित किया था, जिससे देश अब तक पूरी तरह अनजान था।

बहुत ही विलक्षण शब्द है आधार। सोते जागते उठते बैठते हर कोई दोहराता है। आधार सचमुच आधार है क्योंकि इसके बिना अंधकार ही अंधकार है। कोई दो महीने पुरानी बात है।

रवि बाबू ने बताया था कि नोटबंदी की वजह से कोठों पर रौनक कम हो गई। नकदी नहीं है, इसलिए ग्राहक नहीं जा रहे हैं। श्रेय लेना उनकी आदत नहीं है, वर्ना वे यह भी कह सकते थे कि ऐसा आधार की वजह से हुआ है।

इस तरह आधार के बारे में यह बात भी स्थापित की जा सकती थी कि यह एचआईवी संक्रमण से बचाव में भी सहायक है।

आधार नंबर इतनी बार मांगा जाता है कि लोगों को बिना मांगे यह नंबर देने की आदत हो गई है। मेरे किसी परिचित ने गलती से रेड लाइट जंप किया।

नुक्कड़ पर तैनात सिपाही फौरन दौड़े आए और बोले- मेरे पास चालान की कॉपी नहीं है। मुझे 100 रुपये पकड़ाइए  और आगे जाइए। पैसे देते हुए मित्र ने उन्हें अपना आधार नंबर बताया तो सिपाही जी बोले जरूरत नहीं है।

मित्र ने पूछा-क्या रिश्वत के लेन-देन में आधार अब तक अनिवार्य नहीं हुआ है? इस पर सिपाही जी इस कदर बुरा मान गए कि मित्र को उन्हें मनाने के लिए 50 रुपये और देने पड़े।  मैंने दो नौजवानों को बात करते सुना।

एक नौजवान दूसरे से पूछ रहा था- टिंडर पर आधार नंबर मेंडेटरी तो नहीं हुआ है ना? टिंडर त्वरित मिलन वाला वह ऐप है, जिसका इस्तेमाल आजकल लड़के-लड़कियां ‘डेटिंग पार्टनर’ ढूंढने के लिए करते हैं। आज के जमाने में रहीम होते तो लिखते-रहिमन आधार राखिये बिन आधार सब सून।

दार्शनिक गहराइयों में डूबा कबीरदास का भजन है-  घूंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे। क्या पता अब घूंघट के पट खोलने से पहले अब दुल्हन पहले आधार नंबर पूछ ले। जब हर जगह अनिवार्य है तो फिर सुहागरात के लिए क्यों नहीं?

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