ग्राम पंचायत का सामाजिक और राजनीतिक दर्शन

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पंचायत राज प्रणाली सामाजिक एवं राजनीतिक लोकतंत्र का एक स्वरूप है। यह आदर्श रूप में एक सुपरिभाषित सामाजिक एवं राजनीतिक दर्शन भी है। लेकिन सच यह है कि पंचायती राज को किसी महानतर या व्यापकतर लक्ष्य से विच्छिन्न कोई कार्यक्रम मान लेने के बाद उसमें कोई प्रेरक शक्ति नहीं रह जाती।

गांधीजी ने कहा था कि वही सरकार सर्वोत्तम है जो निम्नतम शासन करती है। लेकिन आज हम एक विपरीत दिशा में चले जा रहे हैं। समाजवाद के नाम पर और कल्याणकारी राज्य के नाम पर सरकार अपने सिर पर अधिकाधिक काम ओढ़ रही है और लोकमानस को भ्रष्ट किया जा रहा है। इस देश के शिक्षित लोग भी यह मांग कर रहे हैं कि हर काम सरकार ही करे।

पंचायती राज की कल्पना, गांधीजी की शासन और समाज की दो कल्पनाओं के मेल पर आधारित है। पंचायती राज नीचे से उस प्राथमिक समुदाय से शुरू होता है जिसकी कल्पना ऐसे सहजीवी, सहभाषी, सहकारी परिवारों के संघ के रूप में की गयी है।

जो एक साथ मिल-जुलकर अपने काम-काज का प्रबंध करते हैं और जो काम वे स्वयं नहीं कर सकते, उन्हें अन्य समुदायों के सहयोग से करते हैं। इस प्रकार उत्तरोत्तर अधिक विस्तृत समुदायों के संघ का और पंचायती राज की अन्य संस्थाओं का निर्माण करते हैं।

यदि पंचायती राज की कल्पना ऐसी है, तो फिर वयस्क मताधिकार अथवा व्यक्तिगत मतों के आधार पर पंचायती राज के ढांचे का निर्माण करना उचित नहीं मालूम होता। क्योंकि ऐसा कर आप समुदाय को ही तोड़ते हैं। उसके बीच विभाजन करते हैं।

“भारत के करोड़ों मतदाताओं की शासन कार्य में भागीदारी असम्भव है। दिल्ली या राज्यों की राजधानियों से शासन संचालित होने से इसमें जनता की भागीदारी नहीं हो सकती है।”

आप यदि संविधान परिषद की चर्चाओं को पढ़ें तो देखेंगे कि किस प्रकार पंचायती राज का सम्पूर्ण चिन्तन, उत्तर विचार के रूप में तब प्रकट हुआ, जब संविधान लिखा जा चुका था। यह बड़ा ही दिलचस्प विषय है।

संविधान परिषद के अध्यक्ष ने संवैधानिक परामर्शी को लिखा कि क्या सम्पूर्ण विषय का फिर से परीक्षण किया जा सकता है और उस दृष्टिकोण से संविधान को फिर से लिखा जा सकता है? संवैधानिक परामर्शी ने उत्तर दिया कि ऐसा करने से संविधान के निर्माण में बहुत विलम्ब हो जाएगा, अत: वैसा करना अवांछनीय होगा।

इसके बाद उन्होंने सलाह दी कि आखिर जब इन पंचायत संस्थानों का निर्माण राज्य सरकारों को करना है, तो संविधान में इस विचार को एक निर्देश के रूप में अंकित कर देना पर्याप्त होगा। आज इसी रूप में यह विचार संविधान में हम अंकित पाते हैं।

इस स्थल पर मैं यह निवेदन करना चाहूंगा कि यदि आप यह मानते हैं कि पंचायती राज की संस्थाएं अपने-अपने स्तर की सरकारें हैं तो फिर भारतीय राज्य के केवल दो नहीं, पांच अंग हैं;  तो हमारे संविधान विशेषज्ञों को इस प्रश्न पर गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए कि संविधान को कैसे संशोधित किया जाए कि यह विचार उसमें समाविष्ट किया जा सकता है। जिससे पंचायती राज को उसमें योग्य स्थान और दर्जा मिले।

पंचायती राज में, ग्राम पंचायत ही बुनियादी ढांचा है यानी लोकराज का आधार है ग्रामराज। परन्तु आज जिस रूप में गांव है, अगर उसी रूप में उसको रखकर, आप पंचायती राज लागू करेंगे, तो मैं नहीं समझता कि वह सफल होगा।

“शासन जनता के निकट आए इसके लिए राजनीतिक एवं आर्थिक विकेन्द्रीकरण की पक्की व्यवस्था आवश्यक है। पंचायती राज लोकतंत्र की दिशा में एक ऐसा कदम है जो ठीक से क्रियान्वित होने पर स्वराज्य को जनता तक पहंुचाने में सफल हो सकता है।”

गांव में विघटनकारी तत्व विद्यमान हैं। ग्राम पंचायतें प्रभावकारी ढंग से कार्य कर सकें, इसके लिए उन तत्वों का निराकरण करना होगा। उन विघटनकारी तत्वों का रूप सामाजिक है, आर्थिक और राजनीतिक है। सामाजिक तत्व, जैसे जात-पांत बहुत पुराने समय से है। आज भी यह नहीं कहा जा सकता कि यह जाति प्रथा कब समाप्त होगी।

अब तक इसका अंत हो जाना चाहिए था, यह नहीं हुआ। पहले जाति प्रथा का उद्देश्य विघटनकारी नहीं था; बल्कि वह एक संघटनकारी तत्व थी, इसलिए कि वह दायित्व निर्धारण करती थी। परन्तु आज उसने राजनीतिक दल का कार्य करना शुरू किया है, और पता नहीं कब तक यह जारी रहेगा।

जहां तक आर्थिक तत्वों का संबंध है- जैसे भूमि, महाजनी और व्यापार – इन हितों को भूमि सुधार और अन्य कानूनों के द्वारा कुछ हद तक नियंत्रित किया गया है। लेकिन वे अभी अन्याय, विषमता और शोषण के शक्तिशाली तत्व हैं। ऐसे तत्व हैं जो गांव में हितों की वह समानता विकसित नहीं होने देते जिसके बिना ग्रामीण समुदाय केवल नाम के लिए ही समुदाय रहता है। ऐसे समुदाय में स्वशासन का प्रयास निश्चय ही विफल होगा।

योजना आयोग और केन्द्र सरकार के भूमि सुधार किए जाने के बावजूद इस दिशा में बहुत प्रगति नहीं हुई है। जहां कुछ भूमि सुधार के कानून बनाए गये हैं, वहां भी जिन लोगों के लिए कानून बनाये गये हैं, वे उससे कोई लाभ उठाने की स्थिति में नहीं है। साथ ही ग्रामीण समुदाय के कार्यों में सामान्य मतैक्य का जो मूल्य है, उसकी अवगणना हम न करें।

यदि किसी समुदाय को संघटित रूप से एक साथ मिलकर कार्य करना है, तो विशेषकर आज जिस स्थिति में हम हैं, उसमें यह बुद्धिमत्ता की बात नहीं मालूम होता कि हम समुदाय के अंदर कुछ ऐसे कलह के तत्व दाखिल कर दें जिससे कि संघ भावना एवं संघबद्ध कार्य में प्रगति और विकास कभी न हो पाये।

ग्राम पंचायत का चुनाव सामान्य सहमति से कराने के लिए कोई तरकीब न निकाली जाती तो ये पंचायतें विग्रह और संघर्ष से इस तरह टूटेंगी कि वे फिर कभी समुचित रूप में कार्य करने या कुछ हासिल करने में समर्थ नहीं हो सकेंगी।

पंचायती राज की त्रिस्तरीय संस्थाओं में से प्रत्येक अपने स्तर पर की सरकार है तो प्रत्येक का समान महत्व है और अपने साधनों से जितना कुछ वह कर सकती है, उतना करने के लिए वह सक्षम और अधिकार पाने योग्य है।

ग्राम पंचायत को वे सभी अधिकार मिलने चाहिए, जितने का प्रयेाग करने में वह समर्थ है, इसी प्रकार अन्य दो संस्थाओं को भी उनकी सामर्थ्य के अनुसार सभी अधिकार मिलने चाहिए। इसका कोई कारण नहीं है कि जिला परिषद केवल एक समन्वयकारी या परामर्शदात्री संस्था रहे या पंचायत समिति जिला परिषद का कार्यकारी अंगमात्र बनी रहे।

आज जब लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ‘सरकार’ की ओर ताकते रहने की अपनी पुरानी आदत के शिकार हैं। यदि उन्हें यह समझा दिया जाय कि अपने गांव, प्रखण्ड एवं जिले में स्वयं वे ही सरकार हैं। कुछ क्षेत्रों में उनको ही निर्णय लेकर कार्रवाई भी करनी है।

उन मामलों का दायित्व पूर्णत: उन पर ही है, यदि वे नहीं करते जो करना चाहिए, तो दूसरा कोई करने वाला नहीं है। और यदि फिर वे पहल करें तथा अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हों तो उनकी अविलम्ब सहायता की जायेगी।

यदि यह सारा उन्हें केवल शब्दों से नहीं अमल करके समझा दिया जाए, तो विकास की प्रक्रिया,अप्रत्याशित रूप से, विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में तेज की जा सकती हैं जहां व्यापक जनसहयोग की आवश्यकता है।

उदाहरणस्वरूप, भूमि का अधिक अच्छा उपयोग, श्रेष्ठतर औजार, पशुपालन, लघु सिंचाई और उसके साधनों की सुरक्षा, मिट्टी संरक्षण, वनरोपण, सब प्रकार के ग्रामीण उद्योग, ग्रामीण गृह निर्माण एवं स्वास्थ्य-रक्षा, ग्रामीण औद्योगीकरण आदि कार्य वे क्षेत्र हो सकते हैं।

हम नीचे से योजना निर्माण करने की बातें बहुत सुनते हैं, लेकिन व्यवहार में वह योजना राज्य सरकारों द्वारा किए गये आवंटनों को एक साथ जोड़ने मात्र से अधिक कुछ नहीं होती। मुझे भरोसा है कि यदि पंचायती राज की संस्थाओं को, उनकी क्षमता के अन्दर जो काम हो सकते हैं, उन्हें सम्पन्न करने का पूर्ण दायित्व समर्पित कर दिया जाए तो स्थिति में वास्तविक परिवर्तन अपेक्षा से अधिक तीव्र गति से हो सकता है।

पंचायती राज को सत्ता एवं उत्तरदायित्व का वास्तविक हस्तान्तरण करने की मांग, हम केवल जनता के स्वशासन के अधिकार को अमल में लाने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि इस उद्देश्य से भी करते हैं कि ग्रामीण भारत का विकास और पुनरुत्थान तीव्र गति से हो।

पश्चिम का लोकतंत्र सम्भवत: अपनी आंतरिक समस्याओं को तो हल कर लेगा, फिर भी इस बात पर विचार करना आवश्यक है कि अगर लोकतंत्र का अर्थ केवल अपने मत की सरकार, अथवा, दूसरे शब्दों में, एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था का होना है जो जनता को शांतिपूर्वक सरकार बदलने का अवसर देती है, तो यह पाश्चात्य लोकतंत्र की कल्पना कोई पूर्ण कल्पना नहीं है; इसलिए पश्चिम के अनुभव से हमें सीखना चाहिए और एक पूर्णतर लोकतंत्र की दिशा में बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।

अपने मत की सरकार से आगे का कदम होगा- शासन में जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी, यानी सहभागी लोकतंत्र।अब इतना तो स्पष्ट ही है कि शासन कार्य में भारत के करोड़ों मतदाताओं की भागीदारी असम्भव होगी, यदि शासन केवल दिल्ली या राज्यों की राजधानियों से संचालित होता रहेगा। जनता शासन कार्य में भाग ले सके, इसके लिए यह आवश्यक है कि शासन जनता के निकट आए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए राजनीतिक एवं आर्थिक विकेन्द्रीकरण की पक्की व्यवस्था आवश्यक है।

पंचायती राज की स्थापना करने का प्रयास यद्यपि अधिक सुदृढ़ लोकप्रिय एवं संतोषकारी लोकतंत्र की दिशा में एक ऐसा कदम है जो क्रियान्वित होने पर स्वराज्य को जनता तक पहुंचाने में सफल हो सकता है। लेकिन अपने आप में यह कोई पर्याप्त रचना नहीं है।

लोकतंत्र की इमारत को शक्तिशाली और अभेद्य बनाने के लिए यह आवश्यक है कि उसके ऊपर की मंजिलों का निर्माण भी बुनियादी ढ़ांचे के अनुरूप ही होना चाहिए। लेकिन वर्तमान स्थिति में, बुनियादी ढांचा जिला स्तर तक ही खड़ा किया जा सकता है,और उसके परे राज्यीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर, इससे बिलकुल भिन्न प्रकार का ढांचा, बालू के ढेर की तरह, अलग अलग निरुत्साह मतदाताओं के आकृतिहीन समूह के आधार पर ही खड़ा रहेगा।

यह लोकतंत्र के दो भिन्न सिद्धांतों एवं प्रक्रियाओं का बिलकुल अनमेल मिश्रण होगा, जो पानी और तेल के समान कभी मिलेंगे ही नहीं। इन दोनों ढांचों के बीच जो भेद है। अलग-अलग मतदाताओं पर खड़ी व्यवस्था की प्रवृति ऊपर के स्तरों पर शक्ति के केंद्रीकरण की ओर होती है,जब कि दूसरी व्यवस्था में शक्ति के विकेंद्रीकरण की ओर प्रवृत्ति रहती है।

पहली में ऊपर के मुठ्ठीभर प्रभावशाली तत्वों द्वारा संचालित संगठित दल निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। दूसरी में नीचे के सक्रिय समुदाय तथा सामुदायिक प्रतिनिधि संस्थाएं निर्णायक प्रभाव डालती है। पुन: पहली अवस्था में असंगठित मतदाताओं द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि उनके नियंत्रण में नहीं रहते हैं और न रह सकते हैं।

जबकि दूसरी अवस्था में निर्वाचक संस्थाएं अपने उन प्रतिनिधियों पर जिन्हें वे उच्चतर स्तरों पर भेजती हैं, स्थायी प्रभाव रख सकती हैं। पहली अवस्था में जनता का योगदान मतदान तक सीमित रहता है जब कि दूसरी व्यवस्था में ग्राम सभा के माध्यम से सम्पूर्ण जनता का प्रत्यक्ष योगदान और उच्चतर प्रतिनिधि संस्थाओं के द्वारा काफी घनिष्ठ योगदान होता है।

पहली व्यवस्था में चुनाव खर्चीले होते हैं, दूसरी में ठीक इसके विपरीत होता है।  पहली में प्रचार के विस्तृत साधनों की आवश्यकता होती है और उसमें अस्वस्थ मनोवैज्ञानिक एवं भावनात्मक उत्तेजना निहित होती है।  जबकि दूसरी में ये बुराइयां निम्नतम हो जाती है।

पहली अवस्था में अधिसंख्य मतदाता अपने सामने की समस्याओं को जितना समझते हैं, उसकी अपेक्षा दूसरी व्यवस्था में मतदाता अपने समक्ष उपस्थित समस्याओं से संभवत: अधिक सुअवगत होते हैं।

लोकतंत्र को एक वास्तविक आधार देने और उसकी प्रक्रिया में सम्पूर्ण जनता को सक्रिय एवं स्थायी रूप से शामिल करने के लिए यह आवश्यक है कि हम पंचायत से भी नीचे जाकर स्वयं जनता तक पहुंचे, और ग्रामीण समुदाय के सम्पूर्ण वयस्क सदस्यों को एक विधिक सामूहिक निकाय, ग्राम-सभा, के रूप में गठित कर दें।

पंचायत को ग्राम सभा की कार्यकारिणी के रूप में काम करना चाहिए और ग्राम-सभा को, विशिष्ट उद्देश्यों के लिए, दूसरी समितियां तथा कार्यकारी दल गठित करने का अधिकार होना चाहिए।

तभी जनता अपने दायित्वों एवं अवसरों के प्रति सजग होगी, और आज जो ग्राम पंचायतें राज्य सरकार के अधिकारियों अथवा स्वयं ग्रामीण समुदाय के अन्दर निहित एवं स्वार्थी हितों के हाथ का सुविधाजनक औजार बनी हुई हैं, उनका यह रूप समाप्त होगा, और वे जनता की इच्छा को क्रियान्वित करने का समुचित साधन बनेंगी।

जब यह होगा, तब ग्राम सभाएं-ग्राम पंचायतें नहीं- लोकतंत्र की सुन्दर इमारत का निम्नतम स्तर या बुनियादी मंजिल बनेंगी, और उसको सर्वाधिक व्यापक एवं सुदृढ़ तथा ठोस आधार प्रदान करेंगी।

(सामुदायिक समाज: रूप और चिंतन पुस्तक का संपादित अंश)

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