गडकरी का गंगा विचार

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ए गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी ने कार्यभार संभालते ही अपने पहले संबोधन में दो विचार सामने रखे। पहला गंगा और अन्य नदियों से गाद निकालने के लिए व्यापक कानून बनना चाहिए, ताकि बाढ़ की समस्या से निजात पाई जा सके। उन्होंने माना गाद का जमा होना बाढ़ का सबसे बड़ा कारण है।

दूसरा, नदियों को जोड़ने और बांध निर्माण पर तेजी से आगे बढ़ा जाएगा ताकि बाढ़ से निजात मिल सके और समुद्र में बह जाने वाले सत्तर फीसद जल का समुचित उपयोग हो सके।

अब समझने की जरूरत इस बात की है कि दोनों ही विचार आपस में गुत्थम गुत्था हैं और एक दूसरे के जन्म के कारण बनते हैं। पूर्ववर्ती उमा भारती ने इसी उधेड़बुन से निकलने के लिए माधव चितले समिति का गठन किया था ताकि गाद की समस्या से निपटने से पहले गाद के गणित को समझा जा सके।

पहले यह जानना जरूरी है कि गाद होती क्या है? हर नदी में तीन कण बहते हैं – रेत, गाद और तलछट। नीति निर्धारकों को इन तीनों में अंतर समझना जरूरी है, रेत जहां पानी संरक्षित करने का काम करती है, वहीं तलछट बहाव के साथ नदी की दिशा तय करता है।

हर नदी का अपना पाट होता है और वह मानसून में उस
अंतिम बिंदु को छूती है,जिसे नदी का क्षेत्र कहा जाता है। यह नदी का स्वाभाविक
गुण है, जो अमूमन हर वर्ष देखने में आता है।

लेकिन गाद सबसे महत्वपूर्ण है, वह नदी के मैदान को उपजाऊ बनाता है। डेल्टा को आकार देता है और सबसे ज्यादा वह समुद्र को आगे बढ़ने से रोकता है ताकि खेती ऊसर ना होने पाए।

अब हुआ यह कि गंगा पर भारत – बांग्लादेश सीमा पर फरक्का बैराज बनाया गया। इस बैराज ने गंगा को रोककर जरूरत के मुताबिक बहाना शुरू किया, लेकिन वह गाद को नियंत्रित नहीं कर पाया। गाद को बहने की जगह नहीं मिली तो वह धारा के बीच में ही बैठ गया और धीरे- धीरे जमकर पहाड़ का रूप ले लिया।

इस तरह कई टीले – पहाड़ बनने से नदी की गहराई खत्म हो गई और मानसून का पानी तटवर्ती बसावटों की तरफ तेजी से भागने लगा। इसी घटना को सत्ता ‘गाद के कारण बाढ़’ का नाम देती है। चितले समिति ने भी माना कि बांध बनने से गाद की समस्या पैदा होती है।

अब सरकार का दूसरा विचार कि नदियों को जोड़ने और बांध निर्माण से बाढ़ की समस्या से बचा जा सकता है, पहले विचार की हत्या कर देता है। सबसे बड़ा उदाहरण तो कोसी नदी का है। आजादी के बाद 1962 में पहला बड़ा बैराज कोसी पर बना, जिसका मकसद था- बाढ़ पर नियंत्रण।

आज इतने सालों बाद जब कोसी में कई बांधों के साथ करीब 4000 किलोमीटर के तटबंध भी बनाए गए है, बाढ़ के हालात ज्यों के त्यों हैं। इसके अलावा नदी जोड़ने से बाढ़ रुकेगी? इस पर अब तक कोई विस्तृत अध्ययन नहीं किया गया है, यह अनुमान वास्तव में सरकारी भोलेपन पर आधारित है कि उफान वाली नदी का पानी दूसरी नदी में डालकर बाढ़ से बचा जा सकता है लेकिन मानसून की सच्चाई यह है कि जब बाढ़ आती है तो हर नदी में आती है और अतिरिक्त पानी बहता है। सामान्य दिनों बाढ़ नहीं आती सभी नदियां खुद ही प्यासी रहती हैं।

वास्तव में गाद हटाने पर जोर इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि गाद जहाजों के परिचालन में सबसे बड़ी बाधा है और गडकरी का ड्रीम प्रोजेक्ट कोलकाता से वाराणसी तक बड़े जहाज चलाने का है।

इसके लिए हर सौ किलोमीटर पर एक बैराज बनाया जाना है। कुल मिलाकर बैराज बनने से गाद की समस्या बढ़ेगी जिससे बाढ़ आएगी और इस बाढ़ को रोकने के लिए और बैराज/ तटबंध बनाए जाएंगे जिससे फिर गाद बढ़ेगी और यह चक्र चलता रहेगा।

वैसे एक आसान रास्ता भी है कि यह मान लिया जाए कि गाद को नियंत्रित नहीं किया जा सकता और उसे बहने दिया जाए। चितले समिति ने भी कहा है कि ‘गाद को हटाने के बजाए, गाद को रास्ता दें’  की नीति पर अमल किया जाना चाहिए।

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