खाकी में नहीं फबती हीरोइन!

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न दिनों अपने देश में कम और अमेरिका में ज्यादा धूम मचा रही प्रियंका चोपड़ा के लिए फिल्म ‘जय गंगाजल’ एक अहम पड़ाव साबित हो सकती थी।

फिल्म में उन्होंने भ्रष्ट व्यवस्था का सामना करने वाली दबंग पुलिस अफसर की भूमिका की थी।

तेरह साल पहले ‘गंगाजल’ में पुलिस अफसर बने अजय देवगन ने जिस तरह की बंदिशों और स्थितियों को झेला था उसी का पुलिस रूप में प्रियंका को सामना करना पड़ा।

एक्शन दृश्यों में वे ज्यादा सहज नहीं लग पाईं लेकिन तनावपूर्ण स्थितियों को उन्होंने पूरी गंभीरता से अभिव्यक्त किया। निश्चित रूप से कसी हुई हुई पटकथा और प्रकाश झा के कुशल निर्देशन का भी उन्हें सहारा मिला।

लेकिन फिल्म पिछली गंगाजल के मुकाबले बाक्स आफिस पर कमजोर साबित हुए।

यह पहला मौका नहीं था जब कोई हीरोइन खाकी वर्दी में आई। सबसे बड़ा फर्क नजरिए का रहा।

पहले जिन फिल्मों में हीरोइन को पुलिस अफसर के रूप में दिखाया गया, उनमें या तो महिला पुलिस अफसर को बाहुबली की तरह हवा में उछलते हुए गुंडों का सफाया करते हुए दिखाया गया अथवा भ्रष्ट राजनेता की सरेआम हत्या को उसका ध्येय बना दिया गया।

ऐसे कई मामलों में व्यक्तिगत प्रतिरोध ही ज्यादा हावी रहा। उसे विश्वसनीय बनाने के लिए अति नाटकीयता का सहारा लिया गया।

“भूमिका बदल कर जब ग्लैमर के लिए इस्तेमाल की जाने वाली हीरोइन को खाकी पहनाने का फैशन शुरू हुआ तो उसे कोई नई पहचान देने की तो रत्ती भर भी जहमत नहीं उठाई गई।”

‘जय गंगा जल’ में प्रियंका और ‘मर्दानी’ में रानी मुखर्जी ने इस सिलसिले को तोड़ने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहीं। इससे धारणा बन गई है कि खाकी में हीरोइन नहीं फबती।

दरअसल हिंदी फिल्मों में आमतौर पर पुलिस अफसर एकरूपता का शिकार रहा है और यही हीरोइनों के लिए बाधा बन गया है।

मुख्य रूप से, क्योंकि हीरो को ही खाकी वर्दी पहनाने का चलन रहा है लिहाजा उसके बाहुबल से ही व्यवस्था को सुधारने का कारनामा इन फिल्मों में किया गया।

ऐसी फिल्मों के लिए या तो सब कुछ काला है या सफेद। काला अपराध का प्रतीक और सफेद ‘देवता टाइप’ अच्छाई का। इससे अलग रंग तो फिल्मी व्यक्तित्व में हो नहीं सकता।

जमीनी हकीकत को समझे बिना पुलिस से भ्रष्ट और खाकी हीरो ने पहनी हो तो उसे सुपरमैन दिखाने के चलन का यह नतीजा है कि अपवाद के रूप में कुछेक फिल्मों को छोड़कर हिंदी फिल्मों ने ही नहीं भारतीय फिल्मों तक ने भी लुंजपुंज होती व्यवस्था में पुलिस तंत्र की व्याधियों को परखने की कोशिश नहीं की।

असलियत में पुलिस की क्या मनोदशा है और उसे किस तरह औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, इसकी गंभीरता से थाह लेने की कोशिश भी फिल्मों में ज्यादा नहीं हुई।

भूमिका बदल कर जब ग्लैमर के लिए इस्तेमाल की जाने वाली हीरोइन को खाकी पहनाने का फैशन शुरू हुआ तो उसे कोई नई पहचान देने की तो रत्ती भर भी जहमत नहीं उठाई गई।

उसे भी वही मैनरिज्म ओढ़ा दिया गया जो हीरो पुलिस अफसर पर आजमाया जाता रहा। हीरोइनों को पुलिस अफसर बनाने के पीछे कोई नया प्रयोग करने की मंशा नहीं रही।

फिल्मों की आंसू बहाती, पीडि़त और शोषित हीरोइन की परपंरा को तोड़ने के लिए उसे जांबाज दिखाने का सिलसिला शुरू हुआ, इस उम्मीद में कि दस बीस गुंडों की ठुकाई करती हीरोइन दर्शकों को ज्यादा लुभा सकती है।

“1988 में बनी ‘जख्मी औरत’ की पुलिस अफसर डिंपल कपाडिया  को अपनी जांबाजी की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।”

उसे या तो डाकू बनाकर अन्याय का खात्मा करने के काम में लगा दिया गया या खाकी वर्दी पहनाकर राजनीति और अपराध का कुचक्र तोड़ने का जिम्मा सौंप दिया गया।

जिस तरह लगभग हर हीरो ने किसी न किसी रूप में पुलिस अफसर की भूमिका करने में रुचि ली, उसी तरह हीरोइनों को भी जब इस तरह का मौका मिला तो उसे लपकने में उन्होंने कोताही नहीं की।

यह जरूर है कि विश्वसनीयता और स्वाभाविकता उनके हिस्से में भी कम नहीं आ पाई। हीरोइनों को मर्दाना पहचान देने की कवायद पहले भी हुई है।

मूक फिल्मों के दौर में स्टंट क्वीन व हंटरवाली के रूप में विख्यात फियरलेस नाडिया जब हैरतअंग्रेज तरीके से गुंडों की पिटाई करती थी तो लोग सम्मोहित हो जाते थे।

शुरुआती दौर में दुर्गा खोटे ने ‘राजपूतानी’ जैसे कुछ फिल्मों ने हीरोइन का साहसी रूप दिखाया। अन्याय का विरोध भी ‘स्वयंसिद्धा’, ‘दुनिया ना माने’ जैसी कुछ फिल्मों में हीरोइनों ने किया लेकिन एक निर्धारित सीमा में रहकर।

हीरोइनों का स्वाभिमानी, आत्मविश्वासी और आम केंद्रित रूप भी कई फिल्मों में दिखा। लेकिन उन्हें सुपर हीरोइन दिखाने की पहल अस्सी के दशक में हुई। ‘शोले’ की महिमा ने फिल्मों को हिंसा-प्रतिहिंसा का मंच बना दिया था।

ऐसे में हीरोइन को चेहरा भी बदला और उसे खाकी वर्दी पहना कर एक्शन हीरोइन में बदल दिया।

महिला पुलिस अफसरों की असल जिंदगी में जिस तरह की स्थितियों का सामना करना पड़ता है, पुरुष सहकर्मियों  के बीच काम करते हुए उन्हें कैसा माहौल मिलता है और ड्यूटी के दौरान उन्हें किस तरह की अड़चनों का मुकाबला करना पड़ता है, इसे किसी फिल्म में गंभीरता से नहीं उठाया गया।

पिछले दिनों हरियाणा के एक मंत्री ने जिस तरह आईपीएस अफसर को सरेआम लताड़ा, उससे समझ में आ जाता है कि महिला पुलिस अफसर की सामाजिक व राजनीतिक हैसियत क्या है?

फिल्मों ने इस पर कभी गौर नहीं किया। उलटे फिल्मों में महिला पुलिस अफसर किसी भी राजनेता को जलील करने का दुस्साहस दिखाती नजर आ जाती हैं। कुछ हद तक स्वाभाविकता रही फिल्म ‘तेजस्विनी’ में विजया शांति की भूमिका में।

पिछले कुछ समय में महिला पुलिस अफसर को दो अलग रूप दिखाने वाली ‘मर्दानी’ और ‘दृश्यम ‘ जैसी फिल्में आईं। ‘मर्दानी’ में पांच फीट से भी कम कद की रानी मुखर्जी की दिलेरी अति नाटकीयता का शिकार रही।

उन पर थोपी गई हीरोइन ‘सिंघम’ की यह छवि इसीलिए पसंद नहीं की गई।

‘दृश्यम ‘ में तबु ने उस पुलिस अफसर की भूमिका की, जो जानती है कि उसके बेटे की हत्या में नायक का हाथ है लेकिन कानूनी तरीकों व पुलिसिया हथकंडों के बावजूद वह उसका आरोप साबित नहीं कर पाती।

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