क्या भूलूं , क्या याद रखूं

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न् 1965। हल्की सर्दी पड़ रही थी। बिहार प्रदेश भारतीय जनसंघ ने पटना के विशाल गांधी मैदान में सुरक्षा अधिवेशन का आयोजन किया था। भारत-पाक युद्ध की समाप्ति पर आपसी संबंधों पर विचार मंथन के लिए ही यह सुरक्षा अधिवेशन आयोजित किया गया था।

वैसे तो अप्रैल 1965 से ही पाकिस्तानी सेना अयूब खान के इशारे पर जहां-तहां छुटपुट लड़ाइयां लड़ रही थी। लेकिन, भारत सरकार द्वारा सेना को खुली छूट न दिए जाने के कारण ”रन ऑफ कच्छ” में हमारी सेना को पीछे हटना पड़ा। इससे अयूब खान का हौसला बढ़ा और उसने सोचा कि कश्मीर हथियाने का यही मौका है।

उसने युद्ध की एक गुप्त योजना बनाई जिसे ‘आपरेशन जिब्राल्टर’ का नाम दिया गया। अगस्त, 1965 में कश्मीर के ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ पर लगभग तीस हजार पाक सेना इकट्ठी हो गई। वे कभी भी कश्मीर हथिया सकते थे।

लेकिन, 15 अगस्त से ही प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के आदेश पर भारतीय सेना ने आक्रामक रुख अपनाते हुए हाजी पीर दर्रा पार किया और लाहौर के तरफ बढ़ चली। 6 सितम्बर, 65 को ‘इच्छोगिल नहर’ पार कर द्वितीय विश्व युद्ध के वेटरन मेजर जनरल प्रसाद के नेतृत्व में भारतीय इन्फेंट्री की 15वीं डिवीजन ने लाहौर के कुछ गांवों और एक पुलिस थाने पर भी कब्जा कर लिया।

“वैसे तो अटल जी का देहावसान हो गया है। लेकिन, वह सूक्ष्म शरीर में अपने सभी प्रिय जनों के हृदय में सदा विद्यमान हैं। उनकी आवाजें गूंज रही हैं।”

भारतीय सेना लाहौर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर कब्जा करने ही वाली थी कि अमरीकी दबाव में युद्ध विराम करना पड़ा। ताशकंद (सोवियत रूस) में द्विपक्षीय वार्ता की भूमिका तैयार की गई। इसी पृष्ठभूमि में अधिवेशन का आयोजन किया गया था।

देश भर से भारतीय जनसंघ के तमाम दिग्गज नेता इकट्ठे हुए थे। विशाल गांधी मैदान में तम्बुओं का नगर बसाया गया था। ठीक वैसे ही, जैसे कि कुम्भ मेले में नगर बसाए जाते है। दक्षिणी छोर पर गांधी मैदान के मुख्य द्वार से पश्चिम की ओर एक कतार से स्विस कॉटेजों की कतार लगी थी, जिसमें बड़े नेताओं को ठहराया गया था।

मैदान के बाकी तीनों छोर पर यानी कि पश्चिमी, पूर्वी और उत्तरी किनारों पर बीच में एक बड़ा स्थान छोड़कर सामान्य तम्बू (छोलदारियां) लगी थीं। बीच-बीच में कई स्थानों पर पानी, शौचालय, भोजनालय आदि की व्यवस्था थी।

बीच का मुख्य मंच और उससे लगा बड़ा खाली मैदान कार्यक्रमों और जनसभाओं के लिए था। कुछ कार्यक्रम कार्यकर्ताओं के लिए खास थे और कुछ कार्यक्रम जनता के लिए।

सुबह से दोपहर भोजन के समय तक कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें, प्रतिनिधियों के विचार, नेताओं के मार्गदर्शन, प्रस्तावों पर चर्चा आदि के कार्यक्रम लगातार चलते रहते थे। दोपहर के भोजन और एक डेढ़ घंटे विश्राम के बाद सायंकाल सार्वजनिक सभा का आयोजन होता था, जिसमें पटना और आसपास के लोग बड़ी संख्या में पार्टी के बड़े नेताओं जैसे नानाजी देशमुख, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, पंडित प्रेमनाथ डोगरा, प्रो. बलराज मधोक, कर्नाटक केसरी के नाम से विख्यात जगन्नाथ राव जोशी, यज्ञदत्त शर्मा, लाला हंसराज गुप्ता, भाई महावीर आदि के भाषणों को सुनने के लिए लोग जुटते थे और उनके भावपूर्ण तथा विचारोत्तेजक भाषणों का आनन्द लेते थे।

“अटल बिहारी वाजपेयी और गीतकार डॉ. गोपाल दास ‘नीरज’ दोनों ही कवि भी थे और अच्छे मित्र भी थे। अटल जी आगरा में बटेसर में जन्मे और नीरज जी बगल के जिले एटा में। दोनों साधारण परिवारों में पैदा हुए।”

उस समय मैं पटना हाईस्कूल में दसवीं कक्षा का छात्र था और गर्दनीबाग शाखा का मुख्य शिक्षक था। बिहार जनसंघ के अनुरोध पर ही सुरक्षा का कार्य का पूरा जिम्मा संघ के कार्यकर्ताओं को सौंपा गया था। गांधी मैदान की दक्षिणी छोर पर जिधर राष्ट्रीय नेताओं के ठहरने के कॉटेज (स्विस टेंट) लगे थे, उस इलाके की सुरक्षा का जिम्मा मेरी टोली को दिया गया था।

मैं अर्द्ध गणवेश (निकर, कमीज और टोपी) में हाथ में छ: फुट की लाठी लिए स्विस कॉटेजों के सामने चहलकदमी कर रहा था। हर कॉटेज के पीछे एक कार्यकर्ता तैनात था। जो सबसे पहला स्विस कॉटेज था वह पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का था।

जमीन पर दरी बिछायी गयी थी, दरी के ऊपर धान का पुआल ताकि जमीन की नमी से बचा जा सके। पुआल के ऊपर फिर एक दरी, एक पतला सा रूई का तोषक और उसके ऊपर सफेद चादर। यही व्यवस्था सभी स्विस कॉटेजों में थी।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय अकेले अपने कॉटेज में बैठकर एक क्लिप बोर्ड में लगे फुल स्केप कागजों पर कुछ लिख रहे थे। कभी कुछ सोचते, फिर लिखते, फिर थोड़ी देर रुकते, फिर लिखते। वे भी निकर ही पहने हुए थे। ऊपर एक बनियान थी और एक मटमैले कलर की चादर (लोई) ओढ़ रखी थी। उनके कॉटेज के ठीक बगल वाला कॉटेज अटल बिहारी वाजपेयी जी का था।

उनकी कॉटेज में भीड़ लगी हुई थी। वाजपेयी जी से झुंड के झुंड कार्यकर्ता मिलने आते। वे बड़े प्यार से सबसे मिलते, परिचय लेते और हालचाल पूछते। एक लडडू का डिब्बा पड़ा था। सबको लडडू खिलाते और प्यार से विदा करते। पूरी गहमागहमी थी। लम्बी बैठकी मारने वालों में बीएन कॉलेज में हिन्दी के प्रोफेसर, कवि और साहित्यकार डा. शैलेन्द्रनाथ श्रीवास्तव भी थे, जो बाद में पटना से ही भाजपा की टिकट पर लोकसभा सदस्य चुने गए थे।

शैलेन्द्र जी के आग्रह पर अटल जी ने अपनी कुछ कविताएं पढ़नी शुरू कीं। भीड़ इकट्ठी होती गयी, तम्बू भर गया। लोग-बाग बाहर खड़े होकर भी अटल जी की ओजपूर्ण कविताओं का आन्नद लेने लगे।

मैं भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय और अटल जी के काटेज के बीच में खड़ा होकर कविता वाचन का आनन्द लेने लगा। शैलेन्द्र जी ने आग्रह किया कि ”अटल जी, अमर आग है सुनने की इच्छा है, कृपया सुनाइए’। अटल जी ने कहा कि बगल के काटेज में पंडित जी काम कर रहे है। मैं, अमर आग है, शुरू करूंगा तो उन्हें व्यवधान होगा। शैलेन्द्र जी ने कहा कि नहीं-नहीं, थोड़ा धीरे-धीरे ही सुना दीजिए।

‘अमर आग है’ ऐसी कविता है जिसमें कोई कितना भी मध्यम स्वर में पाठ करे, अन्तरे को तो धीमे स्वर में पढ़ने की कोशिश हो भी सकती है लेकिन जहां भी आप एक अंतरा समाप्त करेंगे ‘अमर आग है अमर आग है’ दोहराएंगे तो आवाज तो सप्तम स्वर में ही गूंजेगी। अटल जी ने अमर आग है कि पंक्तियां सुनानी शुरू कीं, ‘कोटि-कोटि आकुल हृदयों में, सुलग रही है जो चिनगारी, अमर आग है, अमर आग है।’

जब पहली बार ऊंची आवाज निकली तो पंडित दीनदयाल जी ने इशारे से मुझे बुलाया और कहा कि अटल जी को बता दो कि मैं कल सुबह के लिए राजनीतिक प्रस्ताव लिख रहा हूँ। मैं अटल जी के सामने जाकर खड़ा हुआ और इशारे से मैंने पंडित जी के तम्बू के तरफ इशारा करते हुए कहा कि ‘पंडित जी कुछ लिख रहे हैं।’ अटल जी ने कहा ”अच्छा-अच्छा” और आवाज धीमी कर दी।

दूसरा छन्द धीरे से उठाया

” उत्तर दिशि में अजित दुर्ग सा,

जागरूक प्रहरी युग-युग का,

मूर्तिमंत स्थैर्य, धीरता की प्रतिमा सा,

अटल अडिग नगपति विशाल है। अमर आग है, अमर आग है।’

जब फिर छंद समाप्त हुआ तो ‘अमर आग है, अमर आग है’ का उद्घोष हुआ फिर पंडित जी ने इशारा किया। मैंने फिर अटल जी को बताया। फिर उनकी आवाज धीमी हो गयी। लेकिन फिर जब अटल जी के तीसरे छन्द को धीमे से शुरू किया,

‘नभ की छाती को छूता सा, कीर्ति पुंज सा, दिव्य दीपकों के प्रकाश में-

झिलमिल, झिलमिल- ज्योतित मां का पूज्य भाल है।

‘अमर आग है, अमर आग है।’ तीसरी बार जब ‘अमर आग है’ का उद्घोष किया तो पंडित जी खड़े हो गए। वह दृष्य कभी मेरे आखों से ओझल नहीं होता।

निकर, बनियान में पंडित जी अपने तम्बू से बाहर आए और अटल जी के तम्बू के सामने आकर उन्होंने धीरे से कहा, ‘अटल जी, यह क्या हो रहा है। मैं कल के सत्र के लिए प्रस्ताव तैयार कर रहा था।’ पंडित जी का इतना कहना था कि अटल जी एकदम से बिछावन पर लेट गए और चादर से अपने शरीर को पैर से लेकर सिर तक ढंक लिया और चादर के अंदर से ही कहने लगे, ‘भागो-भागो पंडित जी आ गए हैं। नाराज हो रहे हैं।’

उस दृष्य को याद करते ही हंसी छूट जाती है। लेकिन पंडित जी का सम्मान ही इतना था कि उनके मृत्यु पर्यंत भारतीय जनसंघ का बड़ा से बड़ा नेता भी स्वाभाविक रूप से पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के सामने श्रद्धावनत हो जाता था।

अटल जी के साथ बिताए 53 वर्षों के संस्मरण तो सैकड़ों हैं, जिन्हें जल्द ही मैं पुस्तक का आकार देने वाला हूं। लेकिन एक-दो संस्मरण जो रोचक, प्रेरणादायक और अविस्मरणीय हैं, उसकी चर्चा इस लेख में करना मैं आवश्यक समझता हूं।

1967 के आम चुनाव का ही एक और वाक्या ध्यान में आता है। 1966 में भागलपुर में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में रुपये के अवमूल्यन पर हुए चर्चा गट में आर्थिक विषयों के मेरी समझ को देखते हुए पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने तत्कालीन प्रदेश उपाध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता मान्यवर ठाकुर प्रसाद जी (वर्तमान केंद्रीय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद के पिता) को मुझे यह कहते हुए सौंपा था कि इन्हें जनसंघ के काम में लगाइए। इस बात की चर्चा पटना और अन्य क्षेत्रों में हो गई थी कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने रवीन्द्र को जनसंघ के कामों में स्वयं लगाया है।

उसी समय की बात है। पटना के गांधी मैदान में अटल जी की सभा थी। अटल जी ठाकुर बाबू के यहां ठहरे थे। शाम लगभग 7.00 बजे से 7.30 बजे तक सभा समाप्त हो गई।

उन दिनों पैसे की बचत करने के लिए जनसंघ जैसी साधनविहीन पार्टियां ऐसे समय में सभा का आयोजन करती थीं कि प्रकाश की व्यवस्था न करनी पड़े। इसलिए सभा सूर्यास्त होते-होते समाप्त हो गयी। हम लोग ठाकुर बाबू की आइस्टिन गाड़ी पर बैठ गए।

ठाकुर बाबू गाड़ी स्वयं चला रहे थे। उनके बगल में अटल जी बैठे। पीछे की सीट पर मुश्किल से दो लोग बैठ सकते थे पर हम लोग तीन थे। एक नगर मंत्री अर्जुन प्रसाद (अधिवक्ता), दूसरे महानगर के संगठन मंत्री स्व0 यशोदानन्द सिंह, जिन्हें प्यार से आशुतोष जी बुलाते थे। दोनों के बीच में मैं सैंडविच होता हुआ आगे सरक कर बैठा था। शरीर भी दुबला पतला था जिसके कारण बैठने में कोई दिक्कत नहीं हुई।

गांधी मैदान से आगे बढ़े तो रूपक सिनेमा दिखा। वहां जो फिल्म लगी थी वह देवानन्द की थी। अटल जी ने उसे देखकर मेरी तरफ इशारा किया। मैंने भी स्वीकृति में हामी भरी। मैंने कहा पिक्चर अच्छी है। अटल जी ने कहा कि इसमें कई गीत गोपाल दास नीरज जी ने लिखा है। वह हमारा दोस्त है।

हम लोग ठाकुर बाबू के पीरमुहानी निवास पर पहुंच गए। अटल जी ने ठाकुर बाबू जी की पत्नी को कहा, ‘भाभी जी मुझे खाना खिला दीजिए, मैं एक-दो रोटी खाकर सो जाऊंगा। मैं थका हुआ भी हूं।’ ठाकुर बाबू की पत्नी विमला प्रसाद को लोग अम्मा जी करते थे। अम्मा जी ने कहा कि ठीक है मैं अभी पराठे सेंक देती हूं।

अटल जी ने मुझे कान में फुसफुसाकर कहा कि ठीक रात 9.00 बजे गेट पर रिक्शा लेकर तैयार रहना। टिकट पहले ले आना। मैं बालकनी के दो टिकट ले आया और 9.00 बजे के पहले ही गेट पर आकर इन्तजार करने लगा। ठीक 9.00 बजे एक भूत जैसी आकृति गेट के तरफ चली आ रही थी, चादर लपेटे हुए।

नजदीक आने पर मैंने पहचाना कि अटल जी हैं। मैं समझ गया कि वे फिल्म देखने के दौरान अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे। हम लोग रिक्शे पर बैठ कर रूपक सिनेमा पिक्चर देखने चल दिये। अटल जी अपना चेहरा छिपाये रहे। हम लोग पिक्चर देख रहे थे। इन्टरवल हुआ।

उन्होंने कहा कि यार कोको कोला ले आओ और साथ में कुछ चिप्स भी लेते आना। मैं बाहर से कोको कोला की दो बोतलें और चिप्स ले आया। अटल जी कोका कोला पीते रहे और चिप्स खाते रहे। इसी बीच उनका घूंघट सरक गया। बगल में बैठे व्यक्ति ने देख लिया और कहा कि अरे, यही वह आदमी गांधी मैदान में भाषण दे रहा था। इनका भाषण बहुत अच्छा था।

अटल जी ने कहा कि रवीन्द्र हमें अभी निकल चलना चाहिए। मैंने कहा, अभी उठे तो बाकी सबकी नजर भी पड़ेगी। आखिरकार इंटरवल समाप्त हुआ। बत्ती गुल हुई। तब अटल जी ने कहा कि अब हमें यहां से निकलना चाहिए। हम लोग उसी समय वहां से निकल गये। वहां से अटल जी के साथ ठाकुर बाबू के पीरमुहानी वाले आवास पर पहुंच गए।          

अटल बिहारी वाजपेयी और पद्मभूषण डॉ. गोपाल दास ”नीरज” दोनों ही कवि भी थे और अच्छे मित्र भी थे। अटल जी आगरा में बटेसर में जन्मे और नीरज जी बगल के जिले एटा में। दोनों साधारण परिवारों में पैदा हुए। दोनों ने ही यमुना तट का आनन्द लिया और दोनों ने ही कानपुर के डीएवी कॉलेज में उच्च शिक्षा प्राप्त की। यह मेरा सौभाग्य रहा है कि इन दोनों महापुरुषों से मेरा आत्मीय संबंध रहा और दोनों के सैकड़ों प्रसंग मेरे स्मृति पटल पर सदैव विद्यमान रहेंगे।

अटल जी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 का था और पद्म भूषण स्वर्गीय डॉ. गोपाल दास ”नीरज” ठीक नौ दिन बाद 4 जनवरी 1925 को जन्मे थे।

नीरज जी एक महान ज्योतिषी भी थे। लेकिन, वह उनका शगल मात्र था। व्यवसाय के रूप में तो उन्होंने अध्यापन और स्वतंत्र कवि-गीतकार बनने का ही मार्ग अपनाया। नीरज जी ने मुझे एक बार कहा था कि ”देखो, अटल जी और मैं दोनों ही शनि की दशा में पैदा हुए हैं और शनि की कृपा से ही हमारी ख्याति भी हुई है।

वे ”हिन्दू युवा हृदय सम्राट” कहे जाते हैं, तो मैं भी ”गीतों का राजकुमार” कहा जाता हूं। और, तुम देख लेना हम दोनों मरेंगे भी शनि की दशा में ही। और हम दोनों के मौत की तारीखें भी एक महीने के अंदर ही होगी।” यह पूर्णत: सत्य हुआ।

गोपाल दास नीरज ने 19 जुलाई को एम्स के आईसीयू में अंतिम सांस ली और ठीक 28 दिन बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने भी 16 अगस्त को एम्स के आईसीयू में ही अंतिम सांस ली।

अटल जी की फक्कड़ई के दिनों की चर्चा करते हुए नीरज जी ने एक दिलचस्प घटना सुनाई-”सिन्हा, तुम्हें मैं क्या बताऊं? हमारे पास उन दिनों आठ आने नहीं होते थे।” मैने पूछा आठ आना? उन्होंने कहा, ”हां सुनो, एक वाकया बताता हूं। एक बार ग्वालियर में कुछ लोगों ने एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया और मुझे और अटल जी दोनों को ही उसमें आमंत्रित किया गया।

दोनों कानपुर से ग्वालियर के लिए चले। दो जगह ट्रेनें बदल कर पहुंचना था। ट्रेनें लेट होती गयीं और शाम के चार बजे पहुंचने की बजाय रात के ग्यारह बजे पहुंचे। जल्दी जल्दी एक तांगा किया। किराया आठ आने तय हुआ। दोनों ग्वालियर बाड़े पर पहुंचे। कवि सम्मेलन के स्थान पर कोई मिला नहीं। शामियाने समेटे जा रहे थे।

मैंने  पूछा, अरे भाई, यहां कवि सम्मेलन था। तम्बू वाले ने कहा, हां साहब था-अभी अभी खत्म हुआ है। कवि सम्मेलन तो 6 बजे से ही था। 10 बजे तक तो शानदार ढंग से चला। जितने कवि बुलाये गए थे, एक-दो को छोड़कर सभी आए।”

अब हम दो कवि जो नहीं पहुंच पाए थे, एक-दूसरे का चेहरा देख रहे थे। अटल जी ने मुझसे (नीरज जी से) पूछा, ‘तुम्हारे पास आठ आने होंगे क्या? नीरज ने कहा अटल जी यदि आठ आने होते तो रास्ते में मैं बीड़ी नहीं ले लेता। दो घंटे से मैंने बीड़ी नहीं पिया। यही सोच रहा था कि ग्वालियर पहुंच कर मैं आयोजकों से पहले यह कहूंगा कि दो-चार बंडल बीड़ी लाकर दे दो।

अब तुम्हारे पास पैसे नहीं है, मेरे पास भी नहीं हैं, तो तांगे वाले को पैसा कहां से देंगे?” अटल जी ने कहा, ”ऐसा नहीं है। यहां मेरी बहन है उनके यहां चलते हैं। धन भी मिलेगा, भोजन भी मिलेगा और बिछावन भी मिल जाएगी। फिर कल सोचेंगे क्या किया जाए? आज जो कविता पाठ के लिए बीस-पच्चीस रुपये मिलते, वे तो हाथ से निकल ही गए।” यह था अटल जी के फक्कड़ई का हाल।

1967 के चुनाव से लगातार 2004 तक के हर चुनाव में अटल जी के साथ पूरे बिहार के भ्रमण में उनके सहायक, सखा या अंगरक्षक, जिस रूप में ले लें, रहने का सौभाग्य जो मुझे मिला, उसके संस्मरणों का बखान एक छोटे से लेख में करना कदापि संभव नहीं हो सकता। अटल जी हमसे उम्र में काफी बड़े थे।

किन्तु, उनका सरल स्वभाव औेर दोस्ताना मिजाज उम्र के अंतर को समाप्त कर देता था। जब वे मस्ती में होते तो मुझसे कहते, ”अरे भाई, रवीन्द्र तुम आज पत्रकारिता कर रहे हो तो मैं भी तो 1948 से मूलत: पत्रकार ही हूं। हम दोनों ही चटोरपंथी हैं। आज कुछ अच्छे चटपटे भोजन की व्यवस्था करो।”

वैसे तो अटल जी हर तरह का भोजन करते थे। लेकिन, उनको बेहद पसंद था गंगा की रोहू या कतला मछली का बोनलेस कुरकुरा फिश फ्राई। कई बार तो वे किचन में घुसकर स्वयं बनाकर बताते थे कि स्वादिष्ट व्यंजन कैसे तैयार किए जाते हैं।

फिश फ्राई, चाइनीज सूप और बिहारी स्टाइल में बना हुआ पकौड़ा जिसे हम बचका कहते हैं, गर्मागर्म जलेबियां और खस्ता कचैरियां अटल जी को खास पसंद थीं। बाद में जब स्वास्थ्य कारणों से डाक्टरों ने कई प्रकार के भोजनों पर रोक लगा दी, फिर भी मौका मिलने पर कुछ बदपरहेजी कर ही लेते। ”अरे, डाक्टर सॉब, एक छोटी सी जलेबी तो खा रहा हूँ, चलो अब और नहीं खाऊंगा। ”  

वैसे तो अटल जी का देहावसान हो गया है। लेकिन, अटल जी सूक्ष्म शरीर में अपने सभी प्रिय जनों के हृदय में सदा विद्यमान हैं। उनकी आवाजें गूंज रही हैं।

उनका प्यार छलक रहा है और वे हम सबों को उसी प्रकार से अपना मुस्कुराहट भरा निष्छल, निष्कपट आशीर्वाद दे रहे हैं, जैसा उन्होंने सदा दिया है। अटल जी को कोई भूलना भी चाहे तो वह संभव नहीं है। अटल जी सभी प्रियजनों के दिलों में हमेश बसे रहेंगे।

हम लोग पिक्चर देख रहे थे। इन्टरवल हुआ। उन्होंने कहा कि यार कोको कोला ले आओ और साथ में कुछ चिप्स भी लेते आना। मैं बाहर से कोका कोला की दो बोतलें और चिप्स ले आया। अटल जी कोका कोला पीते रहे और चिप्स खाते रहे। इसी बीच उनका घूंघट सरक गया। बगल में बैठे व्यक्ति ने देख लिया और कहा कि अरे, यही वह आदमी गांधी मैदान में भाषण दे रहा था। इनका भाषण बहुत अच्छा था। अटल जी ने कहा कि रवीन्द्र हमें अभी निकल चलना चाहिए।

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