काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का मूल स्वरूप लौटाएं

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भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का इम्तहान अभी शुरू हुआ है। उनको काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के केंद्र में परीक्षा देनी है। यह विश्वविद्यालय अक्सर मानव संसाधन मंत्रियों का इम्तहान लेता है और अक्सर वे फेल होते रहे हैं। इसका इतिहास पुराना है।

एक मंत्री होते थे, वीके आर वी राव। 1970 में उनका दिया हुआ आश्वासन है। लोकसभा में जनसंघ के श्रीचंद गोयल ने पूछा था कि सरकार विश्वविद्यालय का विधेयक कब लाएगी? मंत्री ने जवाब दिया था कि अगले सत्र में विधेयक पेश होगा।

वह आश्वासन आज तक पूरा नहीं हुआ। इसे बहुत बार याद दिलाया गया है। आखिरी बार डॉ. मुरली मनोहर जोशी के समय एक प्रतिनिधि मंडल ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिलकर उस आश्वासन की याद दिलाई थी। प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व डॉ. नामवर सिंह कर रहे थे। वह प्रतिनिधि मंडल विश्वविद्यालय के पुराने छात्रों का था।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को वह कानून वापस दिया जाना है, जिसे पंडित मदन मोहन मालवीय ने बनवाया था। भारत सरकार इसकी छानबीन
करे। पता लगाए कि कब और क्यों उस कानून
से छेड़छाड़ की गई।

इसमें से बात यह निकलती है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को वह कानून वापस दिया जाना है, जिसे पंडित मदन मोहन मालवीय ने बनवाया था। भारत सरकार इसकी छानबीन करे। पता लगाए कि कब और क्यों उस कानून से छेड़छाड़ की गई।

अगर खोज सही ढंग से की गई तो अवश्य ही यह भी पता चल जाएगा कि आजकल छात्राओं से जो छेड़छाड़ हो रही है, उसकी दोषी केंद्र की पिछली सरकारें हैं। सवाल यह है कि क्या इसकी खोज करने की जहमत प्रकाश जावड़ेकर उठाएंगे? वे छात्र आंदोलन की उपज हैं। इसलिए उनसे यह उम्मीद की जानी चाहिए।

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि विश्वविद्यालय का नया कुलपति कौन हो? अगर इतना ही रहता तो बात बहुत आसान थी। जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर दिनेश सिंह का कार्यकाल पूरा हुआ। वे गए। नए कुलपति एक प्रक्रिया से आए। वे डॉ. योगेश त्यागी हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र संघ का यह स्वरूप 1974 में आया। उससे पहले भी छात्र संघ था, लेकिन वह परोक्ष चुनाव से बनता था। दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र संघ का चुनाव कभी बाधित नहीं हुआ। किसी कुलपति ने छात्र संघ को तोड़ा नहीं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पहली मार छात्र संघ पर ही पड़ती है।

1996 से वहां छात्र संघ नहीं है। पंडित मदन मोहन मालवीय के बनवाए कानून में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एक लोकतांत्रिक संस्थान थी। जिसमें छात्र संघ भी एक खंभा होता था। केवल इतना ही नहीं हुआ है कि छात्र संघ दिया गया है, बल्कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हर निकाय को ध्वस्त कर दिया गया है, जो निर्वाचन से बनते थे। जैसे कोर्ट।

विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद का दिल्ली से मनोनयन होता है। उसकी बैठकें कुलपति की मर्जी और सुविधा से तय होती है। पहली जरूरत है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्थागत बदलाव की बात हो। उसे लोकतांत्रिक स्वरूप देने के लिए उपाय किए जाएं। वे उपाय वक्त काटने के लिए हों। समय सीमा में हों।

एक जांच आयोग बने। वह 1996 से अब तक के कुलपतियों की इस दृष्टि से जांच करे कि किसने कितना विश्वविद्यालय को लूटा है।
पंडित मदन मोहन मालवीय ने लोगों से भिक्षा मांगकर
विश्वविद्यालय बनाया था।

दूसरी जरूरत है कि एक जांच आयोग बने। वह 1996 से अब तक के कुलपतियों की इस दृष्टि से जांच करे कि किसने कितना विश्वविद्यालय को लूटा है। पंडित मदन मोहन मालवीय ने लोगों से भिक्षा मांगकर विश्वविद्यालय बनाया था। उसकी संपत्तियां पूरे देश में हैं। हर बड़े शहर में उसकी संपत्ति होती थी। उसे कुलपतियों ने बेचा है।

जांच का काम लंबा चल सकता है, लेकिन विश्वविद्यालय को लोकतांत्रिक स्वरूप देने में वक्त नहीं लगेगा। इरादा होना चाहिए।  

 

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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