कावेरी के आईने में नदी

0
93

कावेरी के जल का बंटवारा हो गया। इसमें सभी पक्षों को उनका हिस्सा मिला है। असंतुष्ट तमिल समाज इस बंटवारे का विरोध कर रहा है और कावेरी शांत और असहाय है, उसे समझ नहीं आ रहा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने उसके हिस्से के जल की जरूरत पर गौर क्यों नहीं किया।

क्या नदी के जल पर नदी का कोई हक नहीं होता? ‘न्यूनतम पर्यावरणीय बहाव’ की जटिल शब्दावली में फंसी भारत की नदियां महान अदालत के इस फैसले को समझने की कोशिश कर रही हैं।

नदियों के प्रति अदालत के इस अन्याय को विकास की दौड़ का भावुक पहलू समझकर दरकिनार कर दीजिए और फैसले के सबसे महत्वपूर्ण पक्ष पर नजर डालिए। सुप्रीम कोर्ट ने जल को ‘राष्ट्रीय संसाधन’ घोषित कर दिया है।

‘पानी’ की संवैधानिक तकनीकी स्थिति में न जाते हुए यह जानना जरूरी है कि यह आदेश पानी को समवर्ती सूची में लाने की दिशा में अहम कदम साबित होने जा रहा है।

पानी अभी राज्य सूची का विषय है। यानी अब देश भर में फैले बीस से ज्यादा बड़े नदी विवादों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाएगा। नर्मदा, यमुना, सोन, कृष्णा, गोदावारी, महानदी, सतलुज, रावी, व्यास आदि नदियों पर विवाद काफी गहरे हैं और कभी भी हिंसक रूप ले सकते हैं।

नदी के जल को लेकर अब तक दो नियम मुख्यत: प्रचलन में थे। राज्य अपनी-अपनी सुविधा से इन नियमों को मानने पर जोर देते रहे हैं। जैसे अभी तक कर्नाटक अमेरिकी अटॉर्नी जनरल के नाम से चर्चित हर्मन डॉक्टरिन पर जोर देता रहा है।

जिसके मुताबिक राज्य को नदी जल पर निर्विवाद रूप से क्षेत्रीय संप्रभुता हासिल है, क्योंकि उसका उद्गम स्थल उसके सीमा क्षेत्र में है। दूसरा नियम ‘जल के प्राकृतिक बहाव के सिद्धांत’ की दुहाई देता है।

इसी के आधार पर तमिलनाडु का मानना है कि हर नदी तट पर बसे लोगों का यह अधिकार है कि वे अबाध रूप से उसके जल का इस्तेमाल करें।

125 बरस पुराने इस विवाद पर फैसला देते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह कावेरी मैनेजमेंट बोर्ड का गठन करे जो नियामक की जिम्मेदारी निभाए और कोर्ट के फैसले को लागू भी करे।

इस निर्देश को भी समवर्ती सूची की तरफ बढ़ने का एक कदम माना जा सकता है। इससे पहले केंद्र ने यह कहते हुए बोर्ड गठित करने से इनकार कर दिया था कि यह उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।

राज्य सरकारों ने भी इस तरह के बोर्ड के गठन का विरोध किया था। अब इस अहम फैसले के आधार पर अन्य नदियों पर फैसला लेना आसान हो जाएगा। लेकिन जब बात अंतरराष्ट्रीय नदियों की होगी तो केंद्र का रुख देखने लायक होगा।

यानी देश के भीतर बहने वाली नदियों को राष्ट्रीय संसाधन मानने वाली सरकार सिंधु, तीस्ता और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों पर वैसा ही रुख रखेगी जैसा अब तक कर्नाटक और तमिलनाडु कावेरी को लेकर रखते आए हैं। बानगी देखिए।

तीस्ता को लेकर केंद्र और बंगाल का रुख है कि नदी का उद्गम भारत में है इसलिए उसके उपयोग का पूरा अधिकार भारत का है, वहीं ब्रह्मपुत्र को लेकर हमारा मानना है कि नदी भारतीय क्षेत्र में भी बहती है, इसलिए चीन उस पर अपना मालिकाना जाहिर नहीं कर सकता।

ब्रह्मपुत्र को लेकर तो चीन और भारत के बीच कोई संधि भी नहीं है। इन नदियों को हम कभी भी अंतरराष्ट्रीय संसाधन नहीं कहेंगे, कोई भी देश नहीं कहता। नदियों को प्राकृतिक संसाधन मानकर उसका प्रकृतिजन्य उपयोग और ‘नदी के जल पर नदी का हक,’ तो किताबी बातें हैं।

यानी देश के भीतर बहने वाली नदियों को राष्ट्रीय संसाधन मानने वाली सरकार सिंधु, तीस्ता और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों पर वैसा ही रूख रखेगी जैसा अबतक कर्नाटक और तमिलनाडु कावेरी को लेकर रखते आए हैं।

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here