कानून व अदालत से ऊपर होने का अहम और वहम

0
259

सोनिया गांधी अपनी तुलना इंदिरा गांधी से कर रही हैं। ऐसा करने का कोई तुक नहीं है। वे क्यों इंदिरा गांधी का नाम ले रही हैं और बता रही हैं कि वे उनकी बहू हैं? सिवाय इसके कि उन्हें बचाव के लिए कोई राजनीतिक नाम चाहिए। वे इंदिरा गांधी को उस आरोप में घसीट रहीं हैं, जो उन पर लगा है।

संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बहुत सही और सटीक टिप्पणी की है। कहा है कि सोनिया इंदिरा नहीं हैं और यह 2015 है, 1977 नहीं है। इससे अधिक कहने की जरूरत ही नहीं है।

आरोपों पर सफाई देने के लिए सोनिया गांधी समेत कांग्रेस के दूसरे पदाधिकारी गण को अदालत में हाजिर होना है। सोनिया गांधी उससे बचना चाहती हैं। यही वह अहंकार है, जो उन्हें बेमौसम इंदिरा गांधी की याद दिला रहा है।

जो महिला सत्ता की धुरी रही हो। जो सुपर प्रधानमंत्री की भूमिका में रही हो। जो 18 साल से कांग्रेस की अध्यक्ष हो उसे एक शहर की अदालत हाजिर होने के लिए आदेश दे तो अहंकार को चोट लगेगी ही। इसी से पता चलता है कि सोनिया गांधी खुद को कानून से ऊपर मानती हैं।

विश्वनाथ प्रताप सिंह जब विपक्ष की अगुआई कर रहे थे, तब वे अपनी सभाओं में दोहराते थे कि इस देश में साधारण नागरिक कानून और जेल की रेखा के उसी तरह नीचे है, जैसे कि लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। वे बताते थे कि एक परिवार कानून और जेल रेखा से खुद को ऊपर मानता है। वह नेहरू खानदान है। उनका सीधा संकेत तब बोफोर्स सौदे में फंसे राजीव गांधी की ओर होता था।

सोनिया गांधी को अगर तुलना ही करनी थी तो कहना चाहिए था कि मैं राजीव गांधी की पत्नी हूं। वह करके दिखा दूंगी जो राजीव गांधी ने जेल जाने से बचने के लिए किया था। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिरा दी थी।

यहां कहना होगा कि सोनिया गांधी समझ लें कि यह 1990 नहीं है। समय बदल गया है। जो बीत गया है, वह लौटकर उसी तरह नहीं आ सकता। सोनिया गांधी को उपस्थित यथार्थ का सामना करना होगा। उन पर पहले भी अनेक आरोप लगे हैं। ज्यादातर आरोप डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ही समय-समय पर लगाएं हैं। पर एक आरोप ऐसा भी रहा है जिसे कम लोग जानते हैं।

जवाहर लाल नेहरू ने जिस अखबार को आजादी की लड़ाई में कांग्रेस का जरिया बनाया था, उसे सोनिया गांधी ने बंद करवाया। उसकी जमीन को सोनिया गांधी ने एक कंपनी बनाकर हड़प लिया है।

उन दिनों समाजवादी नेता मधु लिमए जीवित थे। एक दिन उन्होंने मदन लाल खुराना को बुलाया। कहा कि जनसत्ता में छपी खबर पर एफआईआर दर्ज कराओ, क्योंकि खबर अगर सच है तो सोनिया गांधी पर चोरी और हेरा-फेरी का मामला बनता है।

मदन लाल खुराना उन दिनों दक्षिण दिल्ली से लोकसभा सदस्य थे। वे अगले दिन संसद मार्ग के पुलिस थाने में गए। तत्कालीन डी.सी.पी. जेपी सिंह को सूचित कर दिया था कि वे आ रहे हैं। जेपी सिंह को नहीं मालूम था कि कारण क्या है। पर वे इंतजार कर रहे थे।

मदन लाल खुराना ने अपने आदर-सत्कार के बाद मकसद बताया। कहा कि सोनिया गांधी के खिलाफ मुझे एफआईआर करानी है। इतना सुनना भर था कि डी.सी.पी के होश उड़ गए। कहने लगे कि एफआईआर दर्ज नहीं होगी। मदन लाल खुराना ने पैंतरा बदला और कहा कि ठीक है, मेरी शिकायत दर्ज करिए। उससे डी.सी.पी. इनकार नहीं कर सकते थे।

बात यह थी कि जवाहर लाल नेहरू के वे पत्र सोनिया गांधी के कब्जे में थे, जिन्हें उन्होंने लेडी माउंट बेटन को लिखे थे। उसे वी. जॉर्ज ने लंदन से लाया था। खर्च दिया था, नेहरू संग्रहालय ने। कायदे से चिट्ठियों का वह बंडल पहले ही दिन से नेहरू संग्रहालय के पुस्तकालय में होना चाहिए था। लेकिन वह वी. जॉर्ज ने सोनिया गांधी को सौंपा था। राजीव गांधी तब प्रधानमंत्री थे।

कई साल बाद जब इसकी प्रामाणिक जानकारी मिली तो जनसत्ता ने खबर छापी। जिसे पढ़ने के बाद मधु लिमए ने मामला दर्ज कराने की सलाह दी। जब शिकायत दर्ज हुई तो अगला कदम जांच-पड़ताल का था। पुलिस ने पूछताछ की होगी। उसका परिणाम निकला।

s gandhi

जवाहर लाल नेहरू के वे पत्र सोनिया गांधी के कब्जे में थे, जिन्हें उन्होंने लेडी माउंट बेटन को लिखे थे। उसे वी. जॉर्ज ने लंदन से लाया था। खर्च दिया था, नेहरू संग्रहालय ने। कायदे से चिट्ठियों का वह बंडल नेहरू संग्रहालय के पुस्तकालय में होना चाहिए था। लेकिन वी. जॉर्ज ने सोनिया गांधी को सौंपा था। राजीव गांधी तब प्रधानमंत्री थे। अगर शिकायत न हुई होती तो वे पत्र सोनिया गांधी के पास ही रहते। कानूनन वह एक अपराध था।

वी. जॉर्ज ने एक दिन चिट्ठियों का वह गट्ठर खुद तीन मूर्ति के नेहरू पुस्तकालय में पहुंचाया। उस समय के उपनिदेशक हरिदेव शर्मा को सौंपा। अगर शिकायत न हुई होती तो वे पत्र सोनिया गांधी के पास ही रहते। कानूनन वह एक अपराध था। चोरी और हेराफेरी की उसमें नीयत काम कर रही थी।

डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी इसी तरह का आरोप लगाया है। वह मुख्यत: सोनिया गांधी पर ही है। लेकिन केवल उन्हीं पर नहीं है, बल्कि इसमें सोनिया गांधी के अलावा राहुल गांधी, मोती लाल वोरा, ऑस्कर फर्नाडिंस, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे भी आरोप के घेरे में हैं।

कहानी पुरानी है। डॉ. स्वामी को कब पता चला और कितने दिन लगे उन्हें प्रमाण जुटाने में यह कहना कठिन है। इसे सिर्फ डॉ. स्वामी ही जानते हैं। जिसे सभी जानते हैं वह घटना 2012 की है। जब डॉ. स्वामी ने दिल्ली मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दर्ज कराई और आरोप लगाया कि सोनिया गांधी सहित कांग्रेस के कई नेता धोखाधड़ी और सम्पत्ति हड़पने का काम किए हुए हैं।

डॉ. स्वामी ने तथ्यों के आधार पर पटियाला हाउस की अदालत में भारतीय दंड संहिता के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराया। उनके तर्कों को अदालत ने सुना और माना कि तथ्य पूरे हैं। पहली नजर में अपराध दिखता है। उसी आधार पर अदालत ने सोनिया गांधी समेत सबको हाजिर होने के लिए आदेश दिया। वह आदेश 26 जून, 2014 को जारी हुआ। इन आरोपियों को 7 अगस्त, 2015 को हाजिर होना था। ये आरोपी हाईकोर्ट गए।

हाईकोर्ट ने भी माना कि शिकायत निराधार नहीं है। आरोप में दम है। इसी आधार पर निर्देश दिया कि उन्हें अदालत में पहुंचकर अपना पक्ष रखना चाहिए। अपनी ईमानदारी को प्रमाण सहित साबित करना चाहिए।

अगर ये लोग ऐसा कर पाते तो कानून का सम्मान होता। लोकतंत्र की शान में चार चांद लगते। लोग मानते कि सोनिया गांधी में एक नागरिक की सरलता और सहजता है। इसके विपरीत अदालत से बचने की हर कोशिश से कांग्रेस का चेहरा बेनकाब हो रहा है। सोनिया गांधी और कांग्रेस में भेद मिट जाने के कारण भी यह नजारा है।

जो आरोप हैं, वे बहुत गंभीर हैं। आम आदमी उसे अपने ढंग से समझेगा। वह सरल तरीके से अर्थ निकालेगा। जो तथ्य आए हैं उससे यह बात निकलती है कि जवाहर लाल नेहरू ने जिस अखबार को आजादी की लड़ाई में कांग्रेस का जरिया बनाया था, उसे सोनिया गांधी ने बंद करवाया। उस अखबार के नाम पर कांग्रेसी सरकारों ने बहुत कीमती जमीन कौड़ियों के दाम दे दिए।

दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार्ग के हेराल्ड हाउस और लखनऊ के नेहरू भवन, नेहरू मंजिल के अलावा भोपाल, पटना, पंचकुला, मुंबई आदि स्थानों पर जो जमीनें नेशनल हेराल्ड के लिए ली गई थी उन्हें सोनिया गांधी ने एक कंपनी बनाकर हड़प लिया है। यह सब सरकार में रहने के नाजायज फायदे के उदाहरण हैं।

अब अदालत उसे जांचेगी तो राज परत दर परत खुलेगा। यही वजह है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने आसमान को सिर पर उठा लिया है। तय होना है कि कानून बड़ा है या कानून से ऊपर मानने वाला मां-बेटे का कुनबा।.

शेयर करें
पिछला लेखभारतवंशी कूटनीति: नवजागरण का सूत्रपात
अगला लेखसुशासन बाबू की सरकार से अटकल के बाजार तक
mm
विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here