कर्नाटक प्रभाव

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र्नाटक के चुनाव को अगर 2019 के लोकसभा चुनाव की बानगी मानें तो दो बातें तय हो गई हैं। पहली बात यह कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का करिश्मा कायम है। उसका विस्तार हो रहा है। कर्नाटक के चुनाव परिणाम से यह साबित होता है। विधान सभा चुनाव के मुद्दे वह नहीं रहे जिसे सिद्धारमैया बनाना चाहते थे। राहुल गांधी भी इसमें विफल रहे।

सिद्धारमैया ने हर कोशिश की कि कर्नाटक का स्वाभिमान मुद्दा बन जाए। उनके कामकाज पर वोट मिले। उनकी रणनीति में राहुल गांधी के लिए कोई जगह नहीं थी। राहुल गांधी भी सिद्धारमैया को किनारे कर चुनाव जीतना चाहते थे। उनका ऐसा सोचना इसलिए भी उचित ही माना जाएगा क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी का यह पहला चुनाव था। इसीलिए उन्होंने कर्नाटक को इम्तहान माना।

आदत के विपरीत दो-तीन महीने मेहनत की। कर्नाटक के लिए वे उपलब्ध रहे। बीच में मैदान छोड़कर अदृश्य नहीं हुए। जैसा कि वे करते रहे हैं। फिर भी बाजी कांग्रेस के हाथ में नहीं रही। कांग्रेस जो दोबारा सरकार बनाना चाहती थी और जिसका श्रेय राहुल गांधी लेना चाहते थे वह फलीभूत इसलिए नहीं हुआ क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ताबड़तोड़ चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में 21 रैलियां कर हवा का रुख बदल दिया।

“सिद्धारमैया ने हर कोशिश की कि कर्नाटक का स्वाभिमान मुद्दा बन जाए। उनके कामकाज पर वोट मिले। उनकी रणनीति में राहुल गांधी के लिए कोई जगह नहीं थी।”

जो दूसरी बात पत्थर की लकीर बन गई है और वह कर्नाटक के चुनाव परिणाम से उभरी है वह यह कि राहुल गांधी का पद भले ही बदल जाए। वे उपाध्यक्ष से अध्यक्ष हो जाएं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके नेतृत्व में ऐसा कोई नया तत्व नहीं जुड़ पाया है जो जनता को भरोसा दिला सके।

कर्नाटक का राजनीतिक इतिहास कांग्रेस के उतार-चढ़ाव से जितना जुड़ा हुआ है उससे ज्यादा वह इस बात के लिए भी जाना जाता है कि इंदिरा गांधी की मुख्यधारा की राजनीति में वापसी पर जब प्रश्न चिन्ह खड़े हो गए थे तब कर्नाटक ने ही उन्हें डूबने से बचाया। चिकमंगलूर से वे लोकसभा में पहुंच सकीं। उससे उनकी वापसी का रास्ता खुला। उस कर्नाटक ने इस बार राहुल गांधी के लिए अपने दोनों हाथ फैलाए नहीं।

दरवाजे नहीं खोले। उनको अपनाया नहीं। वे कर्नाटक गए जरूर पर उन्हें दक्षिण के दरवाजे पर ठिठकना पड़ा। यह ऐसा झटका है जो राहुल गांधी को हमेशा दु:स्वप्न की तरह याद आता रहेगा। जब भी याद आएगा, उनकी नींद टूटेगी। बेचैनी शुरू होगी।  उन्हें अपने अंदर झांकना होगा। अपनी नेतृत्व की क्षमता, संगठन और अपने सरोकार पर पुनर्विचार करना होगा। पर क्या इसके लिए समय बचा है?

“कर्नाटक का राजनीतिक इतिहास कांग्रेस के उतार-चढ़ाव से जितना जुड़ा हुआ है उससे ज्यादा वह इस बात के लिए भी जाना जाता है कि इंदिरा गांधी की मुख्यधारा की राजनीति में वापसी पर जब प्रश्न चिन्ह खड़े हो गए थे तब कर्नाटक ने ही उन्हें डूबने से बचाया।”

कांग्रेस ने अलबत्ता अपनी पराजय और उससे मिली राजनीतिक झेंप से बचने का रास्ता खोज लिया है। यह राहुल गांधी की खोज नहीं है। सोनिया गांधी का हस्तक्षेप है। सोनिया गांधी को हस्तक्षेप दो बार करना पड़ा। पहली बार जब देखा कि सारे तीर तरकश से निकल गए हैं।

कोई भी निशाने पर नहीं पहुंचा है तब सोनिया गांधी ने अपना दस जनपथ का क्षेत्र संन्यास त्यागा। कर्नाटक में सभाएं कीं। यह बात अलग है कि मां-बेटे ने मिलकर भी जो चाहा, वह हासिल नहीं हुआ। लेकिन सोनिया गांधी के हस्तक्षेप से कर्नाटक में सरकार बन गई। उसकी बनी जो चुनाव अभियान के दौरान राहुल गांधी के निशाने पर था। सोनिया गांधी के ही हस्तक्षेप से राहुल गांधी ने एचडी कुमार स्वामी से माफी भी मांगी।

एचडी कुमार स्वामी को सौदा ठीक लगा। माफ कर देने से मुख्यमंत्री बन जाने का सौदा घाटे का नहीं था। भाजपा के मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदार बीएस यदियुरप्पा ने कांग्रेस और जनता दल (सेकुलर) के गठबंधन को विधान सभा में और उसके बाहर भी ‘अपवित्र’ बताया है। वे पवित्र और अपवित्र में ही सोचते हैं इसलिए ऐसा कहा।

पर यह गठबंधन वास्तव में अवसरवादी है। इससे राजनीति में अवसरवादिता बढ़ेगी। क्षेत्रीयता, जातीयता, सांप्रदायिकता और अवसरवादिता को फलने-फूलने का मौका मिलेगा। 2019 की दृष्टि से देखने पर यह घटना भारतीय जनता पार्टी के लिए इस रूप में सहायक होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर इसे अगर नहीं दोहराना है तो विकल्प नरेन्द्र मोदी के अलावा दूसरा नहीं है।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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