उत्साही लाल

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दैनिक भास्कर अखबार ने कर्नाटक चुनाव परिणाम के बाद कुछ ज्यादा ही उत्साह अपनी खबरों में दिखाया है। एक दिन उसने दो शीर्र्षकों से खबर दी। पहला शीर्र्षक था-मोदी को मिलकर हराएगा विपक्ष। विपक्ष के तीन चेहरे और उनके कथन को अखबार ने बाक्स बनाया। चेहरे हैं, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव। क्या ये तीन चेहरे ही विपक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं? दैनिक भास्कर की खबर से यही लगता है।

उसके नीचे मोटा शीर्र्षक था-कर्नाटक फार्मूला: 11 राज्यों में 13 दल। उसके नीचे दूसरा, उससे भी मोटा शीर्र्षक था- ‘349 सीटों पर भाजपा को घेर सकते हैं।’ इन शीर्र्षक से जो खबर छपी, वह भास्कर के अपने नेटवर्क से है।

दैनिक भास्कर के पाठक इस खबर को पढ़कर कर्नाटक चुनाव के संभावित राजनीतिक समीकरण की कल्पना कर रहे होंगे।

लेकिन अखबार ने यह बताने की कोशिश नहीं की कि आज वस्तुस्थिति क्या है? गठबंधन में कितने दल हैं? इसके बगैर जो कुछ छपा, वह दुष्प्रचार के लिए छेड़ा गया अभियान तो हो सकता है लेकिन वह खबर कैसे है? वस्तुस्थिति के बारे में बताना अखबार का पहला काम है। तथ्य छिपाकर कल्पना की उड़ान को खबर नहीं कह सकते। प्रचार का हिस्सा तो हो सकता है।

“विपक्ष के तीन चेहरे और उनके कथन को अखबार ने बाक्स बनाया। चेहरे हैं, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव। क्या ये तीन चेहरे ही विपक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं? दैनिक भास्कर की खबर से यही लगता है। ”

इस समय गठबंधन का कहां और कैसा स्वरूप है इसे छिपाकर जो भी फार्मूला पेश किया जाएगा, वह निराधार ही होगा। पहले यह देखें कि 2014 में गठबंधन का स्वरूप क्या था।उस समय नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राजग में 30 राजनीतिक दल थे। दूसरी तरफ यूपीए में 13 दल शामिल थे। चार साल बाद आज राजग से तेलगू देशम निकला है फिर भी इस गठबंधन में 47 दल हैं। देश के ज्यादातर राज्यों के प्रमुख क्षेत्रीय दल राजग में हैं।

वहीं यूपीए के दलों की संख्या घटकर 4 रह गई है। कर्नाटक चुनाव ने जहां 2019 के लिए नरेन्द्र मोदी विरोधी गठबंधन का रास्ता खोला है वहीं एक बड़ा पहाड़ भी उसके रास्ते में खड़ा कर दिया है। वह पहाड़ ऐसा है जिसको नापा नहीं जा सकता। जिसे पार करना करीब-करीब असंभव है। उस पहाड़ को पहचाने बगैर जो भी गठबंधन होगा, वह भीड़ का दृश्य उपस्थित करेगा, रणक्षेत्र में सन्नद्ध सेना का नहीं।

कर्नाटक ने कांग्रेस को क्षेत्रीय दल का दर्जा दे दिया है। यानी राष्ट्रीय स्तर पर किसी गठबंधन के नेतृत्व के लिए अयोग्य ठहरा दिया है। यही वह पहाड़ है जो नरेन्द्र मोदी विरोधी गठबंधन के सामने खड़ा रहने वाला है। इस कारण कांग्रेस के नेतृत्व में गठबंधन अब नहीं बनेगा। उसे राज्यों के दल अपना नेता नहीं मानेंगे।

“कर्नाटक चुनाव ने जहां 2019 के लिए नरेन्द्र मोदी विरोधी गठबंधन का रास्ता खोला है वहीं एक बड़ा पहाड़ भी उसके रास्ते में खड़ा कर दिया है। वह पहाड़ ऐसा है जिसको नापा नहीं जा सकता।”

कर्नाटक चुनाव से पहले भी गठबंधन के लिए प्रयासरत ममता बनर्जी और के चंद्रशेखर राव ने कई बार इसे दोहराया है कि वे कांग्रेस और भाजपा रहित गठबंधन बनाना चाहते हैं। कर्नाटक चुनाव से उनकी बात को बल ही मिलेगा।

इसलिए आज जो दलों की स्थिति है उसे ध्यान में रखकर राजनीतिक समीकरण की संभावनाएं बनती-बिगड़ती हैं। हवा में गठबंधन नहीं होते।  चुनाव आयोग ने भाजपा सहित सात दलों को राष्ट्रीय माना है। वे हैं- भाजपा, कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआइ और बसपा।

आयोग की कसौटी पर 57 दल राज्य स्तरीय हैं। 2044 दल आयोग में पंजीकृत हैं। यही है वह नक्शा जिसमें दल रंग भरेंगे। गठबंधन की शक्ल को एक स्वरूप देंगे। इस समय यह बहुत ही स्पष्ट है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एक सुगठित गठबंधन काम कर रहा है। 2019 में उसका विस्तार भी होगा। क्योंकि सीएसडीएस के ताजा सर्वे से भी इसकी पुष्टि हुई है कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता कायम है।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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