इस फैसले से युग परिवर्तन होगा: आरिफ मोहम्मद खान

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र्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 22 अगस्त को ऐतिहासिक निर्णय दिया। यह मुस्लिम समाज में दीर्घकाल से प्रचलित तीन तलाक की कुप्रथा से संबंधित था। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे गैर इस्लामी और असंवैधानिक करार दिया। मुख्य न्यायाधीश जे.एस.खेहर की अध्यक्षता वाली इस खंडपीठ में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई पारसी समुदाय के न्यायाधीशों को शामिल किया गया था। फैसला 3-2 के बहुमत से आया।

न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ, आर.एफ.नरीमन और यू.यू.ललित ने तीन तलाक को पूरी तरह से असंवैधानिक मानते हुए उस पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। तलाक बिदअत (एक साथ तीन तलाक) को मनमाना निर्णय कहकर उसको संविधान में दिए गए समानता के मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया। कुरान और हदीस के अनुसार भी विवाह तोड़ने के इस तरीके को अमान्य बताया।

इस लिहाज से संविधान की धारा-25 के अंतर्गत इसे धार्मिक स्वतंत्रता के आधार पर संरक्षण देने योग्य नहीं माना। वहीं मुख्य न्यायाधीश जे.एस.खेहर और न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर ने अपने आदेश में इसे कुरान सम्मत मानते हुए भी लंबे कालखण्ड से प्रचलन में होने के चलते धर्म का हिस्सा मानते हुए हस्तक्षेप योग्य नहीं माना।

बहुमत के आधार पर हुए संविधान पीठ के निर्णय के अनुसार 22 अगस्त से ही तीन तलाक असंवैधानिक घोषित किया गया। साथ ही केन्द्र सरकार को निर्देशित किया गया कि वह छह माह के भीतर इस संबंध में कानून बनाए। यह निर्देश अल्पमत वाले निर्णय का हिस्सा है।

तीन तलाक से संबंधित पांच मुस्लिम महिलाओं की याचिका समेत कुल सात मामलों पर यह फैसला आया है। इस मामले में 11 मई से लगातार छह दिन तक सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने सुनवाई की थी। 18 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक सहित हलाला और बहुविवाह की प्रथा पर भी रोक लगाने की मांग की।

न्यायालय ने बहुविवाह के विषय को सुनवाई के लिए लंबित रखा है। वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड ने भी माना कि तीन तलाक एक कुप्रथा है, पर न्यायालय इसमें दखल दे, वे स्वयं अपने समुदाय को इस कुप्रथा को छोड़ देने को कहेंगे।

आरिफ मोहम्मद खान वही शख्स हैं, जिन्होंने एक शाहबानो के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को संसद के जरिए उलट देने के चलते केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दिया था। वे (स्व.) राजीव गांधी मंत्रिमंडल के सदस्य थे। उस दौर में देश भर की कट्टरवादी मुस्लिम जमातों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उनके खिलाफ फतवे दिए गए थे। इस बार भी वे याचिकाकर्ता मुस्लिम महिलाओं की तरफ से न्यायालय में प्रस्तुत हुए। इस पूरे प्रकरण पर यथावत के ब्यूरो प्रमुख जितेन्द्र तिवारी ने सुप्रसिद्ध मुस्लिम विद्वान आरिफ मोहम्मद खान से बातचीत की। यहां पढ़िए पूरी बातचीत

सवालसर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक पर जो फैसला दिया है, उस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

जवाबसबसे पहली और बड़ी बात तो यह है कि मुस्लिम महिलाओं के सिर पर जो तीन तलाक की तलवार लटकी रहती थी, उसका खात्मा हुआ है। मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि मेरे आस पास तलाक की घटनाएं कितनी होती हैं, यह महत्व की बात नहीं है। ज्यादा महत्व इस बात का है कि एक मुस्लिम बच्ची इस सोच के साथ बड़ी होती है कि शादी के बाद उसका शौहर जिस दिन चाहे तीन बोल कहकर उसे घर से निकाल कर बाहर खड़ा कर सकता है।

इस भय से उसका व्यक्तित्व और मानस कुप्रभावित होता है। जब तक उसके दिल में यहतलाकतलाकतलाकका डर बैठा रहेगा तब तक वह युवती अपनी योग्यता और क्षमता के अनुरूप कभी अपने व्यक्तित्व का निर्माण कर ही नहीं पाएगी। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से उसके दिल से तीन तलाक का यह डर निकल जाएगा। इस लिहाज से यह बहुत ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला है। केवल मुस्लिम महिलाओं के लिए बल्कि सभी वर्गों की उन महिलाओं के लिए जो शादी के बाद किसी भी प्रकार के अत्याचार का शिकार हैं। उनके लिए यह एक उदाहरण है कि जब अपने समाज के भारी विरोध को दरकिनार कर और बहुत सीमित सहयोग से मुस्लिम महिलाओं ने बड़ी जंग जीत ली, तो भारत के सभी वर्गों की महिलाएं भी अपने हक और सम्मान को पाने के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकतीं हैं?

दूसरे, इस निर्णय में जो शब्द प्रयोग किए गए हैं, उनका महत्व और उसकी व्याख्या बहुत मायने रखती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा है कि यह कुरान सम्मत भी नहीं है और संविधान सम्मत भी नहीं है। इसके साथ ही यह भी कहा कि यह मनमाना (ऑर्बिटेररी) है। अर्थात यह प्रावधान संविधान के अध्याय 3 के मापदण्ड पर पूरा नहीं उतरता है। अब तक यह कहा जाता था कि धार्मिक कानूनों अर्थात पर्सनल लॉ को जो संरक्षण प्राप्त है उसके आधार पर उनको अध्याय 3 की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता है। अब यह भ्रान्ति दूर हो गई और अब किसी भी प्रावधान को अगर वह मनमानास्वच्छंद है तो उसको चुनौती दी जा सकती है। जब किसी धार्मिक कानून के एक प्रावधान या मजहबी चलन को न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह मनमाना है, तो साफ है कि जो भी मजहबी या धार्मिक चलन मनमाना होगा और जिसका कोई धार्मिक आधार नहीं होगा, उसको चुनौती दी जा सकेगी। मेरा स्पष्ट मानना है कि जैसे तीन तलाक कुरान सम्मत नहीं है उसी प्रकार बहुविवाह का निरंकुश अधिकार भी कुरान सम्मत नहीं है। 

मेरा स्पष्ट मानना है कि जैसे तीन तलाक कुरान सम्मत नहीं है उसी प्रकार बहुविवाह का निरंकुश अधिकार भी कुरान सम्मत नहीं है।

आरिफ मोहम्मद खान

सवालआप किस आधार पर कह रहे हैं कि जिस तरह तीन तलाक गैरइस्लामी है वैसे ही बहुविवाह भी गैरइस्लामी है?

जवाबकुरान अपनी आयत संख्या 24.32 में सीधेसीधे आदेश देता हैवनकिहुल अयामा मिनकुम। अर्थात शादी उससे करो जो शादीशुदा हो। हां, कुछ खास परिस्थितियों में जहां उहद की लड़ाई के बाद एकतिहाई मुस्लिम पुरुष मार दिए गए थे, वहां कुछ शर्तों के साथ दूसरी शादी की इजाजत दी गई थी। इस शर्त के साथ कि तुम इंसाफ कर सको। पर कुरान में इसके साथ यह भी कहा गया है कि यह तुम्हारे वश की बात ही नहीं कि तुम एक साथ दो बीबियों के साथ इंसाफ कर सको। तो जो खास परिस्थिति के लिए आयत है उसे तो स्वच्छंद अधिकार बना लिया। और जहां यह कहा गया है कि जो तुम्हारे समान हो उससे शादी करो, यानि जो गैर शादीशुदा है उसी से शादी करो, उसे अनदेखा किया जा रहा है।

मैंने किसी आलिम (विद्वान) से पूछा कि यह निर्देश क्या केवल पुरुषों के लिए दिया गया है, तो उन्होंने कहा नहीं यह तो स्त्रीपुरुष दोनों के लिए है। यानि साफ तौर पर स्त्री से भी कहा जा रहा है कि उससे शादी करो जिसके पास पहले से बीबी हो। यह बात तलाकशुदा या बेवा स्त्रीपुरुषों के लिए नहीं कही गई है। क्योंकि तलाक या पतिपत्नी में से किसी एक के मरने के बाद वह एकल है। पर जिसकी शादी पहले से हुई है और जिसकी पहले से पत्नी है, उसकी दूसरी शादी कुरान सम्मत नहीं है। चूंकि यह पति का अपना मनमाना निर्णय है इसलिए यह असंवैधानिक है।

सवालक्या बहुविवाह वाले चलन को भी न्यायालय में चुनौती देने का प्रयास है?

जवाबसर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई याचिका में तीन तलाक, हलाला और बहुविवाहतीनों के खिलाफ आवाज उठाई गई। पर न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने कहा कि पहले तीन तलाक पर ही सुनवाई हो जाने दीजिए। इस मामले में दिए गए निर्णय से इतना तो तय हो ही गया है कि अब तक जो कहा जाता था कि यह मजहब पर आधारित जो कानून या चलन है, उसको चुनौती नहीं दी जा सकती, यह भ्रम अब टूट गया है। इसलिए इस समय हर कोई शाहबानो की बात कर रहा है। शाहबानो की बात इसलिए हो रही है कि 1986 में उल्टी गंगा बहाई गई थी। तब अवसर था कि आगे कदम बढ़ाया जाता, लेकिन कदम पीछे खींच लिए गए। इसलिए उसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई।

उस प्रतिक्रिया से निपटने के लिए अयोध्या में राम जन्मभूमि का ताला खुलवाया गया। यह मैं नहीं कह रहा हूं, सब जानते हैं, एक ऐतिहासिक सत्य है। उस सबसे जो दुराव पैदा हुआ उसके दुष्परिणाम हम आज तक भुगत रहे हैं। याद करिए तब मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से कैसी भड़काऊ और हिंसक भाषा बोली गई थी। तब संसद के बाहर हुए प्रदर्शन में पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्यों ने कहा था कि जो सांसद शरीयत की मुखालफत करें उनकी टांगें तोड़ दो। ख़ुद संसद में शाहबानो के पक्ष में निर्णय देने वाले न्यायाधीशों के बारे में बहुत अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया था। उस सबके चलते हिन्दूमुस्लिम समाज के बीच दुराव पैदा हुआ और निरन्तर बढ़ता गया। उस लिहाज से तीन तलाक पर एक युगान्तरकारी फैसला आया है। इस निर्णय के बाद जैसे पूरे देश ने राहत की सांस ली है। पूरा देश उत्सव मना रहा है।

सवालपर अभी भी मुस्लिम समाज और उसके कुछ नेताओं की तरफ से विरोध के सुर उभर रहे हैं?

जवाबछोटेमोटे विरोध के कोई मायने नहीं होते। ऐसा एक तबका हमेशा रहता है। पर आप देखिए कि मुस्लिम महिलाएं किस कदर उत्सव मना रही हैं। उनके चेहरे की खुशी और सुकून को देखिए।

सवालपहले से कहा जा रहा था कि तीन तलाक कुरान का हिस्सा नहीं है। इसके बावजूद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड या मुस्लिम तंजीमों ने खुद क्यों नहीं इसके खिलाफ आवाज बुलंद की। न्यायालय के दखल को क्यों आमंत्रित किया?

जवाबआप किसी भी फतवे की वेबसाइट पर जाइए, वहां आप पाएंगे कि 90 फीसदी से ज्यादा फतवे उन मामलों में दिए गए जो तीन तलाक से संबंधित थे। तीन तलाक खत्म हो गया तो फतवा खत्म हो जाएगा। तो अपने पेशे को कौन खोना चाहता है। 1986 में यही लोग कहा करते थे कि तीन तलाक शरीयत का हिस्सा है और इसे बदला नहीं जा सकता।

अब 2017 में न्यायालय में कह रहे हैं कि यह बिदअत है, हम भी इसे खत्म करना चाहते हैं। तो क्या 30 साल में कुरान या शरीयत बदल गई? नहीं, बदलते जमाने के साथ इनको सच स्वीकार करना पड़ा। वह भी तब जबकि सर्वोच्च न्यायालय में दलीलें पूरी हो गईं। तब पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्यों की तरफ से कहा जाने लगा कि यह बिदअत है, कुप्रथा है, अन्यायपूर्ण है, हम खुद अभियान चलाकर इसे खत्म करेंगे, आप इसमें दखल मत दीजिए। सवाल है कि अब तक आपने खत्म क्यों नहीं किया? अब तक इसे कुरान द्वारा दिए गए अधिकार की तरह क्यों प्रयोग करते रहे?

सवालभारत से अलग होकर इस्लामी देश पाकिस्तान ने भी 1962 में तीन तलाक की कुप्रथा को खत्म करने की घोषणा कर दी थी। पर भारत के मुसलमान अड़े रहे, इसकी क्या वजह है? क्या इसके कोई राजनीतिक कारण भी हैं?

जवाबनिश्चित रूप से। यह जिद पर्सनल लॉ बोर्ड की थी, आम मुसलमान की नहीं। आज भी अगर कोई और सरकार होती तो ये लोग वही कह रहे होते जो 1986 में बोल रहे थे, कि हम देश की ईंट से ईंट बजा देंगे। आज जो फैसला आया है उसका पहला श्रेय उन मुस्लिम महिलाओं को जाता है, जिन्होंने इसके लिए संघर्ष किया। अपनी लड़ाई को सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचाया। मैंने उनकी ओर से पैरवी की है, मैं उनके हालात जानता हूं। वकील की फीस देना तो दूर, उनके पास दिल्ली आनेजाने तक के पैसे नहीं हुआ करते थे। उनको कहीं से भी सहयोग नहीं मिल रहा था। उनका अपना समाज और परिवार तिरस्कृत कर रहा था। उन्हें लानतें दे रहा था। इसके बाद भी उन्होंने हौसला नहीं खोया।

दूसरा श्रेय जाता है देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार को। उन्होंने इस कुप्रथा से पीड़ित मुस्लिम महिलाओं की बात को जिस तरह से आवाज दी, मंचों से दोहराया, उनकी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दिया, दलील दी, उसने उन मुस्लिम महिलाओं को हौंसला दिया, जो न्याय के लिए आवाज उठा रही थीं।

आज अगर कोई और सरकार होती तो ये लोग वही कह रहे होते जो 1986 में बोल रहे थे, कि हम ईंट से ईंट बजा देंगे। आज जो फैसला आया है उसका पहला श्रेय उन मुस्लिम महिलाओं को जाता है, जिन्होंने इसके लिए संघर्ष किया। दूसरा श्रेय जाता है देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार को।

आरिफ मोहम्मद खान

सवालअब दलीलें दी जा रही हैं कि न्यायालय का फैसला सर्वसम्मत नहीं है, बहुमत के आधार पर है, 3-2 का फैसला है।

जवाबइससे क्या अंतर पड़ता है। जिन दो न्यायाधीशों ने इसे असंवैधानिक नहीं कहा उन्होंने भी माना है कि यह कुरान सम्मत नहीं है। पर उन्होंने कहा कि यह चलन में है तो इसमें हम दखल दें।

सवालनिर्णय आने के बाद भी कुछ लोग अड़े हुए हैं कि वे तो मजहबी कानून के हिसाब से ही चलेंगे। कहींकहीं से खबरें रहीं हैं कि उसके बाद तीन तलाक दिया गया?

जवाबहां ऐसा होगा। जमीयत उलेमा हिन्द के सचिव ने भी बयान दिया है कि आया करे कोर्ट का फैसला। हम तो तीन तलाक को शरिया का ही हिस्सा मानते हैं। यानि  लोग अभी भी तीन तलाक देंगे। पर जिस तरह से मुस्लिम महिलाओं ने जश्न मनाया है उससे वह दिन दूर नहीं जब तीन तलाक बोलने वाले शौहर को महिलाएं ही कहेंगी कि तुम जाओ घर के बाहर, मैं नहीं जाऊंगी, क्योंकि यह कानूनी नहीं है। इसके बाद जोरजबरदस्ती की गई तो यह पूरी तरह से मानसिक प्रताड़ना और घरेलू हिंसा का मामला बनेगा और मुकदमा चलेगा। इस तरह के मामलों में जहां सजाएं होनी शुरू हुईं और अखबारोंटेलीविजन पर वह सब आया, तो कोई भी तीन तलाक देने की हिम्मत नहीं करेगा।

सवालडर यह भी पैदा किया जा रहा है कि अब कोर्ट ने मजहब के मामले में दखल दे दी है तो कॉमन सिविल कोड की बात भी की जाने लगेगी?

जवाबकुछ लोग ऐसा करें तो इनकी मजहबी दुकानें बंद हो जाएंगी। ये तो अपने पेशे को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। आखिर कॉमन सिविल कोड है क्या, पहले यह तो समझ लें। हिन्दू शास्त्रों में तलाक का कोई प्रावधान नहीं है, हिन्दू सिविल कोड में है। हिन्दू शास्त्रों में पिता की संपत्ति में पुत्री के हक की बात नहीं है, हिन्दू सिविल कोड में है। समझना होगा कि यह कहां से आया। यह इस्लाम में था, वहां से लिया गया। उसका लाभ उठाया गया। तब उसी रास्ते पर चलने में इस्लामवादियों को क्या दिक्कत है?

झूठ फैलाने वाले, डर पैदा करने वाले कहते हैं कि कॉमन सिविल कोड लागू हो गया तो सबको अग्नि के फेरे लगाने पड़ेंगे, सबको अपने मुर्दे जलाने पड़ेंगे। इस आधार वे प्रचारित करते हैं कि कॉमन सिविल कोड लागू होने से मजहबी पहचान खत्म हो जाएगी।

अरे भाई, हिन्दू सिविल कोड केवल हिन्दुओं पर ही नहीं, सिखोंजैनों और बौद्धों पर भी समान रूप से लागू होता है, क्या उनकी मजहबी पहचान खत्म हो गई? सिख अपने तौरतरीकों से शादी करते हैं, अग्नि के सात नहीं, गुरू ग्रंथ साहिब के चार फेरे लेते हैं। जैनबौद्ध अपने तौरतरीकों से शादी आदि करते हैं, अपनी उपासना पद्धति के हिसाब से जीतेमरते हैं। अन्य मतपंथों में छोडि़ए, अलगअलग क्षेत्रों के हिन्दू अपनेअपने हिसाब से रीतिरिवाज चलाते हैं। कोंकण से लेकर मालाबार तक ब्राह्मणों में सगी भांजी से शादी को प्राथमिकता दी जाती है।

यही बात अगर किसी उत्तर भारतीय ब्राह्मण से कह दो तो वह कहेगा कि नरक में जाने का सीधा रास्ता है। तो जो कॉमन हिन्दू सिविल कोड हिन्दुओं के रीतिरिवाजों को एक समान नहीं कर सका वह कॉमन सिविल कोड के रूप में लागू होने के बाद किसी की और की पहचान कैसे मिटा देगा?

1986 में सरकार के रवैये से ऐसा संदेश गया कि देश का हर मुसलमान मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पीछे खड़ा है। आज वह भ्रम भी टूट गया। इसलिए मैं इस निर्णय को बारबार युग परिवर्तन करने वाला बता रहा हूं। आज कोई यह नहीं कह सकता कि मजहब के चंद ठेकेदार अगरइस्लाम खतरे में हैका नारा लगा दें तो सारे के सारे मुसलमान सड़क पर उतर आएंगे।

आरिफ मोहम्मद खान

सवालतब भय किसका है और किसको है?

जवाबनया कानून बनाने में हमेशा इस बात का ध्यान रखा जा सकता है कि ना तो किसी नागरिक को ऐसा काम करने के लिये कहा जाए जिसे उसका धर्म निषिद्ध करता है ना ही उसे किसी ऐसे काम से रोका जाए जिसे उसका धर्म आवश्यक दायित्व घोषित करता है। मान लीजिए कि देश में कॉमन सिविल कोड लागू हो गया, तो क्या वह कानून हमें निकाह करने से रोक देगा? क्या अपनी पत्नी को हकमेहर देने से रोक देगा? पर इसका डर दिखाकर कुछ लोग अब भी नफरत की राजनीति कर रहे हैं। ये लोग पिछड़ेपन के एजेंट के तौर पर काम करते हैं। लेकिन अब इनकी ताकत नहीं बची है।

आप देखिए कि जब शाहबानो का मामला हुआ था तो मैं अकेला खड़ा दिखाई देता था। आज लाखों की संख्या में पुरूष भी इसके समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं। मुस्लिम महिलाओं की संख्या तो करोड़ों में हैं।

दुर्भाग्य से उस समय,1986 में, सरकार के रवैये से ऐसा संदेश गया कि देश का हर मुसलमान मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पीछे खड़ा है। आज वह भ्रम भी टूट गया। इसीलिए मैं इस निर्णय को बारबार युग परिवर्तन करने वाला बता रहा हूं। आज कोई यह नहीं कह सकता कि मजहब के चंद ठेकेदार अगरइस्लाम खतरे में हैका नारा लगा दें तो सारे के सारे मुसलमान सड़क पर उतर आएंगे। इस लिहाज से विभाजनकारी तत्व आज अलगथलग पड़े नजर रहे हैं।

हालांकि 1986 में भी ये तत्व उतनी बड़ी ताकत बनते अगर तब की सरकार ने इनके सामने समर्पण कर दिया होता। तब सरकार के समर्पण से वे लोग भी चुप हो गए थे जो इनसे अलग राय रखते थे। इस बार केवल इन विभाजनकारी लोगों ने इस निर्णय का स्वागत किया है बल्कि जो ऐसा नहीं कर रहे हैं वे अलगथलग पड़े हुए हैं। मुस्लिम समाज में आया यह परिवर्तन भी बहुत आश्वस्तकारी है।

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