इमरान को सेना की सरपरस्ती

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ब सत्ता की बागडोर नए व्यक्ति के हाथ आती है तो सरकार के छोटे-बड़े कदमों के आधार पर यह अनुमान लगाने की कोशिश होती है कि देश की दशा-दिशा क्या रहने वाली है। इमरान के साथ भी ऐसा ही हो रहा है।

मोटे तौर पर तो इमरान खान वही कर रहे हैं जिसका अंदाजा था। यानी ऐसी राजनीतिक सत्ता की अगुवाई जो सेना की सरपरस्ती में चलती हो। उनके मंत्रिमंडल में सेना और खास तौर पर पूर्व तानाशाह और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के विश्वासपात्र लोगों को तरजीह दी गई है।

ऐसे में भारत के साथ रिश्तों की अगर बात करें तो अब तक की पाकिस्तान की घोषित-अघोषित नीतियों में जो भारत-विरोधी तत्व मौजूद रहा है, उसके आगे भी ऐसे ही मजबूत बने रहने का अनुमान है। कम-से-कम इमरान की कैबिनेट को देखकर तो ऐसा ही लगता है।

“इमरान ने प्रधानमंत्री पद तक का सफर बदलाव के घोड़े पर सवार होकर तय किया है, लेकिन उनकी कैबिनेट पर इस बदलाव की छाप नहीं दिखी।”

इमरान ने प्रधानमंत्री पद तक का सफर बदलाव के घोड़े पर सवार होकर तय किया है, लेकिन उनकी कैबिनेट पर इस बदलाव की छाप नहीं दिखी। पाकिस्तान चुनाव पर नजर रखने वालों ने जरूर गौर किया होगा कि कैसे मीडिया के मंच पर शहरयार खान आफरीदी, अली मोहम्मद खान, फर्रुख हबीब और जरताज गुल वजीर जैसे तेज-तर्रार वक्ताओं ने इमरान के व्यक्तित्व के ईद-गिर्द सपनों की दुनिया को गढ़ा और लोगों में एक नए पाकिस्तान की उम्मीद जगाई।

लेकिन इनमें से किसी को कैबिनेट में जगह नहीं मिलना अवाम के लिए जरूर ही निराशाजनक रहा होगा। किसी भी समाज या तंत्र में युवा हवा के ताजा झोंके की तरह होते हैं, जो नई तारीख लिखने का साहस रखते हैं, भूत की नकारात्मकता को हाशिए पर डालकर सकारात्मकता को मुख्यधारा में प्रतिष्ठापित करने का जज्बा रखते हैं। लेकिन इमरान की कैबिनेट ने इस संदर्भ में भी निराश किया है।

ये तो हुई उनकी बात जिन्हें इमरान ने नजरअंदाज कर दिया। अब बात उनकी जिन्हें उन्होंने जगह दी। इमरान चुनाव प्रचार के दौरान इस भाव को पुरजोर तरीके से सामने रखते रहे कि सही आदमी के जिम्मे सही काम होना चाहिए।

लेकिन इमरान ने इस मोर्चे पर भी लोगों को निराश ही किया। कैबिनेट में जगह पाने वालों में डॉ. खालिद मकबूल, शेख राशिद, डॉ. जुबैदा जलाल, परवेज खटक, शिरीन मजारी और डॉ. फरोघ नसीम जैसे लोग हैं जो  सियासत में हैं। इनकी एक ही ताकत है सेना का विश्वासपात्र होना।थोड़े अंतर से बहुमत से पीछे रह गए इमरान की कैबिनेट में गठबंधन की बाध्यताएं भी साफ दिखती हैं।

“इमरान की 21 सदस्यीय कैबिनेट में मुशर्रफ-काल के 14 लोगों को शामिल करने से स्पष्ट है कि पाकिस्तान में सेना का ही एजेंडा चलेगा, जो वैसे भी तय ही था। इमरान को पूरा इल्म है कि सरकार चलाने के लिए उन्हें सेना का हाथ अपने सिर पर चाहिए।”

अपने सहयोगी दलों के जिन नुमाइंदों को इमरान ने कैबिनेट में शामिल किया, उनमें मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट के फरोघ नसीम (कानून व न्याय), पीएमएल-क्यू के चौधरी तारीक बशीर चीमा (प्रांत और सीमांत क्षेत्र), बलूचिस्तान अवामी पार्टी की जुबैदा जलाल (रक्षा उत्पादन), अवामी मुस्लिम लीग के शेख राशिद अहमद (रेलवे), ग्रैड डेमोक्रेटिक एलायंस की डॉ. फेहमिदा मिर्जा (अंतरराज्यीय समन्वय), एमक्यूएम-पी के खालिद मकबूल सिद्दीकी (सूचना प्रौद्योगिकी व दूरसंचार) हैं। इनके अलावा फाटा के निर्दलीय नुरुल हक कादरी (धार्मिक मामले और अंतर्धार्मिक समन्वय) को भी जगह मिली।

चीमा को कैबिनेट में जगह देकर इमरान ने अपने लिए बदनामी ही बटोरी है।  चीमा अल जुल्फिकार नाम के अतिवादी संगठन के सक्रिय सदस्य रह चुके हैं। उसका गठन भुट्टो की फांसी का बदला लेने के लिए किया गया था। चीमा पर इस दौरान कई मामले दर्ज हुए और अंतत: उन्हें लाहौर की जेल में बंद कर दिया गया था।

चीमा के आतंकवादियों से कैसे रिश्ते थे, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1981 में आतंकवादियों ने पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस के एक यात्री विमान का अपहरण कर लिया था और यात्रियों की रिहाई के लिए हुई सौदेबाजी में चीमा जेल से छूटे थे।

उसके बाद वह अफगानिस्तान भाग गए और करीब आठ साल तक वहीं रहे। इस बीच, पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन हुआ और पीपीपी की सरकार ने उनके खिलाफ लगे सारे मामले वापस ले लिए। तब कहीं जाकर चीमा का पाकिस्तान लौटना संभव हो सका और वह पीपीपी के सदस्य के तौर पर सियासत में आए।

बाद में वह मुशर्रफ के काफी करीबी हो गए थे और खैबर के इलाकों से अफगानिस्तान में तालिबान लड़ाकों की सक्रियता में उनकी खासी भूमिका रही थी।

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