आतंकवाद के खिलाफ तीखे तेवर

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दिन शनिवार। तारीख तीन जून और समय तड़के तीन बजे दिल्ली, गुरुग्राम व जम्मू श्रीनगर में स्थानीय पुलिस के साथ-साथ अर्द्धसैनिक बलों की गाड़ियां कई ठिकानों पर एक साथ पहुंचीं। इन गाड़ियों के पीछे नेशनल इनवेस्टिेगशन एजेंसी यानी एनआईए की गाड़ियां भी चल रही थीं।

यह कोई मुठभेड़ की तैयारी नहीं थी। लेकिन, हां मुठभेड़ के हालात पैदा करने वाले कश्मीर में भारत के विरुद्ध हिंसक आंदोलन चलाने वाले और आतंकवादियों को सीधे पैसे देने वाले लोगों के खिलाफ ऑपरेशन था। ‘टेरर फंडिग’ के खिलाफ यह पहला बड़ा ऑपरेशन था।

एक ऐसा ऑपरेशन जो सटीक जानकारी और पर्याप्त सबूतों के आधार पर किया गया था। इस आपरेशन की जद में थे- हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता, उनसे मिले कुछ कश्मीरी व्यापारी, हवाला ऑपरेटर और कुछ बिचौलिये। एनआईए ने इस ऑपरेशन के जरिये न सिर्फ भारी मात्रा में देसी और विदेशी मुद्रा बरामद की, बल्कि उन सूत्रों को भी खंगाल निकाला, जो इस ‘टेरर फंडिंग’ के स्रोत थे। इस छापेमारी में एनआईए के हाथ ढाई करोड़ रुपए नकदी और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले दस्तावेज के साथ-साथ कई अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज लगे।

कश्मीर के हालात नाजुक हैं। आतंकवादी घटनाओं में तेजी आई है। सुरक्षा बलों द्वारा सीधी कार्रवाई इसकी वजह है। वहीं हुर्रियत नेताओं पर छापेमारी कर सरकार ने मंशा साफ कर दी है कि आतंकवाद के सफाए तक नरमी नहीं आने दी जाएगी।

इसके साथ ही वे तमाम कड़ियां सामने आईं जो इस्लामाबाद से शुरू होकर वाया सउदी अरब, नेपाल और दिल्ली से होकर कश्मीर घाटी में खून-खराबे के खर्च के रूप में करोड़ों रुपए हर महीने भेज रहीं हैं।

इससे एक बात और साफ है। वह यह कि कथित आजादी और कश्मीर में इस्लामी जेहाद के नाम पर आतंक का जो ढांचा तैयार किया गया है, उसका मकसद न सिर्फ भारत से कश्मीर को अलग करना है, बल्कि वहां सलाफी का राज कायम करना है। हिज्बुल मुजाहिदीन के पूर्व कमांडर जाकिर मूसा का संदेश यह बताने के लिए पर्याप्त है।

वह कश्मीर के आतंकवाद को भारतीय मुसलमानों द्वारा समर्थन न दिए जाने पर अपशब्द बोल रहा है। उसे भारतीय मुसलमानों के प्रतिनिधियों ने करारा जवाब दिया है।

दरअसल वहाबी दर्शन पर आधारित इस जेहाद का पहला मकसद है घाटी से सभी गैर इस्लामी लोगों को भगाना या उन्हें मार डालना। इसके लिए ही सउदी अरब अस्सी के दशक से भारत में ‘जिहाद मनी’ भेज रहा है।
एनआईए ने यह छापेमारी अकस्मात ही नहीं कीं। न ही किसी चैनल पर दिखाए गए किसी स्टिंग ऑपरेशन के सामने आने के बाद किया गया। जैसा कि वह चैनल दावा करता है, बल्कि लम्बे समय से भारतीय खुफिया एजेंसियां आतंक के आर्थिक सहयोगियों की जड़ तक पहुंचने में जुटी थीं। इस बीच एक स्टिंग ऑपरेशन के सामने आने और उसमें हुर्रियत नेताओं की स्वीकारोक्ति ने जांच एजेंसी को सीधे हाथ डालने का अवसर दे दिया।

इससे पहले ही सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों के पास इस बात की जानकारी थी कि घाटी में आतंकवादी कार्रवाइयां जारी रखने और उन्हें तेज करने के लिए हर महीने ढाई से तीन करोड़ रुपए हवाला या अन्य स्रोतों के जरिये पहुंचाए जा रहे हैं। घाटी में सक्रिय आंतकवादी गुटों और हुर्रियत नेताओं को पैसे कई माध्यमों से भेजे जा रहे थे। जिसमें मुख्य रूप से पाकिस्तान में छपे नकली भारतीय नोट, जिहाद के नाम पर पाकिस्तान, यूरोप और मध्य एशिया से धन जुटाया जा रहा है।

इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर के बड़े व्यावसायियों, व्यापारियों और ठेकेदारों से जबरन वसूली की जा रही है। हाफिज सईद का संगठन, दाऊद कंपनी और लश्करे तैयबा जैसे पाकिस्तानी संगठन कश्मीर के नाम पर पाकिस्तानी लोगों सहित इस्लामी देशों से लगातार धन उगाही करते रहते हैं। यह सारा धन हवाला और नशे के कारोबारियों के जरिये, दुबई में बैठे कुछ कश्मीरी उद्योगपतियों के जरिये, घाटी में पहुंचाया जा रहा है।

भारत-पाकिस्तान के बीच रेल सेवा (समझौता एक्सप्रेस) और बस सेवा (कारवां ए अमन) के जरिये भी नकली नोट भारत लाये जाते रहे हैं।
ये तो वे संगठन या लोग हैं, जो अपने स्रोतों के जरिये कश्मीर में अशांति का माहौल बनाये रखना चाहता हैं।

दूसरा ज्ञात सच यह है कि पाकिस्तान की सरकार एक ‘स्टेट पॉलिसी’ के तहत कश्मीर में आतंकवादियों-अलगाववादियो को धन, अन्य संसाधन व गोला-बारूद मुहैया करा रही है। पाकिस्तान सरकार ने धन की आपूर्ति के लिए भारतीय नकली नोटों को छापने की बाकायदा एक प्रेस लगा रखी है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने एक ऐसा सेल बना रखा है जिसका काम सिर्फ भारतीय नोटों की सुरक्षा विशेषज्ञता का अध्ययन करना और उसकी हू-ब-हू नकल करना है।

सीमा पर युद्ध विराम उल्लंघन की कितनी घटनाएं हो रही हैं, वह गिना नहीं जा सकता। दोनों देशों के बीच तनाव का कारण बने कश्मीर में भी तनाव चरम पर है।

पाकिस्तान सरकार ने बेहद शातिराना तरीके से नकली नोटों को भारत तक पहुंचाने का रूट बनाया है। पहले वह इस्लामाबाद और कराची की प्रेस में नकली नोट छापते हैं। फिर वे दुबई, काठमांडु, बैंकाक, ढाका और सिंगापुर के बैंकों में अलग-अलग नामों से उसे जमा करवाते हैं। फिर उस धन को अलग-अलग स्थानों से निकाल कर आतंकवादी संगठनों के एजेंटों के जरिए घाटी तक पहुंचाया जाता है।

पाकिस्तानी घुसपैठिए व आतंकवादी भी इन नकली नोटों की खेप घाटी तक पहुंचाते हैं। खुफिया एजेंसियों के अनुसार भारत में ‘टेरर फंड’ पहुंचाने में डी. कंपनी भी आईएसआई को अपने नेटवर्क का पूरा इस्तेमाल करने देती है। दाउद के गुर्गे दिल्ली के अलावा, मुंबई, हैदराबाद और लखनऊ में भी सक्रिय हैं। ये एजेंट पैसे के अलावा कई बार घाटी में हथियार आदि भी पहुंचाते रहे हैं।

पकड़े गए आतंकवादियों और स्थानीय लड़कों ने कई बार स्वीकार किया है कि वे घाटी में खून-खराबा सिर्फ पैसे के लिए करते हैं। न तो उनको आजादी से कुछ लेना-देना हैं और न ही कथित जेहाद से। उन्हें हुर्रियत नेताओं और अन्य आतंकवादी संगठनों से हर दिन के हिसाब से पैसे मिलते हैं। आज घाटी में जितने भी आंतकवादी सक्रिय हैं, चाहे वे हिजबुल मुजाहिद्दीन के हों या लश्करे तैयबा के, सबको पैसा पहंचाया जा रहा है।

यह ‘टेरर फंड’ कई तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके जरिए नए लड़कों की आतंकवादी संगठनों में भर्ती की जा रही है। आतंकवादियों के लिए हथियार खरीदे जा रहे हैं। उनके लिए खाने-पीने और प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा रही है। आतंकी बन चुके लड़कों को बाकायदा मासिक भत्ता दिया जा रहा है। उनके परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी आतंकवादी संगठन ले रहे हैं। सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाने पर उसके परिवार को लाखों रुपए दिए जा रहे हैं।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह सब जानते हुए भी पहले की सरकारें सीधी कार्रवाई करने से बचती रही हैं। इसकी वजह है आंतकवादियों और पाकिस्तान के बीच सेतु का काम कर रहे हुर्रियत के नेताओं की भूमिका। पहली बार सुरक्षा एजेंसियों ने हुर्रियत नेताओं के घरों पर छापेमारी की है और उनसे पूछताछ की है। इसके साथ ही ‘टेरर फंड’ के सभी स्रोतों को बंद करने के लिए भारत सरकार काफी गंभीर दिखाई दे रही है।

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सीधे तौर पर कहा है कि हम कश्मीर समस्या का ‘स्थायी समाधान’ खोजने की दिशा में चल रहे हैं। रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने भी साफ कर दिया है कि सरकार सेना के काम में हस्तक्षेप नहीं करेगी।

पाकिस्तान से आने वाले ‘टेरर फंड’ पर न केवल भारतीय एजेंसियां बल्कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां भी नजर रख रही हैं। सऊदी अरब के साथ भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बेहतर संबंध बनाने की कवायद से सकारात्मक परिणाम निकलने की उम्मीद है। पिछले साल अप्रैल में जब मोदी ने सउदी अरब का दौरा किया था तो उस समय जिन पांच समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे, उनमें एक समझौता ‘टेरर फंडिंग और मनी लौंड्रिंग को लेकर भी था।

तब से सऊदी अरब भारत के साथ सहयोग कर रहा है। इस बात की तस्दीक इससे होती है कि पिछले एक साल में 40 हजार पाकिस्तानियों को सऊदी ने अपने देश से निकाल बाहर किया। वहां के स्थानीय अखबार सऊदी गजट के अनुसार निकाले गए अधिकतर पाकिस्तानी वहां के आतंकवादी संगठन ‘दयेश’ के साथ जुड़े थे। वे इस्लाम के नाम पर चल रही आतंकवादी गतिविधियों के लिए आर्थिक सहायता मुहैया करा रहे थे।

एनआईए ने हुर्रियत नेताओं के यहां छापेमारी कर ‘टेरर फंडिंग’ की उस कड़ी को ध्वस्त करने की कोशिश है। खासकर उस तंत्र को तोड़ने की कोशिश की है जो घाटी में लोगों को उकसाने, तोड़-फोड़ और पत्थरबाजी करने और आतंकवादी संगठनों को पीछे से मदद करने में संलिप्त हैं।
कहने की आवश्यकता नहीं है कि हुर्रियत कांफ्रेस के चेयरमैन सैयद अली शाह गिलानी, यासीन मलिक, पीरजादा उमर फारूख, शब्बीर शाह आदि आजादी के नारे के नाम पर करोड़ों रुपए हर महीने पाकिस्तान और अन्य देशों व स्रोतों से प्राप्त कर रहे हैं। इस पैसे से वे अपने लिए तमाम सुख सुविधाएं जुटा रहे हैं। कुछ युवा आतंकी इस धन की चाह में आतंकवादी बन रहे हैं।

पर अधिकांश वे हैं जो कथित उत्पीड़न के नाम पर, इस्लाम के नाम पर, जिहाद के नाम पर, कश्मीर की आजादी के नाम पर भावनाओं में बहकर हथियार उठा लेते हैं। उनकी इन भावनाओं का दोहन हुर्रियत के नेता पैसा बटोर कर करते हैं।

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