आखिर ऐसा गुस्सा क्यों?

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किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने के लिए डॉ. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग को लेकर देश के कुछ राज्यों में गांवबंद आंदोलन चल रहा है।

किसान आंदोलन के नाम पर सड़कों पर फल, दूध और सब्जियों को फेंकने की प्रयोजित घटनाओं को मीडिया में कवरेज भी मिली है। दुष्प्रचार किया जा रहा है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद गेहूं के दाम 3,600 रुपये प्रति क्विंटल हो जाएंगे।

वास्तविकता यह है कि गेहूं के लिए सी2 लागत का 50 प्रतिशत लाभ देने पर भी उसकी कीमत 1,884 रुपये प्रति क्विंटल ही होगी। वह अभी 1,735 रुपये प्रति क्विंटल है। अब इस बात को समझना कठिन है कि किसान केवल गेहूं की कीमत में 149 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि के लिए ही दूध बहा रहा है।

प्रसंगवश बता दें कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने डॉ. सोमपाल शास्त्री की अध्यक्षता में किसान आयोग का गठन किया था। आयोग ने अपनी सिफारिशों की रिपोर्ट करीब-करीब तैयार कर ली थी लेकिन 2004 में भाजपा आम चुनाव में हार गई और डॉ. सोमपाल शास्त्री ने किसान आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. स्वामीनाथन को किसान आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। डॉ. स्वामीनाथन ने सोमपाल शास्त्री के निष्कर्षों को सही माना और उनके आधार पर ही अपनी रिपोर्ट में किसानों को सी2 लागत का डेढ़ गुना फसल मूल्य देने की सिफारिश वर्ष 2006 में ही कर दी थी।

“किसानों की समस्याओं को लेकर देश के कई किसान संगठनों ने गांवबंद आंदोलन चला रखा है। किसान गुस्से में हैं। लेकिन सब्जियों और दूध को सड़कों पर फेंकना कितना उचित है? किसान-समस्याओं पर फोकस करता विश्लेषण ”

कांग्रेस की सरकार ने इसे 2014 तक नहीं लागू किया और भाजपा ने इसे 2014 के आम चुनाव में एक मुद्दा बनाया। सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सी2 लागत का डेढ़ गुना फसल मूल्य देने के सिवाय स्वामीनाथन आयोग की सभी सिफारिशों को मान लिया है।

इसे हर फसल पर लागू करने में कुछ व्यावहारिक दिक्कते हैं जिनको दूर करना आवश्यक है। डॉ. सोमपाल शास्त्री ने सी2 लागत का 10 प्रतिशत प्रबंधन भत्ता भी लागत में जोड़कर उसे सी3 लागत माना था और उस पर  50 प्रतिशत मुनाफा किसानों को देने का विचार दिया था।

सी2 को फसलों का लागत मूल्य नहीं घोषित करने को लेकर सबसे बड़ा तर्क है कि ऐसा करते ही खाने-पीने की चीजों की कीमतें आसमान छूने लगेंगी और उपभोक्ताओं पर भारी बोझ पड़ेगा।

वास्तव में इससे भारत की आबादी में जिसे निम्न मध्यम वर्ग कहा जाता है, वह सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। समाज का अमीर तबका तो आठ रुपये प्रति किलो आलू पर कंपनियों का ठप्पा लगते ही आलू चिप्स 500 रुपये किलो तक खुशी से खरीदता है।

गरीब रेखा से नीचे के लोगों को सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से 2 रुपये किलो गेहूं और 3 रुपये किलो चावल दे ही रही है।

इसके बावजूद यदि सी2 लागत का 50 प्रतिशत मुनाफा एमएसपी के तौर पर देने की सिफारिश पूरी तरह लागू भी हो गई तो भी किसानों के अत्यल्प तबके को ही इसका लाभ होने वाला है।

इसका कारण है कि पूरे देश में केवल 6 प्रतिशत किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर होने वाली खरीद से लाभान्वित होते हैं। एमएसपी भले ही 24 फसलों के लिए होती है लेकिन प्रमुख सरकारी खरीद केवल गेहूं, और धान की होती है।

“इस प्रकार देखें तो गेहूं का न्यूनतम मूल्य 1884 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए था जो अभी 1,735 रुपये है। इस प्रकार गेहूं पर सी2 लागत का 38  प्रतिशत लाभ सरकार दे रही है।”

अब सरकार ने दलहन और तिलहन की खरीद पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया है। एमएसपी पर चीनी मिलें गन्ना खरीदती हैं लेकिन मिलों पर किसानों का बकाया हमेशा ही एक प्रमुख मुद्दा बना रहता है।

इस खरीद का ज्यादातर हिस्सा भी केवल पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के कुछ जिलों से ही पूरा हो जाता है।

रबी फसलों के मामले में सरकारी खरीद प्रक्रिया काफी हद तक गेहूं तक सीमित है। सब्जियां, फल, दूध, मछली, पोल्ट्री और अन्य मांस उत्पाद इससे पूरी तरह बाहर हैं।

मोदी सरकार ने किसानों की समस्याओं को सुलझाने के लिए ऐसे अनेक कदम उठाए हैं जिनकी चर्चा अभी नहीं हो रही है।

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