आकार ले रहा एक आंदोलन

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गंगा और वाराणसी को एकदूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। गंगा वाराणसी में बहती है, और बनारस गंगा में सांस लेता है। लेकिन वाराणसी सिर्फ गंगा नहीं है, उसके नाम में दो महान नदियां शामिल है, वरुणा और असि। इन्हीं दोनों नदियों के नामों को जोड़कर वाराणसी बना है।

कुछ सौ साल पहले तक दुनिया का सबसे प्राचीन शहर इन्हीं दोनों नदियों के संगम पर बसे होने का दंभ भरता था। पुराणों और प्राचीन लेखों में इन नदियों को आवागमन और माल ढुलाई के प्रमुख केंद्र के रूप में माना गया है।

अपनी शिवत्रयी में अमीश ने असि को सेना की तैनाती का केंद्र बताया है। वक्त बीता और ये महान धाराएं विकास का शिकार हो गई। आज वरुणा एक नाले के रूप में शहर का सीवेज लेकर बहती है और असि की जमीन पर इतना विकास हुआ कि वह एक नाली बनकर रह गई।

आज जब पूरा देश गंगा की चिंता में डूबा हुआ है, बनारस के कुछ युवाओं ने असि को उसकी जमीन वापस दिलाने की मुहिम शुरू की। नदी कार्यकर्ता कपीन्द्र तिवारी के नेतृत्व में सैकड़ों लोग उस कीचड़ में उतर कर जलकुंभी हटाने लगे, जिसे पुराणों में असि नदी कहा गया है।

असि नदी मुक्ति अभियान पद यात्रा और मानव शृंखला जैसे प्रतीकात्मक कदमों से समाज और सरकार का ध्यान असि की ओर खींच रहा है। अब हर रविवार बड़ी संख्या में लोग असि में उतरकर गंदगी साफ करते हैं और अपने किए की माफी मांगते हैं।

गंगा में जहां असि का संगम होता है, उसी को असि घाट कहा जाता है। केंद्र और राज्य सरकार गंगा से जुड़ी हर योजना को प्रतीक रूप में यहीं से शुरू करते रहे हैं, सुबहबनारस जैसा संगीतमय कार्यक्रम भी इसी घाट पर होता है।

कुछ सौ साल पहले तक दुनिया का सबसे प्राचीन शहर इन्हीं दोनों नदियों के
संगम पर बसे होने का दंभ भरता था। वक्त बीता और ये महान धाराएं विकास का
शिकार हो गई। आज वरुणा एक नाले के रूप में शहर का सीवेज लेकर बहती
है और असि की जमीन पर इतना विकास हुआ कि वह एक नाली बनकर 

गंगा मंत्रालय ने असि के पुनरुद्धार कोनमामि गंगेकार्यक्रम में शामिल करने की घोषणा भी की थी, लेकिन वास्तविकता यह है किनमामि गंगेमें असि का कहीं कोई जिक्र नहीं है। माना जाता है कि असि का उद्गम प्रयाग इलाहाबाद स्थित दुर्वासा ऋषि का आश्रम था। हालांकि आज इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं।

जेम्स प्रिंसेप के मान्यता प्राप्त नक्शों में भी असि को नाला लिखा गया है। कपीन्द्र कहते हैं कि जेम्स ने जो किया वो तो समझ आता है, लेकिन आजाद भारत की किसी भी सरकार ने इस गलती को सुधारने की कोशिश नहीं की। नतीजतन आज असि कई जगह सिर्फ नाली बनकर रह गई है।

कपीन्द्र ने असि की जमीन पहचानने के लिए सरकारी विभाग से रकबा नंबर निकलवाया। कागजों में तो असि मिल गई, लेकिन वास्तविकता में उसकी जमीन पर सैकड़ों मकान बने हुए हैं। हालांकि पट्टे पर मिली जमीन के कागजों में साफ लिखा है कि इस जमीन का इस्तेमाल स्थायी निर्माण के लिए नहीं किया जा सकता।

बनारस के कंदवा तक तो असि के साफ प्रमाण मिलते हैं, कंदवा में बड़ा पोखर है जो असि का ही हिस्सा था। एक दो और पोखरों के बाद कंचनपुर ताल भी असि का भाग माना जाता है। यदि इन पोखरों की सफाई करके इन्हें आपस में लिंक कर दिया जाए तो असि को उसका अपना जल मिल सकता है।

ये साफ है कि असि को उसका हक दिलाने की लड़ाई लंबी है, लेकिन असि, सरस्वती की तरह विलीन हो जाए इससे पहले इस आंदोलन को अपने लक्ष्य तक पहुंचना होगा।

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