अर्पण का अवसर

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हां आनंद है वहीं उत्सव है। जहां कला है वहां मनुष्य की श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति है। वह अध्यात्म है। जहां अध्यात्म है वहां ऐश्वर्य है। जहां ऐश्वर्य है वहां ईश्वर है। जहां ईश्वर है वहां उसका रचा सुखी संसार है। 

यही उस दिन जाना जा सका। सैकड़ों व्यक्तियों ने अनुभव किया। उसके दृष्टा बने। अनुभव से ही दृष्टा की दृष्टि बनती है। जो अनुभूति में उतर जाती है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में 7 नवंबर की शाम कुछ ऐसी ही थी। 

अवसर भी खास था। केंद्र की कल्पना और उसकी रचना का श्रेय कपिला वात्सायन को है। वे अपनी उम्र के 91वें सोपान पर कदम रखने जा रही हैं। वह दिन 28 दिसंबर को आएगा। उनके जन्मदिन का जो सबसे बड़ा उपहार हो सकता है वह उन्हें 7 नवंबर को प्राप्त हुआ। 

गिनाने के लिए तो बहुत सारे सम्मान हैं। वे सम्मान उनकी पहचान भी बन गए हैं। भारत सरकारयूनेस्को और कला के अनेक बड़े सम्मान वे पा सकीं। उससे उन्हें आत्म संतुष्टि कितनी मिलीयह अनुमान का विषय है। कोई सही अनुमान नहीं लगा सकता।

कपिला वात्सायन भी उन सम्मानों की कोई चर्चा नहीं करतीं।लेकिन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में उनका आना और कुछ घंटे तृप्ति में गुजारना एक यादगार अवसर बन गया है। वह इतिहास का ऐसा क्षण है जो किसी भी स्वस्थ समाज के लिए प्रेरक बनेगा।

ऐसा कैसे हुआयह भी जानने लायक है। क्यों हुआयह बताने लायक है। ये दो सवाल ही समाधान दे सकते हैं। कई महीने पहले कपिला जी का फोन आया। वे खिन्न और एक हद तक उद्विग्न भी थीं। कारण कि उनकी व्यक्तिगत पुस्तकों का संग्रह जहां केंद्र में रखा गया थाउसे वहां से हटा दिया गया था। 

जिन्होंने मनु शर्मा की आत्म कथा पढ़ी है वे उसे ‘सत्यान्वेषण‘ समझते हैं। ठीक ही समझते हैं। लेकिन मनु शर्मा ने उसे नया नाम दिया-‘फेरीवाला रचनाकार

इस सूचना से उनका विचलित होना स्वाभाविक था। ऐसा हो नहीं सकता था कि वह मीडिया में न आए। नए न्यासी मंडल पर वैसे भी मीडिया की गहरी नजर शुरू से है। इस नए प्रकरण में दस जनपथ ने भी अपनी भूमिका निभाई। उसके हाथ लंबे जो हैं। 

अध्यक्ष के नाते शुरू में ही कपिला जी को भरोसा दिलाया कि आप चिंता न करें। सदस्य सचिव डासच्चिदानंद जोशी ने उनसे भेंट की। विद्वानों से प्राप्त अन्य पुस्तक संग्रहों के बारे में बनी योजना से परिचित कराया। फिर भी मीडिया में सवाल खड़े होते रहे। 

केंद्र ने पुस्तकालय और संदर्भ ग्रंथालय को अधिक समृद्ध बनाने के विचार से व्यक्तिगत पुस्तक संग्रहों को उससे जोड़ने का निर्णय किया। उसी क्रम में कपिला जी के पुस्तकों का एक अलग खंड बना है। यह शुरुआत है। उस खंड को कपिला जी की उपस्थिति में 7 नवंबर की शाम शुरू किया गया। वह एक संक्षिप्त परंपरागत आयोजन था। 

इसी अवसर पर कपिला जी को जाननेमानने वाले भी एकत्र हुए। विशिष्ट लोगों में डालोकेश चंद्रन्यासी निर्मला शर्मा और वासुदेव कामथ भी थे। पुस्तकालय के उसी तल पर सभा भी थी। कपिला जी का अभिनंदन हुआ। उनसे जब बोलने का आग्रह किया गया तो उन्होंने कहामुझे कुछ नहीं कहना है। 

मैंने सुझाया कि आप अपने संस्मरण सुनाएं। यह सुझाव उन्हें भा गया। वे अपनी पुरानी स्मृतियों में गहरे उतरीं। कैसे अंग्रेजी की शोध छात्रा की रुचि कला और संस्कृति में हुईयह तो बताया ही। अपने गुरू वासुदेव शरण अग्रवाल के संस्मरण भी सुनाए। 

जब वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के विचार और अवधारणा को बता रही थीं तब बोलीं कि राजीव गांधी ने उनसे कहा कि ‘पापू (पंडित जवाहरलाल नेहरूके लिए आपने नेहरू संग्रहालय बनवाया और अब मम्मी के लिए यह केंद्र बनाइए।‘ इसमें ही इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के परिसर के चयन का रहस्य भी है।

यह तीस साल पहले की बात है। 

आज यह भारतीय विद्याओं का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ केंद्र बन गया है। वह प्रक्रिया चल रही है। उसी कड़ी में व्यक्तिगत पुस्तक संग्रह के खंड को देखना चाहिए। कपिला जी से क्या सीखेंखुद को खोजने के लिए सूचना से कहीं ज्यादा प्रेरणा का सहारा लें। तभी व्यक्ति में अंतरनिहित सृजनात्मकता की शुरुआत होगी।  मकान खाली 

मनु शर्मा सबके साहित्यकार थे। रागद्वेष से परे। खेमेबंदी से दूर। शुद्ध साहित्यकार। वे अपनी आत्मकथा में जीवित रहेंगे। वैसे वे अब शरीर से नहीं रहे। उनसे जो भी मिलाकुछ सीखा। अपनी छाप छोड़ने में वे हमेशा सफल रहते थे। उनसे हर भेंट एक नया अध्याय जोड़ देती थी। 

प्रेमचंद्रआचार्य नरेंद्र देवभैया जी बनारसीनीरज की भांति मनु शर्मा का मूल नाम अज्ञात सा है। जो ज्ञात है वह सर्वविदित है। साहित्यिक है। सुपरिचित है। वही मनु शर्मा की पहचान है। उनका मूल नाम थाहनुमान प्रसाद शर्मा। जो जीवन वे जीएवह असाधारण था।

प्रेमचंद्रआचार्य नरेंद्र देवभैया जी बनारसीनीरज की भांति मनु शर्मा का मूल नाम अज्ञात सा है।
जो ज्ञात है वह सर्वविदित है।

संघर्षों में अपनी राह बनाई। एक मुकाम भी। कम साहित्याकार हुए हैं जिन्होंने अपनी आत्म कथा लिखी है। महात्मा गांधी ने अपनी आत्म कथा को ‘सत्य के साथ प्रयोग‘ कहा। जिन्होंने मनु शर्मा की आत्म कथा पढ़ी है वे उसे ‘सत्यान्वेषण‘ समझते हैं। ठीक ही समझते हैं। लेकिन मनु शर्मा ने उसे नया नाम दिया-‘फेरीवाला रचनाकार 

सिर्फ शीर्षक देखकर उसे पढ़ने की इसलिए उत्सुकता होती है क्योंकि तुरंत सवाल उभरता है कि क्या एक फेरीवाला भी इतना बड़ा साहित्यकार हो सकता हैमनु शर्मा ने इस असंभव को अपने जीवटपन और विद्यानुराग से संभव कर दिखाया। उनकी आत्म कथा अत्यंत विलक्षण है। 

उसमें उनके ‘बीते जीवन के खट्टेमीठेउजलेअंधेरेसाधारणअसाधारण‘ और रोचक प्रसंग हैं। ऐसे वे सबके साहित्यकार थे। रागद्वेष से परे। खेमेबंदी से दूर। शुद्ध साहित्यकार। वे अपनी आत्म कथा में हमेशा जीवित रहेंगे। 

वैसे वे शरीर से अब नहीं रहे। उनसे जो भी मिलाकुछ सीखा। हमेशा ही अपनी छाप छोड़ पाने में वे सफल रहते थे। हर भेंट एक नया अध्याय जोड़ देती थी। इसीलिए पिछले साल उन पर बनारस की एक साहित्यिक पत्रिका ‘सोचविचार‘ ने मनु शर्मा एकाग्र निकाला। 

उसमें धर्मशील चतुर्वेदी का एक लेख है। शीर्षक है– आधुनिक वेदव्यास मनु महाशय। इसमें उनके अड़ी का उल्लेख है। जिसे आत्म कथा के एक अध्याय में फेरीवाला रचनाकार बहुत ढंग से समझाता है। अध्याय हैबनारस अड़ी में मिली जिदंगी। 

इसमें तीन अडि़यों के माध्यम से मनु शर्मा अपने जीवन के बारे में बताते हैं कि बनारस की शास्त्रार्थ परंपरा को कैसे साहित्यिक अड्डेबाजी यानी अड़ी में उस समय रूपांतरित किया जा सका। ऐसी आधुनिक अड़ी के सूत्रधार मनु शर्मा रहे। उन्होंने लिखा है कि उनकी पहली अड़ी जब शुरू हुई तो वे मुश्किल से 10-11 साल के रहे होंगे। 

पहली अड़ी के वर्णन में स्वराज की लड़ाईकाशी की पत्रकारितादूसरा विश्व युद्धभारत छोड़ो आंदोलनआजादी और महात्मा गांधी की हत्या आदि प्रसंगों का संस्मणात्मक वर्णन है। इसमें वे घटनाओं के दृष्टा और निमित्त भी हैं।

सतासी साल की उम्र में भी उनकी याददाश्त पक्की थी। 

इसके सहारे उन्होंने दूसरी अड़ी का भी विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘पहली अड़ी ने मेरे अंदर समझ का बीज वपन किया। और दूसरी अड़ी ने उसे पौधे के रूप में बड़ा किया।‘ इसमें उनके साहित्यिक जीवन का जहां प्रारंभ है वहीं उस समय के बनारस के चर्चित साहित्यकारों का उल्लेख भी है। 

जो नाम छूट गए हैं वे कहीं टिकते नहीं होंगेइसीलिए छूटे हैं। जिनका उल्लेख हुआ है वे नाम हैं– संपूर्णानंदभैया जी बनारसीभानु शंकर मेहताकामता नाथ पांडे ‘चोच‘, बाबू गुलाब रायनजीर बनारसीशंभुनाथ सिंहविश्वनाथ मुखर्जीसीता राम चतुर्वेदीश्रीनारायण चतुर्वेदी आदि। जाहिर है कि वह अड़ी कितनी खास होती होगी। 

बनारस में एक ठलुआ क्लब बना था। उसका इतिहास इस अध्याय में है। हिंदी प्रचारक संस्थान परिसर में तीसरी अड़ी रही। इस तरह मनु शर्मा को तीन अडि़यों ने बनाया। लेकिन वे इसे दूसरे तरह से कहते हैं। ‘यों तो तीन कृष्णों ने मेरे निर्माण में अद्भुत भूमिका निभाई है। 

एक कृष्ण तो वे हैंजो हममें हैंआपमें हैंसृष्टि के कणकण में हैं। सर्वव्यापी हैंहम नहीं थेतब भी थेहम नहीं रहेंगेतब भी रहेंगे। वे सृष्टि के निर्माता हैंसृष्टि उनकी निर्मिति है। वे हमारे प्रणम्य हैं। मेरे जीवन के दूसरे कृष्ण मेरे गुरू श्रीकृष्णदेव प्रसाद गौड़ ‘बेढब बनारसी‘ हैंजिन्होंने ऐसी परिस्थिति उत्पन्न की कि मैं पढ़लिख सका। तीसरे कृष्ण श्रीकृष्णचंद्र बेरी हैंजिन्होंने मुझे पहलेपहल छापा। 

वे अपनी आत्म कथा के अंत में लिखते हैं– ‘मेरा जीवन मेरी किताबें हैं। अपने जीए एकएक पल का निचोड़ इसमें सजो दिया है। उम्र मेरे हाथ में नहीं। किसी ने ठीक ही कहा हैभौंचक्की  है आत्मासांसें हैं हैरान। हुक्म दिया है जिस्म नेखाली करो मकान।‘ सचमुच उनके जाने से वह मकान खाली हो गया। 

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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