अब मौन बोलेगा..

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नारों और दावों के बाजार में सन्नाटा पसरा हुआ है। कारण कि मौन मुखर हो रहा है। 85 साल के प्रोफेसर जीडी अग्रवाल यानी स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद सरस्वती ने भोजन त्याग दिया है।

जब आप यह कॉलम पढ़ रहे होंगे तब तक प्रोफेसर अग्रवाल को आमरण अनशन पर बैठे तकरीबन एक महीना पूरा हो रहा होगा, यदि वे जीवित रहे तो! गंगा मंत्रालय की कारगुजारियों से असंतुष्ट स्वामी जी मातृ सदन हरिद्वार में उपवास पर बैठे हैं।

मातृ सदन गंगा आंदोलन में संन्यासी विद्रोह का गढ़ माना जाता है। इसी आश्रम के संत निगमानंद ने 2012 में अवैध रेत खनन के विरोध में दाना-पानी त्याग कर आहुति दी थी।

प्रोफेसर अग्रवाल को करीब से जानने वालों को पता है कि उनका अनशन दिल्ली में अक्सर चलने वाले अनशनों के विपरीत दृढ़ संकल्प से भरा होता है।

“मातृ सदन गंगा आंदोलन में संन्यासी विद्रोह का गढ़ माना जाता है। इसी आश्रम के संत निगमानंद ने 2012 में अवैध रेत खनन के विरोध में दाना-पानी त्याग कर आहुति दी थी।”

जीडी अग्रवाल राष्ट्रीय नदी सरंक्षण निदेशालय के पूर्व सलाहकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रथम सचिव, चित्रकूट स्थित ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्यापन और पानी-पर्यावरण इंजीनियरिंग के नामी सलाहकार के रूप में विख्यात हैं। 2010 में अनशन कर उन्होने लोहारी- नागपाला पनबिजली परियोजना पर ताला लगवा दिया था। यह परियोजना गंगा के मुहाने पर ही बन रही थी। बहरहाल, इस बार प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने 24 फरवरी और 13 जून को दो चिट्टियां लिखीं।

ये चिट्टियां प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी गईं और मौटे तौर पर इन चिट्टियों का मजमून यह था कि वर्तमान और पूर्व गंगा संरक्षण मंत्री अपने काम में घोर असफल साबित हुए हैं, इसलिए प्रधानमंत्री गंगा की सफाई पर सीधे हस्तक्षेप करें ताकि अवैध खनन, अवैध निर्माण और बांधों पर रोक लग सके।

“2010 में जब लोहारी नागपाला को लेकर अग्रवाल ने अनशन किया था तब चिंतक गोविंदाचार्य ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे अब भी इस जिम्मेदारी को निभा सकते हैं। यूपीए की तुलना में आज की सरकार में उन्हें जानने-मानने वाले अधिक हैं।”

ऐसा न होने पर वे 22 जून से अनशन पर बैठ गए। ये तारीखें बड़ी महत्वपूर्ण हैं, 13 जून निगमानंद की पुण्यतिथि है और 22 जून गंगा अवतरण दिवस है। अपने अगंभीर प्रयासों के तहत उमा भारती ने पत्र लिखकर उनसे अनशन समाप्त करने की मांग की और नितिन गडकरी ने एक अधिकारी भेजकर खानापूर्ति कर दी।

गडकरी ने गंगा पर जारी कामों का हवाला भी दिया लेकिन उन मुद्दों पर कोई बात नहीं की जिन्हें अग्रवाल ने अपने पत्रों में उठाया था। अब प्रोफेसर अग्रवाल सहित गंगा आंदोलन से जुड़े सभी पक्षों की नजरें प्रधानमंत्री की ओर हैं।

यहां तक कि गंगा की जिम्मेदारी जिन मंत्रियों के कंधों पर है, वे भी प्रधानमंत्री की ओर ताक रहे हैं। मानो कह रहे हों कि अब आप ही कुछ कीजिए, हमने तो अपने झूठ से गंगा साफ करने की पूरी कोशिश की लेकिन यह हो न सका, हमने पूरी ताकत से चिल्ला चिल्ल कर आरती गाई लेकिन वह नहीं मानीं।

2010 में जब लोहारी नागपाला को लेकर अग्रवाल ने अनशन किया था तब चिंतक गोविंदाचार्य ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे अब भी इस जिम्मेदारी को निभा सकते हैं।

यूपीए की तुलना में आज की सरकार में उन्हें जानने-मानने वाले अधिक हैं। सरकार को उनकी बात सुननी चाहिए, सुननी होगी। क्योंकि यदि जीडी अग्रवाल को कुछ हो गया तो जवाब देते नहीं बनेगा।

गंगा सरंक्षण मंत्रालय जिद्दी है, उसकी जिद की ताकत सत्ता है तो प्रोफेसर जीडी अग्रवाल भी जिद्दी हैं, उनकी जिद की ताकत गंगा है। इस जिद में यदि अग्रवाल को कुछ हो गया तो सबसे बड़ा नुकसान गंगा और उसके भक्तों का होगा।

हमारे पास विकल्प सीमित हैं। मौन मुखर हो रहा है, उसे ध्यान से सुनिए, अन्यथा वो सोने नहीं देगा।

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