अब जंगल डराते नहीं,लुभाते हैं!

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भी चंद वर्षों पहले तक जो हाथ नक्सलियों की कंगारू कोर्ट में सरेआम तड़प कर मरने से बचने या अपने परिवारों की महिला सदस्यों से बलात्कार होते देख जां-बक्शी की भीख मांगने के लिए उठते थे,

वे हाथ आज सामूहिक रूप से पास्चराइजेशन प्लांट में अपना दूध बेचने या अपनी परम्परागत जैविक खेती के चावल को मुंबई और चेन्नई के पांचतारा होटलों में बड़ी-बड़ी कंपनियों के जरिये सहकारी समितियों के माध्यम से सप्लाई करने के लिए उठते हैं ‘टैग लाइन’ होती हैंटेस्ट द ट्रेडिशन।’

बात हो रही है समूचे छत्तीसगढ़ की, खासकर बस्तर, अबूझमाड़, जगदलपुर या दंतेवाड़ा की, जो आतंक की त्रासदी में दशकों तक जीने को मजबूर बने रहें पर अब नहीं।

यह अकेला राज्य है जिसमें अनाज का उत्पादन हीं नहीं, उत्पादकता भी बढ़ी है यानी लागत कम,अनाज ज्यादा। दंतेवाडा (के) कुआकोंडा ब्लॉक (के) माड़ेंदा गांव (की) रक्को और हड्मा।

संबंधसूचक ‘के’ या ‘की’अगर हटा दें तो ये संज्ञा शब्द परा-ब्रह्मांडीय लगेंगे। लेकिन आप समझ गए होंगे यह अपूर्ण वाक्य दशकों तक नक्सली आतंकवाद के शिकार रहे लोगों को लेकर है।

आज यह वाक्य पूरा हो गया है, जब रक्को और हड्मा हंस के कहती हैं कि बहरेपन का इलाज नहीं होने पर भी वे इशारों में बात कर लेती थीं पर अब सरकारी इलाज़ के बाद फायदा यह है कि दूसरे उनके बारे में क्या कह रहे हैं, यह भी सुन सकती हैं यानी आम लोगों की तरह संवाद कर सकती हैं।

“छत्तीसगढ़ में युवा आईएएस अधिकारियों में आज इस बात की होड़ लगी है कि कौन विकास के नए विचार अमल में लाता है, विकास के 31 पैरामीटरों पर कौन जिलाधिकारी इस माह किससे आगे या पीछे रह गया है?”

यही नहीं, ये जन्मना अंधी थीं लेकिन अब देख भी सकती हैं।     

आज से कुछ वर्ष पहले तक छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा या जगदलपुर जिले का नाम सुनते ही शरीर में झुरझुरी फैल जाती थी।

कहा जाता था अगर एक तरफ से कोई हिंसक जानवर हमला करे और दूसरी तरफ से नक्सली तो आदिवासी पहले की ओर भागता था यह सोच कर कि यह सिर्फ एक झटके में मारेगा। तड़पना नहीं होगा।

आज स्थानीय अखबारों में खबर देखने को मिलती है कि इस अप्रतिम रूप से प्राकृतिक सौन्दर्य समेटे हाथ से हाथ न दीखने वाले जंगल के अमुक गांव में एक दो नक्सलियों ने मोबाइल छीना।

दरअसल स्थानीय मीडिया भी नक्सली और औसत अपराधी को समानार्थी समझाने लगा है।

यह स्थिति चरम वामपंथ जो पिछले 60 सालों में ‘राज्य-पोषित शोषण को हथियार से खत्म करने’ के नाम पर देश के 12 राज्यों में लम्पटवादी आतंक का पर्याय बन गया था, अब पता चला कि सड़क-छाप गुंडई के रूप में अंतिम सांसें ले रहा है। शायद जल्दी ही डायनासोर की मानिंद अस्तित्व खोते हुए।  

सरकार ने अपनी कुछ प्रचार सामग्री (बुकलेट) छापी है जो बाहर से आने वाले किसी भी स्वतंत्र विश्लेषक को उपलब्ध होता है, लेकिन चूंकि यह सरकारी ज्ञान होता है।

“आज से कुछ वर्ष पहले तक छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा या जगदलपुर जिले का नाम सुनते ही शरीर में झुरझुरी फैल जाती थी।”

जिस पर 70 साल से सहज विश्वास करना मुश्किल होता है, किसी हाईवे के पास के गांव में जाएं, सड़क से ही ये आदिवासी महिलाएं एक हाथ और एक सर पर दो-दो खाना पकाने वाला गैस सिलिंडर लेकर पगडंडियों में उतरती मिलेंगी।

चेहरे पर ‘भौचक खुशी’। पूछिए तो टूटी-फूटी हिंदी में कहेंगीं सरकार ने दिया। जलाना आता है? इसका जवाब हंसकर होता है घर जाकर किसी से पूछेंगे। प्रचार सामग्री वाले बुकलेट के अंतिम पेज पर इसके जारी करने की तारीख और वर्ष भी होता है।

यह पुस्तिका नवम्बर, 2016 में जारी हुई थी। इसमें जिस युवा कलेक्टर का इक्का-दुक्का फोटो छापा है आज भी दो साल बाद वही कलेक्टर हमसे बात कर रहा है। यानी विकास की पहली शर्त सत्ता के शीर्ष पर बैठा राजनीतिक वर्ग अफसरशाही को ताश के पत्ते की तरह न फेटे।

दूसरा यह कि राज्य का मुखिया मजबूत और विकासपरक हो, और वह भी कार्यकाल के स्थायित्व के साथ।

इस राज्य में एक व्यक्ति और एक पार्टी का शासन पिछले 15 साल से जारी है। छत्तीसगढ़ में युवा आईएएस अधिकारियों में आज इस बात की होड़ लगी है कि कौन विकास के नए विचार अमल में लाता है, विकास के 31 पैरामीटरों पर कौन जिलाधिकारी इस माह किससे आगे या पीछे रह गया है?

मुख्यमंत्री रमन सिंह ने उन्हें कार्यकाल ही नहीं, काम करने की खुली छूट भी दे रखी है, लेकिन समीक्षा बेरहमी से होती है। गहराई से देखें तो एकल-आयामी विकास संभव ही नहीं है।

जिस दंतेवाड़ा में पांच साल पहले तक गैर- दंतेवाड़ा इलाके के लोग शादी नहीं करते थे इस डर से कि जिन्दा रहना इस इलाके में ईश्वर के नहीं ‘दलम’ (नक्सल टोली) की मर्जी पर है, वे आज यहां के मॉडल पर अपने जिलों में खेती करने लगे हैं।

इस राज्य में साक्षरता (78 प्रतिशत), राष्ट्रीय औसत (65.7) से ज्यादा, कुपोषण कम और संस्थागत डिलीवरी (80 फीसद) के कारण बाल -मृत्यु दर राष्ट्र के अन्य राज्यों को जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कुछ हद तक हरियाणा को मुंह चिढ़ाती है।

अक्सर सकल घरेलू उत्पाद भले ही बढ़ता रहे, असली विकास का पैमाना मानव विकास सूचकांक रसातल में बैठा रहता है। अगर सड़कें न हों तो राज्य कल्याणकारी योजनाओं में मिलने वाला लाभ नहीं पहुंचा सकता।

अगर बिजली न हो, पाठशाला न हो, और न ही रोजगार के साधन या आय के साधन हों तो सड़कों पर सिर्फ अफसर और मंत्री चलेंगे, मंचों से विकास की झूठी कहानी कहते हुए।

छत्तीसगढ़ में माथे पर मुफ्त का 35 किलो अनाज का गट्ठर लिए या बहंगी-नुमा बांस के दोनों ओर दो गैस सिलिंडर लादे किसी किशोर वय की लाखमे, सोमारी या कोसी को देख कर लगता है कि यह विकास यात्रा कुछ अलग है।

… और यह संभव शायद नहीं होता अगर युवा पुलिस अधिकारियों ने रणनीतिक परिवर्तन न किया होता। इस प्रश्न पर कि सड़कों पर इस बीहड़ जंगल में भी पुलिस नहीं दिखाई दे रही है और क्या कहीं यह आत्ममुग्धता तो नहीं है या फिर पुलिस का अभाव है, दंतेवाड़ा के युवा पुलिस अधीक्षक का कहना है,

‘नहीं, अब पुलिस आप को हीं नहीं, नक्सलियों को भी दिखाई नहीं देती, बस उन्हें गोली की आवाज सुनाई देती है और उनके समझने के पहले वे इसका शिकार हो चुके होते हैं।’

सुरक्षा सिद्धांतों में इस रणनीति को ‘अनओबर्ट्युसिव’ (अदृष्टिगोचर) सिक्योरिटी कहते हैं। पहले जहां जंगल के ऊंचे टीलों से ये जवानों को शिकार बनाते थे, आज पुलिस का उन ठिकानों पर कब्ज़ा है।

नक्सली या तो मौत के डर से मुख्यधारा में जुड़ने लगे हैं या फिर अन्दर जंगलों में तिल -तिलकर मर रहे हैं। अब आदिवासियों पर भी उनका खौफ जाता रहा है और सामूहिक रूप से उन्हें नकारने की क्षमता भी आ गयी है।

पुलिस अधीक्षक से यह मुलाकात अचानक ही थी लेकिन बड़े भरोसे से उसने कहा, ‘आप जहां हैं सिर्फ थोड़ी दूर घने जंगलों में नज़र डालें आपको पुलिस की अदृश्य लेकिन सतर्क मुश्तैदी का अहसास हो जाएगा।’ और यह सच था।

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