अन्ना हजारे का भ्रम

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न्ना हजारे दिल्ली आए। राजघाट गए। गांधी समाधि पर प्रार्थना की। वहीं वे बोले, जो तरहतरह से मीडिया में आया। उनके कहे को शायद ठीक से समझा नहीं गया।

यह भी हो सकता है कि मीडिया को प्रार्थना और सत्याग्रह का अंतर समझ में आया हो। कुछ जगह यह छपा कि अन्ना हजारे ने सत्याग्रह शुरू कर दिया। सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ जो है, वह अब उसी रूप में नहीं समझा जाता। उसका संबंध आंदोलन से जुड़ गया है। दिल्ली आकर गांधी समाधि पर प्रार्थना करना एक बात है और सत्याग्रह शुरू करना बिल्कुल दूसरी बात है।

अन्ना हजारे सत्याग्रह करेंगे या दुराग्रह? इसका फैसला होना है। सत्याग्रह करने की उनकी सदिच्छा हो सकती है। उसी से सत्याग्रह नहीं होता। ऐसा अगर होता तो उन्हें गांधी समाधि पहुंचने की जरूरत नहीं थी। जहां थे वहीं रहकर सत्याग्रह कर सकते हैं। उसका पालन कर सकते हैं।

अन्ना हजारे सत्याग्रह करेंगे या दुराग्रह? इसका फैसला होना है। सत्याग्रह
करने की उनकी सदिच्छा हो सकती है। उसी से सत्याग्रह नहीं होता।

दिल्ली पहुंचकर सत्याग्रह की घोषणा उन्होंने की या नहीं, यह सुनिश्चित नहीं है। इस पर संदेह है। क्योंकि कुछ दिनों बाद वे राजनंदगांव के डोगर गांव में पहुंचे। वहां अहिंसा शाकाहार शांति सम्मेलन में बोले। इसकी खबर कुछ अखबारों में एक एजेंसी के जरिए से छपी है। वहां वे जो बोले उससे उनकी इच्छा प्रकट होती है।

 

वे चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के विरोध में फिर आंदोलन छेड़ें। इसके लिए रणनीति बनाने का विचार कर रहे हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि वे रणनीतिकार पहले थे, आज हो सकते हैं। उनके बोल से इतना ही प्रकट हो रहा है कि वे अतीत को फिर से जीना चाहते हैं। वह अतीत जो लौटकर नहीं आता। वे वर्तमान का सही आंकलन करते तो अपनी इच्छा की दिशा दूसरी ओर कर लेते।

ऐसे बयान देकर अन्ना हजारे खबरों में रह सकते हैं। पर वे दिन गए, जब उन्हें सुर्खियां मिल जाती थी। वे नायक समझे गए। उन्हें भी भ्रष्टाचार के विरोध में उपजे आंदोलन के नायक होने का भ्रम है। वह लगता है कि बना हुआ है। एक व्यक्ति जो समाजसेवा के लिए जाना जाता है, वह कैसे भ्रमित हो सकता है, इसका सबसे बढ़िया उदाहरण अन्ना हजारे खुद हैं।

वे ऊंचा सुनते हैं। इसका फायदा वे लोग उठाते हैं जो उनके साथ रहते हैं। ऊंचा सुनने वाला जरूरी नहीं है कि ऊंचा और बड़ा सोच वाला हो। यह भी बड़ा भारी भ्रम है कि कोई व्यक्ति अपनी तुलना महात्मा गांधी से करने लगे। जैसा कि अन्ना हजारे अपने हावभाव से प्रकट कर रहे हैं।

महात्मा गांधी को वे समझ नहीं सके हैं। उनमें आस्था हो सकती है। पर इतना पर्याप्त नहीं है। महात्मा गांधी अचानक नींद से जग कर आंदोलन की घोषणा नहीं करते थे। उसकी दस साल तैयारी करते थे। उनके साथ जो जुड़ता था, वह आजीवन चलता था। अन्ना हजारे के साथ जुड़ने और टूटने में कोई देर नहीं होती।

वे इस समय विस्मरण के भी शिकार हो गए लगते हैं। ऐसा नहीं होता तो उन्हें थोड़ीसी कोशिश से ही याद जाता कि वे 2011 में इस्तेमाल किए गए। जिन लोगों ने इस्तेमाल किया, उनका मंतव्य स्पष्ट था। वे एक आंदोलन की लहर पर सवार होकर राजनीति करना चाहते थे। वह भी कुर्सी की राजनीति।

उस समय भ्रष्टाचार एक मुद्दा भी था। क्योंकि केंद्र की मनमोहन सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों तले दबी हुई थी। वह जनलोकपाल लाने से डरती थी। उसके खिलाफ पूरे देश में आक्रोश था। जिसे भुनाने के लिए जो जाल अरविंद केजरीवाल की मंडली ने बुना, उसमें अन्ना हजारे एक कठपुतली थे।

आज भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं है। परिस्थितियां बदल गई हैं। अन्ना हजारे अकेले हैं। उनके साथ कोई नहीं है। वे सत्याग्रह करना भी चाहें तो उनका
साथ देने के लिए लोग खड़े नहीं होंगे। अचानक
सत्याग्रह नहीं होता।

आंदोलन से भ्रष्टाचार को खत्म करने की राह नहीं निकली। जैसा पहले होता रहा है, वैसा उस आंदोलन से हुआ। एक पार्टी बनी। वह दिल्ली में सरकार बनाने में सफल हो गई। अन्ना हजारे को उस पार्टी ने कूड़ेदान में डाल दिया।
आज भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं है। परिस्थितियां बदल गई हैं। अन्ना हजारे अकेले हैं। उनके साथ कोई नहीं है। वे सत्याग्रह करना भी चाहें तो उनका साथ देने के लिए लोग खड़े नहीं होंगे। अचानक सत्याग्रह नहीं होता। उसके लिए नेतृत्व पर भरोसा चाहिए। वह अन्ना हजारे नहीं दे पाएंगे। आंदोलन तो बहुत दूर की बात है। हमेशा आंदोलन के लिए जनसमर्थन की जरूरत होती है। अन्ना हजारे वह जनसमर्थन कहां से जुटा लेंगे?

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