अनोखे अटल

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ग्वालियर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं का एक साथ कार्यक्रम था। मंच पर संघ प्रमुख गुरूजी यानी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर मौजूद थे। एक स्वयंसेवक को कोई रचना पढ़ने को कहा गया। उसने ओजस्वी स्वर में कविता पढ़ना शुरू किया।

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय।

मैं अखिल विश्व का गुरु महान, देता विद्या का अमरदान।

मैंने दिखलाया हिन्दू मार्ग, मैंने सिखलाया ब्रह्मज्ञान।

मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर।

मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर?

मेरा स्वर नभ में घहर -घहर, सागर के जल में छहर-छहर।

इस कोने से उस कोने तक, कर सकता जगती सौरभमय।

हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन।

यूं लगा मानो स्वयंसेवकों की भुजाएं फड़कने लगी हों। पूरे माहौल में देशभक्ति का उबाल-सा आने लगा। वह नौजवान स्वंयसेवक था अटल बिहारी वाजपेयी और जब 1947 में वाजपेयी को राजीव लोचन अग्निहोत्री के साथ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के साथ राष्ट्रधर्मपत्रिका के सम्पादन का काम सौंपा गया तो यह मासिक पत्रिका देखते-देखते ही चर्चा का विषय बन गई। राष्ट्रधर्मके पहले ही अंक में वाजपेयी की यह लंबी कविता हिंदू तन-मनछपी और बहुत चर्चित हुई। संघ प्रमुख रहे केएस सुदर्शन इस कविता को संघ के बहुत से कार्यक्रमों में दोहराते रहते थे।

“वाजपेयी की पहली सरकार 13 दिन चली, दूसरी बार 13 पार्टियों के साथ तेरह महीने चल पायी, इस बार तेरहवीं लोकसभा थी और सरकार के शपथ ग्रहण की तारीख तेरह अक्टूबर। आमतौर पर दुनिया भर में तेरह तारीख को अशुभ माना जाता है। दुनिया के कई मुल्कों में तो होटलों में तेरहवीं मंजिल और कमरा नं तेरह ही नहीं रखे जाते। भारत में भी तेरह को शुभ नहीं मानते, लेकिन इससे उलट लग रहा था कि वाजपेयी के लिए तेरह ही शुभ अंक हो गया है।”

साल 1950 में पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार और सरकार की लापरवाही और फिर नेहरू-लियाक़त पैक्ट के बाद  श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 8 अप्रैल 1950 को नेहरू सरकार से इस्तीफा दे दिया। वे उस वक्त उद्योग मंत्री थे। इस्तीफा देने के बाद डॉ मुखर्जी संघ प्रमुख गुरु गोलवलकर के पास गए और कहा कि आप संघ को राजनीतिक पार्टी बना दीजिए तो गुरु गोलवलकर ने कहा कि संघ तो अपने समाज सेवा के काम में खुश है। आप चाहते हैं तो अलग से राजनीतिक पार्टी बना लीजिए। इस पर डॉ. मुखर्जी ने कुछ लोग संघ से मांगे तो तब जिन बड़े प्रचारकों को गुरु गोलवलकर ने डॉ. मुखर्जी को सौंपा, उनमें नानाजी देशमुख और सुंदर सिंह भंडारी के साथ अटलजी भी थे। अटलजी संघ की विचारधारा छोड़े बिना निभाते रहे।

1940 से वाजपेयी का संघ शाखा से संबंध बना। तब वे हाईस्कूल में थे। नागपुर से ग्वालियर आए आजीवन प्रचारक नारायण राव तर्टे अटल बिहारी को संघ की शाखा में लाए। वे ग्वालियर की लक्ष्मीगंज शाखा में जाने लगे। तब वहां हिन्दी भाषी और मराठियों में मुकाबला रहता था। मराठी लोगों को कढ़ीखाऊ और उन्हें रांगड़े कहा जाता था। वाजेपेयी ने मराठी सीख ली।

“22 फरवरी 1965 को राज्यसभा में राजभाषा नीति पर बहस हो रही थी। उन दिनों वाजपेयी राज्यसभा के सदस्य थे। वाजपेयी ने हिंदी को लेकर बड़ी लंबी तकरीर की। वाजपेयी ने अपना भाषण बड़े आक्रामक अंदाज़ में शुरू करते हुए कहा,’सभापति जी मेरा दुर्भाग्य है, मेरी मातृभाषा हिन्दी है। अच्छा होता यदि मैं किसी अहिन्दी प्रान्त में पैदा हुआ होता, क्योंकि तब अगर हिन्दी के पक्ष में कुछ कहता तो मेरी बात का ज्यादा वज़न होता। ”

महाराष्ट्र में वीर सावरकर दर्शन प्रतिष्ठान के एक कार्यक्रम में वाजपेयी का भाषण यह समझने के लिए काफी हो सकता है कि उनके मन में हिन्दुत्व की विचारधारा बहती रही। वाजपेयी का अंदाज़े बयां देखना, समझना हो तो यह भाषण इसका बेहतर उदाहरण हो सकता है। सावरकर के लिए वाजपेयी कहते हैं:-

सावरकर माने तेज, सावरकर माने त्याग, सावरकर माने तप, सावरकर माने तत्व, सावरकर माने तर्क, सावरकर माने तारुण्य, तीर, तलवार, तिलमिलाहट, सागर प्राण तडमला, तिलमिलाती हुई आत्मा। तितीक्षा, तीखापन, तिखट। कैसा बहुरंगी व्यक्तित्व है सावरकर का। कविता और क्रान्ति।

मेरा सावरकर से पहला परिचय उनसे कवि के रूप में ही हुआ था, लेकिन कविता और भ्रान्ति तो मैंने सुना था, कविता और क्रान्ति?

वाजपेयी ने कहा कि अंडमान द्वीप की सेल्यूलर जेल की वह कोठरी मैंने देखी है। कोठरी के बाहर कोठरी में भी पहरा होता था। सावरकरजी को अपने जीवन का महत्वपूर्ण अंश तिल-तिल कर जलकर बिताना पड़ा, लेकिन उन्होंने कहा कि पराधीनता स्वीकार नहीं करूंगा। वाजपेयी ने सावरकर की कुछ कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी किया है। वाजपेयी सरकार के वक्त ही तमाम विरोध के बावजूद संसद के केन्द्रीय कक्ष में वीर सावरकर की तस्वीर लगी।

“शाइनिंग इंडिया के नारे और जरूरत से ज्यादा उम्मीदों की वज़ह से भाजपा ने 2004 में चुनावों को वक्त से पहले कराने का फैसला किया था। भारत उदय यात्रा के दौरान ही उस दौड़ते एयरकंडीशंड रथ में मैं भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का इंटरव्यू कर रहा था। सवाल था कि पूरे जीवन में आप किसे अपना इकलौता मित्र कहेंगे। बिना एक क्षण रुके आडवाणी ने कहा, ‘वाजपेयी जी!’ फिर रुक कर बोले,’वाजपेयी जी मेरे मित्र ही नहीं हैं, मेरे गाईड भी है, मेरे नेता भी हैं। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है और मुझे अब भी इस बात को कहने में कोई संकोच नहीं है कि मैं उन जैसा भाषण नहीं दे सकता। वाजपेयी जितना लोकप्रिय नेता कोई दूसरा नहीं है।”

बहुत से लोग वाजपेयी और संघ के रिश्ते को लेकर हमेशा ही सवाल उठाते रहे। कुछ लोग राइट मैन इन रॉंग पार्टीकहते रहे, लेकिन ये लोग शायद भूल जाते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बचपन से जुड़े वाजपेयी दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जनता पार्टी से अलग हो जाते हैं, जबकि उस वक्त ज्यादातर लोग मानते थे कि वाजपेयी जनता पार्टी का ही साथ देंगे। इसके बाद वाजपेयी फिर से जनसंघ को खड़ा करने की बजाय नई उदारवादी चेहरे वाली भारतीय जनता पार्टी बनाते हैं जिसके झंडे में भगवा के साथ हरा रंग भी शामिल है। वाजपेयी दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय और एकात्म मानववाद के रास्ते पर चलते हैं, वे गांधीवादी समाजवाद का रास्ता अख्तियार करते हैं।

वाजपेयी यूं तो हमेशा स्वयं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक कहते रहे और संघ की विचारधारा को मानते रहे, लेकिन उनके व्यवहार का खुलापन बार-बार सवाल खड़ा करता रहा। वाजपेयी ने संघ को अपना परिवार मानते हुए भी अपने दिलो दिमाग की खिड़कियों को ताजी हवा आने के लिए खोले रखा और बाहें पसार कर दूसरों के विचारों को भी अपनाने में कभी परहेज़ नहीं किया। वे राम मंदिर निर्माण चाहते रहे, लेकिन इसके लिए भाजपा के राजनीतिक रास्ते के इस्तेमाल के पक्षधर नहीं थे। बाबरी मस्जि़द को तोड़ने के खिलाफ रहे। वाजपेयी ने अपना राजनीतिक करियर ही डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ कश्मीर आंदोलन से किया, लेकिन धारा 370 को हटाने के लिए वे कश्मीर को और नहीं बांटना चाहते थे। हमेशा महिलाओं के हक़ों की बात करने वाले वाजपेयी समान आचार संहिता लागू करने के लिए उसे धर्म का विषय नहीं बनाना चाहते थे। वाजपेयी पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे जिन्होंने पूरे पांच साल देश की सबसे बड़ी गठबंधन सरकार चलाई थी और इसमें कभी अपना राजनीतिक एजेंडा थोपने की कोशिश नहीं की। इसकी एक बड़ी वजह थी वाजपेयी का नेतृत्व और खासतौर से सबको साथ लेकर चलने की उनकी राजनीतिक काबिलियत। एक जमाने तक राजनीतिक तौर पर अछूत माने जाने वाली पार्टी भाजपा की सबसे बड़ी गठबंधन सरकार, लेकिन यह सफ़र आसान नहीं था। राजनीतिक समुद्र में वाजपेयी ने अपनी नैया कैसे पार की, यह जानना और समझना रोचक तो हो सकता है, लेकिन उस सरकार को चलाना टेढ़ी खीर या यूं कहंे कि मेंढकों को तराजू में तौलने जैसा था।

“वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित करने का फैसला नरेन्द्र मोदी सरकार ने किया, लेकिन इससे पहले बरसों से वाजपेयी को यह सम्मान देने की मांग हो रही थी। कारगिल युद्ध में जीत के बाद भी वाजपेयी को भारत रत्न देने की मांग उठी। उस वक्त वाजपेयी खुद प्रधानमंत्री थे। इससे पहले 1955 में नेहरू और 1971 में इंदिरा गांधी ने अपनी सरकार में ही ख़ुद को भारत रत्न से सम्मानित कर लिया था, लेकिन वाजपेयी कभी इस तरह का फैसला करने वाले लोगों में से नहीं रहे।”

सरकार को चलाने में वाजपेयी का व्यवहार बहुत काम आया। उनके हर राजनीतिक दल से अच्छे रिश्ते रहे और मित्र भी बहुत रहे। वाजपेयी ने डॉ मनमोहन सिंह की तरह गठबंधन सरकार नहीं चलाई यानी वे सहयोगी दलों के दबाव में नहीं आए बल्कि उन्होंने क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को भी राष्ट्रीय विचारधारा में लाने की कोशिश की। वाजपेयी को गठबंधन चलाने में महारथ हासिल थी। वे नरसिंह राव की तरह कैबिनेट की बैठकों में भी बहुत कम बोलते थे और हर एक की बात सुनते थे।

साल 1996 की तेरह दिन की सरकार गिरने के बाद 1998 में वाजपेयी को फिर से सरकार बनाने का मौका देश ने दिया। वाजपेयी ने 28 मार्च 1998 को विश्वास मत हासिल कर लिया। इस बार हालात 1996 जैसे नहीं थे। वाजपेयी के पास बहुमत था, लेकिन 1998 की सरकार भी दिहाड़ी जैसी सरकार थी यानी हर दिन कोई नई मुसीबत, कोई नया राजनीतिक नाटक। कभी ममता बनर्जी, कभी जयललिता तो कभी  मायावती-हर दिन किसी न किसी का रुठने-मनाने का सिलसिला चलता रहता था। जसवंत सिंह, जार्ज फर्नांडिस और प्रमोद महाजन इसी एक्सरसाइज में लगे रहते थे। तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन भी सरकार को लेकर बहुत सहयोगी नहीं लगते थे।

1998 हिंदुस्तान की राजनीति का एक अहम साल माना जाएगा। एक तरफ वाजपेयी ने देश की कमान संभाली तो दूसरी तरफ सोनिया गांधी ने कांग्रेस की। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद 1991 से लेकर अब तक वे खुद को सिर्फ घर में ही समेटे हुए थीं और राजनीति में सक्रिय होने से बचती रही थीं। सोनिया गांधी के सामने कांग्रेस को फिर से खड़ा करने की चुनौती थी और इसके लिए जरूरी था वाजपेयी सरकार को गिराना। इस काम में कांग्रेस की मदद की जयललिता और उनके मित्र रहे सुब्रह्मण्यम स्वामी ने। स्वामी का मानना था कि एनडीए सरकार को गिराना जरूरी है और वैकल्पिक सरकार बनाई जाए जो बिना कांग्रेस के नहीं बन सकती थी। जयललिता और सोनिया गांधी के रिश्ते अच्छे नहीं थे। इसे सुधारने के लिए स्वामी ने एक चाय पार्टी का आयोजन किया जिसमें सोनिया गांधी और जयललिता के अलावा मायावती को भी बुलाया। इस चाय के प्याले ने राजनीति में तूफान ला दिया।

इससे पहले 1996 मे लोकसभा में विश्वास मत में हार के बाद से ही भाजपा में तेज़ी से विचार मंथन शुरू हो गया था कि उसकी साम्प्रदायिक छवि को कैसे खत्म किया जाए ताकि वह एक राजनीतिक तौर पर अछूत पार्टी न रहे। भाजपा और संघ परिवार में भी यह साफ हो गया था कि दूसरे राजनीतिक दलों को जोड़े बिना सिर्फ अपने दम पर सरकार बनाना और चलाना फिलहाल मुमकिन नहीं है। इसके लिए जरूरी है कि वह चुनाव पूर्व ही ज्यादा से ज्यादा दलों के साथ गठबंधन बनाने की कोशिश करे और साथ ही चुनावों के लिए एक ऐसा एजेंडा तैयार करे जिसमें ज्यादातर दलों की सहमति हो सके। 1997 के दिसम्बर में भाजपा की भुवनेश्वर में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अपने अध्यक्षीय भाषण में लालकृष्ण आडवाणी ने कहा, ‘आज जब हमारी विरोधी पार्टियों का नेतृत्व बौने लोग कर रहे हैं और वे प्रधानमंत्री पद के लिए अपना कोई उम्मीदवार प्रस्तुत करने की स्थिति में नहीं हैं तब भारत की जनता द्वारा अटलजी के नेतृत्व की स्वीकृति पूर्व-निर्धारित निष्कर्ष है।

मार्च 1998 मेंभाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन गई तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पिछले राजनीतिक अनुभवों से सबक लेकर गठबंधन को मज़बूत बनाने की तैयारी कर ली थी, अपने राजनीतिक जीवन के 40 बरस पूरे होने के बाद इस मौके को वे ऐतिहासिक बनाने में लगे हुए थे। वाजपेयी समझ रहे थे कि सरकार और देश दोनों के लिए एक बड़े फैसले की जरूरत है ताकि छोटी-मोटी परेशानियों और शिकायतों पर लोगों का ध्यान नहीं जाए। वाजपेयी 1996 में नरसिंह राव से मिले एक हैंडओवरको पूरा करना चाहते थे। वाजपेयी ने 1996 में जब 13 दिन की सरकार बनाई, तभी नरसिंह राव ने देश के परमाणु कार्यक्रम की न केवल जानकारी दी थी और बताया था कि वे क्यों इसे पूरा नहीं कर पाए बल्कि एपीजे अब्दुल कलाम को भी वाजपेयी के पास भेजा था। 1998 के चुनाव के बाद वाजपेयी ने सबसे पहले कलाम को याद किया। पहले अपनी सरकार में मंत्री बनाने के लिए और उससे इनकार करने पर परमाणु परीक्षण के लिए। वाजपेयी दुनिया भर की ताकतों से मुकाबला करने का मन बना चुके थे। उन्होंने कलाम को हरी झंडी दे दी।

फरवरी,1999। अटारी, भारत पाक सीमा का आखिरी छोर-वाघा बार्डर। जैसे ही वाघा बार्डर पर गेट खुले, टीवी चैनलों पर खबर दौड़ पड़ी। वाजपेयी और नवाज शरीफ ने दोस्ती के दरवाजे खोल कर इतिहास बना दिया। वाजपेयी दोनों मुल्कों में अमन और दोस्ती के लिए बस लेकर पहुंच गए थे। ऐतिहासिक लाहौर यात्रा। उनके सम्मान में लाहौर के ऐतिहासिक किले में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ कविता पढ़ते हैं –

भारत-पाकिस्तान पड़ोसी, साथ-साथ रहना है,

प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है,

तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना महंगा सौदा।

रूसी बम हो या अमेरिकी, ख़ून एक बहना है।

जो हम पर गुजरी, बच्चों के संग न होने देंगे।

जंग न होने देंगें।

यह कविता थी भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की। लाहौर के किले में वाजपेयी के सम्मान-भोज में वाजपेयी की कविता उस वक्त पढ़ी जब वे दोनों मुल्कों में अमन और दोस्त के पैगाम के साथ बस लेकर लाहौर पहुंचे थे। लाहौर के उस ऐतिहासिक किले के शानदार समारोह और राजकीय-भोज में प्रधानमंत्री वाजपेयी ने कहा कि भारत की खोज के लिए अमेरिका की तरह कोलम्बस की जरूरत नहीं है। वाजपेयी बोले, ‘मुझे इस बात की खुशी थी कि मैं इक्कीस साल के बाद फिर से अमन और दोस्ती का पैगाम लेकर आपके बीच आ रहा हूं, लेकिन अफसोस इसलिए था कि हमने इतना वक्त रंजिश और कडुवाहट में बिता दिया।

लेकिन जब इसके बाद कारगिल युद्ध हो जाता है तो भारत वाजपेयी के नेतृत्व में ही पाकिस्तान को करारा जवाब भी देता है। वाजपेयी ही नेता के तौर पर ऐसा फैसला करने की हिम्मत दिखा सकते हैं कि कारगिल के लिए जिम्मेदार जनरल परवेज़ मुशर्रफ को आगरा में बातचीत के लिए बुलाते हैं। जब आगरा में बातचीत फेल हो जाती है तो रात 11 बजे मुशर्रफ वाजपेयी से मुलाकात करते हैं। मुशर्रफ कहते हैं कि इससे हम दोनों को ही अपमान झेलना पड़ा है। लगता है कि हम दोनों से ऊपर कोई इस बातचीत को अपने तरीके से चलाने की कोशिश कर रहा है। वाजपेयी चुप रहे। मुशर्रफ ने वाजपेयी का शुक्रिया किया और तेजी से कमरे से निकल गये। मुशर्रफ ने लिखा, ‘देयर इज ए मैन, देयर इज ए मोमेंट, व्हेन मैन एंड मोमेंट मीट हिस्ट्री इज मेड। (एक शख्स होता है और एक वक्त होता है। जहां वो शख्स और वक्त आकर मिले, वहीं इतिहास बनता है।)

उनकी मुस्कराहट, उनकी दोस्ती उन्हें कमजोर नहीं बनाती थी, उनके इरादे, उनके नाम की तरह अटल थे, उन्हें झुकाया जाना नामुमकिन था। वाजपेयी ही ऐसा कर सकते हैं कि वे दुनिया की परवाह किए बिना देश को ताकतवर बनाने के लिए प्रधानमंत्री बनने के कुछ हफ्तों में परमाणु परीक्षण करने की हिम्मत दिखाते हैं। दुनिया भर की तमाम पाबंदियों की चिंता नहीं करके उनका डटकर सामना करते हैं और पाबंदियों के बाद भी कहते हैं कि भारत-अमेरिका नेचुरल सहयोगी हैं, जो लोग इसे मजाक समझते हैं, उन्हें पता चलता है कि उसी अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंंटन कुछ वक्त बाद भारत पहुंच जाते हैं वाजपेयी से मिलने। परमाणु परीक्षण के बाद भी वाजपेयी ही लाहौर के लिए बस लेकर जा सकते हैं, दोस्ती का हाथ बढ़ा सकते हैं ।

बारहवीं लोकसभा में जहां एनडीए 13 पार्टियों का गठबंधन था, तो 1999 में उसके साथ करीब दोगुने यानी चौबीस सहयोगी थे। इन चुनावों में सुरक्षा, स्थायित्व और विकास को मुद्दा बनाया गया। पिछली सरकार में परमाणु परीक्षण और कारगिल जंग जीत कर वाजपेयी सरकार ने लोगों का भरोसा बढ़ा दिया था और विश्वास मत में सरकार जिस तरह से एक वोट से हार गई थी और मध्यावधि चुनाव कराने पड़े थे तो भाजपा ने स्थायित्व को बड़ा मुद्दा बनाया, साथ ही कहा कि अगर उसे पांच साल मिलते तो वह देश को विकास के रास्ते पर ले जाती। वाजपेयी की पहली सरकार 13 दिन चली, दूसरी बार 13 पार्टियों के साथ तेरह महीने चल पायी, इस बार तेरहवीं लोकसभा थी और सरकार के शपथ ग्रहण की तारीख तेरह अक्टूबर। आमतौर पर दुनिया भर में तेरह तारीख को अशुभ माना जाता है। दुनिया के कई मुल्कों में तो होटलों में तेरहवीं मंजिल और कमरा नं तेरह ही नहीं रखे जाते। भारत में भी तेरह को शुभ नहीं मानते, लेकिन इससे उलट लग रहा था कि वाजपेयी के लिए तेरह ही शुभ अंक हो गया है।

तेरहवीं लोकसभा में एनडीए को कुल 306 सीटें मिलीं, हालांकि भाजपा के खाते में कोई ज्यादा इजाफा नहीं हुआ। उसे 182 सीटें ही मिल पायीं। लेकिन कांग्रेस का खासा नुकसान हुआ। उसे सिर्फ 114 सीटें ही मिलीं जबकि पिछली बार उसके 140 सांसद थे यानी इस बार 26 कम।

तेरह अक्टूबर की सर्दियों की सुगबुगाहट वाली सुबह में राजनीतिक तौर से गर्म माहौल में वाजपेयी और उनकी सरकार ने तीसरी बार शपथ ली। राष्ट्रपति भवन का दालान देश भर के राजनेताओं, मुख्यमंत्रियों और कार्यकर्ताओं से अटा पड़ा था। जंग के मैदान में जीत के बाद चुनावी जीत के इस जश्न का गवाह पूरा देश बन रहा था। वाजपेयी सरकार में ही तीन छोटे राज्य उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड बिना किसी विवाद के बन जाते हैं। अपनी ही पार्टी के विरोध के बावजूद वे उदारीकरण की नीति को आगे बढ़ाते हैं। नया विनिवेश मंत्रालय खोलते हैं। संचार क्रांति लेकर आते हैं। विकास के लिए सबसे जरूरी सड़कों का निर्माण तेज रफ्तार से करते हैं।

कश्मीर पर उनकी नीति ही बड़ी वजह रही होगी कि राज्य की दो धुर-विरोधी पार्टियों के नेता फारुख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती एक साथ नजर आते हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 15 अगस्त पर लाल किले की प्राचीर से कहते हैं कि सरकार कश्मीर मसले पर वाजपेयी जी के रास्ते पर चलेगी यानी इंसानियत,जम्हूरियत और कश्मीरियत। शाइनिंग इंडिया के नारे और जरूरत से ज्यादा उम्मीदों की वजह से भाजपा ने 2004 में चुनावों को वक्त से पहले कराने का फैसला किया था।

 

भारत उदय यात्रा के दौरान ही उस दौड़ते एयरकंडीशंड रथ में मैं भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का इंटरव्यू कर रहा था। सवाल था कि पूरे जीवन में आप किसे अपना इकलौता मित्र कहेंगे। बिना एक क्षण रुके आडवाणी ने कहा, ‘वाजपेयी जी!फिर रुक कर बोले,’वाजपेयी जी मेरे मित्र ही नहीं हैं, मेरे गाईड भी हैं, मेरे नेता भी हैं। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है और मुझे अब भी इस बात को कहने में कोई संकोच नहीं है कि मैं उन जैसा भाषण नहीं दे सकता। वाजपेयी जितना लोकप्रिय नेता कोई दूसरा नहीं है।मैंने सवाल किया, इतने लंबे वक्त तक ये दोस्ती चलने का राज और क्या कभी कोई मतभेद नहीं हुए? आडवाणी ने कहा,’एक दूसरे के प्रति सम्मान और विश्वास।

वाजपेयी जी ने मुझ पर हमेशा भरोसा किया है और मुझे लगता है कि यह हमारा सौभाग्य है कि हमें वाजपेयी जैसा व्यक्तित्व, नेतृत्व के तौर पर मिला लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम दोनों के बीच कभी किसी मुद्दे पर मतभेद नहीं हुए हों। मतभेद रहे, लेकिन मनभेद नहीं हुआ कभी और वाजपेयी हमेशा दूसरों के मन की बात को और पार्टी के फैसले को सर्वोपरि रखते रहे।संसद के शुरुआती दिनों में सदन के भीतर अंग्रेजी का बोलबाला था। ज्यादातर बहस सिर्फ अंग्रेजी में हुआ करती थी और खासतौर से विदेशी मामलों पर बहस, जो कि वाजपेयी का प्रिय विषय था।

देश में ही नहीं, विदेश में भी वाजपेयी ने हिंदी का परचम फहराया। 1977 में जब मोरारजी देसाई सरकार में विदेश मंत्री बने तो पहली बार किसी भारतीय नेता ने संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी में भाषण दिया और वे अन्य अवसरों पर भी विदेशों में अक्सर हिन्दी में भाषण देते रहे। विदेश मंत्री के तौर पर संयुक्त राष्ट्र सभा के बत्तीसवें अधिवेशन में हिंदी में भाषण देने वाले वो पहले मंत्री थे। न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्रसभा में उनका पहला भाषण 4 अक्टूबर 1977 को हुआ।

हास्य और व्यंग्य भी उनकी भाषा में उतना ही घुला-मिला था। साल 1957 में संसद में उनका पहला भाषण था। धोती, कुर्ता और सदरी पहने वाजपेयी जब भाषण देने के लिए उठे तो विरोध शुरू हो गया। वो दौर हिंदी विरोधी आंदोलनों का था। लोग उन्हें हिन्दी में नहीं सुनना चाहते थे। उनका भाषण हिन्दी में शुरू होने पर कई सांसद विरोध में बाहर चले गए, लेकिन वे भाषण देते रहे। उन्होंने हिन्दी के अलावा अंग्रेज़ी में न बोलने का संकल्प भी लिया था। फिर वैसे दिन भी आए जब उनका भाषण संसद में हो या आमसभा में उन्हें सुनने के लिए लोग इंतज़ार करते रहते थे।

20 अगस्त 1958, को प्रधानमंत्री नेहरू ने एक बहस का पूरा जवाब अंग्रेजी में दिया और इसके बाद अध्यक्ष से हिन्दी में कुछ कहने की इजाज़त मांगी और नेहरू ने वाजपेयी का नाम लेकर भाषण शुरू किया,’कल जो बहुत से भाषण हुए, उनमें से एक भाषण श्री वाजपेयी जी का भी हुआ। अपने भाषण में उन्होंने एक बात कही थी और मेरे ख्याल में जो हमारी वैदेशिक नीति है, वह उनकी राय में सही है। एक बात उन्होंने और भी कही कि बोलने के लिए वाणी चाहिए, लेकिन चुप रहने के लिए वाणी और विवेक दोनों चाहिए। इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं।

22 फरवरी 1965 को राज्यसभा में राजभाषा नीति पर बहस हो रही थी। उन दिनों वाजपेयी राज्यसभा के सदस्य थे। वाजपेयी ने हिंदी को लेकर बड़ी लंबी तकरीर की। वाजपेयी ने अपना भाषण बड़े आक्रामक अंदाज में शुरू करते हुए कहा,’सभापति जी मेरा दुर्भाग्य है, मेरी मातृभाषा हिन्दी है। अच्छा होता यदि मैं किसी अहिन्दी प्रान्त में पैदा हुआ होता, क्योंकि तब अगर हिन्दी के पक्ष में कुछ कहता तो मेरी बात का ज्यादा वजन होता। हिन्दी को अपनाने का फैसला केवल हिन्दी वालों ने ही नहीं किया। हिन्दी की आवाज़ पहले अहिन्दी प्रान्तों से उठी। स्वामी दयानन्द जी, महात्मा गांधी या बंगाल के नेता हिन्दी भाषी नहीं थे।

प्रधानमंत्री बनने से पहले जनता पार्टी की सरकार में भी 1977-79 के बीच विदेश मंत्री के तौर पर वाजपेयी ने भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधारने की काफी कोशिश की। वाजपेयी के ही जमाने में भारत के अमेरिका से रिश्ते मज़बूत हुए और चीन से रिश्तों में सुधार आया। नेहरू के बाद 21 साल में चीन पहुंचने वाले वाजपेयी पहले नेता रहे थे।

नेहरू जैसे दिग्गज प्रधानमंत्री नौजवान अटल बिहारी को भारत के भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देखते हैं। सबसे ताकतवर माने जाने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जब स्वर्ण मंदिर में आपरेशन ब्लू स्टार का फैसला करना होता है तो बनारस में बैठे वाजपेयी के लिए अलग से टेलीफोन लाइन लगवा कर बात करती हैं और राय लेती हैं, लेकिन वाजपेयी ही साफतौर पर कह सकते हैं कि स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने का फ़ैसला खतरनाक होगा और बाद में उसका नतीजा मुल्क को झेलना भी पड़ा। वाजपेयी जैसे नेता की विश्वसनीयता और भरोसा इस काबिल हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरसिंह राव संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के मसले पर बातचीत के लिए विपक्षी नेता वाजपेयी की अगुवाई में प्रतिनिधि मंडल भेजते हैं।

कवि अटलजी अक्सर कहा करते थे कि उनकी जेल यात्राओं ने कविता को जिन्दा रखा। वहां जेल में उन्हें सोचने, बैठने, चिंतन- मनन करने का वक्त मिलता रहा और उस वक्त का उन्होंने अच्छा इस्तेमाल भी किया। जेल के हालात को सिर्फ तकलीफ के तौर पर ही नहीं देखा, उसमें भी चुटकी लिए बिना नहीं रहे –

धरे गये बंगलौर में अडवाणी के संग

दिनभर थाने में रहे, हो गई हुलिया तंग

हो गई हुलिया तंग श्याम बाबू भन्नाए

प्रात: पकड़े गए न अब तक जेल पठाए?

कह कैदी कविराय, पुराने मंत्री ठहरे,

हम तट पर ही रहे, मिश्र जी उतरे गहरे।

अपने हर जन्मदिन पर अटलजी कविता लिख कर जीवन दर्शन को समझने और समझाने की कोशिश करते रहे, इसलिए हर साल उसका रूप, उसका मनोभाव और उसका दर्शन बदलता रहा। 25 दिसम्बर 1993 को जिं़ंदगी में एक और मोड़ आया, जब वे सत्तर के करीब पहुंचने वाले थे तो उन्होंने लिखा मोड़ पर‘-

मुझे दूर का दिखाई देता है,

मैं दीवार पर लिखा पढ़ सकता हूं,

मगर हाथ की रेखाएं नहीं पढ़ पाता।

सीमा के पार भड़कते शोले,

मुझे दिखाई देते हैं।

पर पांवों के ईद-गिर्द फैली गर्म राख

नजर नहीं आती

क्या मैं बूढ़ा हो चला हूं।

मैं भीड़ को चुप करा देता हूं

मगर अपने को जवाब नहीं दे पाता,

मेरा मन मुझे अपनी ही अदालत में खड़ा कर,

जब जिरह करता है,

मेरा हलफनामा मेरे ही खिलाफ पेश करता है

तो मैं मुकदमा हार जाता हूं ,

अपनी ही नजर में गुनहगार बन जाता हूं

जिंदगी की डोर बढ़ रही है,

लेकिन गांठ बढ़ रही है

वाजपेयी ने मुझसे उस इंटरव्यू में कहा था, ‘कुछ मित्र कहते हैं यदि मैं राजनीति में न आता तो चोटी का कवि होता। चोटी-एड़ी की बात मैं नहीं जानता, लेकिन इतना जरूर है कि राजनीति ने मेरी काव्य रसधारा का रास्ता रोका है।उन्होंने कहा कि कविता और राजनीति साथ-साथ नहीं चल सकते। कविता की एकान्त साधना के लिए समय और वातावरण राजनीति में कहां मिल पाता है? अपने अंदर के कवि के प्रति ईमानदार रहने के लिए मुझे काफी कीमत चुकानी पड़ी है।

(वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी हार नहीं मानूंगापुस्तक के लेखक हैं।)

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