अनुच्छेद 35 ए को लेकर ग़ुस्सा क्यों

बीते माह 28 जुलाई को महबूबा मुफ्ती ने चेतावनी दी कि यदि संविधान से अनुच्छेद 35ए को हटाने की कोशिश की गई तो कश्मीर घाटी में तिरंगे को थामने वाला कोई नहीं बचेगा।

साथ ही उन्होंने कहा कि घाटी के लोगों को जो विशेषाधिकार मिले हैं, उससे छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। महबूबा मुफ्ती ने साफ किया कि घाटी में उनकी अपनी पार्टी पीडीपी और अन्य राजनैतिक दल तमाम खतरों के बीच भी अपने हाथों में तिरंगा थामे रखती हैं, लेकिन यदि विशेषाधिकारों से छेड़छाड़ की गई तो तिरंगे को कंधा देने वाला कोई नहीं मिलेगा।

महबूबा मुफ्ती तिरंगे थामने वाला कोई नहीं रहेगा, कहते हुए पूरे राज्य जम्मू कश्मीर का नाम बार-बार ले रहीं थीं। लेकिन यकीनन उनका इशारा घाटी की तरफ ही रहा होगा, क्योंकि वे जानती ही होंगी कि जम्मू संभाग में तो लोगों ने तिरंगे थामने को लेकर ही शेख अब्दुल्ला की पुलिस की गोलियां खाई थीं और प्रजा परिषद के उस आन्दोलन में नौ लोग शहीद भी हो गए थे।

इसी प्रकार लद्दाख संभाग की बात भी वे नहीं कर रही होंगी, क्योंकि लद्दाख में कुछ साल पहले तक लोगों ने तिरंगा उठा कर कहा था कि लद्दाखियों को घाटी वालों के विशेषाधिकार नहीं चाहिए, उन्हें केन्द्र शासित राज्य बना देना चाहिए।

महबूबा मुफ्ती विशेषाधिकारों के मामले में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35 ए का जिक्र कर रही थीं। महबूबा का कहना था कि कश्मीर घाटी के मुसलमानों ने 1947 में यहां रहने का फैसला किया था, जिसके एवज में उन्हें विशेषाधिकार मिले हुए हैं। वे किसी भी हालत में बने रहने चाहिए।

महबूबा मुफ्ती का यह तर्क अरब के बद्दू शायद समझ सकते हों, यहां के लोगों को यह उलटा तर्क समझ में नहीं आएगा। इस तर्क का अर्थ तो यह है कि मुसलमान भारत में रह रहे हैं, इसी से गदगद होकर भारतीयों को चाहिए कि वे उन्हें विशेषाधिकार दें।

जम्मू और कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती आजकल ग़ुस्से में हैं।
यह गुस्सा अनुच्छेद 35ए को लेकर है। यदि जम्मू-कश्मीर सरकार को अपनी संवैधानिक स्थिति
पर इतना ही भरोसा है तो उसे इतना घबराने की जरूरत नहीं है।

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने एक बार कहा था कि भारत के मुसलमानों में से 95 प्रतिशत मुसलमान हिन्दुओं की औलाद हैं। शेष पांच प्रतिशत मुसलमान वे हैं, जिनके पूर्वज हिन्दुस्तान को जीतने के लिए इस देश में आए थे और धीरे-धीरे यहीं घुलमिल गए।

कश्मीर घाटी में ये पांच प्रतिशत कौन हैं? इसकी शिनाख्त तो महबूबा मुफ्ती भी आसानी से कर सकती हैं। यकीनन उन्होंने की भी होगी और जब वे कहती हैं कि घाटी में तिरंगा थामने वाला कोई नहीं मिलेगा तो वे उन्हीं पांच प्रतिशत मुसलमानों की बात कर रही होंगी।

अब उन विशेषाधिकारों की बात जिनको लेकर महबूबा मुफ्ती ग़ुस्से में हैं। उनका कहना है कि संघीय संविधान का अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35 ए महबूबा मुफ्ती को विशेषाधिकार देता है। अनुच्छेद 370 के बारे में तो सभी जानते हैं और उसको लेकर उसके जन्मजात से लेकर अब तक हंगामा भी होता रहता है। लेकिन यह अनुच्छेद 35 ए भारतीय संविधान में कब और कैसे घुसा? इसकी पड़ताल करना लाजिमी है।

28 जनवरी, 1950 में जो संघीय संविधान लागू हुआ, जिसकी छपी प्रतियों में इस अनुच्छेद का कहीं जिक्र नहीं है। बाबा साहब अंबेडकर ने जो संविधान बनाया था, उसमें इसका कहीं जिक्र नहीं है। संविधान सभा की बहसों में इस अनुच्छेद का कहीं जिक्र नहीं है। 1950 से लेकर 2017 तक संघीय संविधान में जितने संशोधन हुए हैं, उनमें इस अनुच्छेद का कहीं जिक्र नहीं है। फिर यह अनुच्छेद भारतीय संविधान में कब और किस रास्ते से घुसा?

महबूबा मुफ्ती का कहना है कि यह अनुच्छेद जम्मू सरकार ने ख़ुद बनाया है। लेकिन यदि यह जम्मू-कश्मीर सरकार ने ख़ुद बनाया है तो यह भारत के संघीय संविधान में कैसे घुस गया? जम्मू कश्मीर को खास राज्य मानने वालों का कहना है कि इसे भारतीय संविधान में भारत के राष्ट्रपति ने 1954 में घुसाया। राष्ट्रपति ने 15 मई, 1954 को एक अधिसूचना द्वारा इस नए अनुच्छेद को भारतीय संविधान का हिस्सा बनाया और कहा कि यह जम्मू-कश्मीर पर लागू होगा।

लेकिन क्या भारत के राष्ट्रपति के पास संघीय संविधान में नए अनुच्छेद जोड़ने का अधिकार है? जम्मू-कश्मीर को आम न मान कर खास मानने वालों का कहना है कि अनुच्छेद 370 उनको यह अधिकार देता है। इसी अधिकार से जम्मू-कश्मीर सरकार भारतीय संविधान के किसी भी अनुच्छेद को संशोधित करके उसे राज्य में लागू कर सकती है।

संशोधन को खींचते-खींचते जम्मू-कश्मीर सरकार यहां तक ले गई कि उसने मान लिया कि यदि चाहे तो भारतीय संविधान में कोई नया अनुच्छेद भी जोड़ सकती है। उसने अपनी इसी समझ से 35 ए नया अनुच्छेद जोड़ दिया। लेकिन राष्ट्रपति का इसके बारे में क्या कहना है?

जब संघीय संविधान लागू हुआ था तभी भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने, जो स्वयं भी जाने-माने कानूनदां थे और संविधान सभा के अध्यक्ष भी रहे थे, नेहरू को एक लंबी चिट्ठी लिखते हुए अगाह किया था कि मुझे नहीं लगता कि अनुच्छेद 370 कार्यपालिका को यह अधिकार दिया है कि वह केवल सरकारी अधिसूचना से ही भारतीय संविधान में नए अनुच्छेद डाल सके।

लेकिन उन दिनों पंडित नेहरू नए-नए प्रधानमंत्री बने थे और कश्मीर को खास मानने वालों की कतार में सबसे आगे की सफों में बैठते थे, इसलिए उन्होंने राष्ट्रपति की इस व्याख्या को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले यह थ्योरी दी थी कि घाटी के मुसलमानों ने भारत में ही रहने का निर्णय किया है, इसलिए इनाम में उन्हें विशेषाधिकार मिलने ही चाहिए।

अपने आपको भारतीय संविधान का विशेषज्ञ मानने वाले ए जी नूरानी का कहना है कि 35 ए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में से निकला है, इसलिए इसे भी छुआ नहीं जा सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि अब अनुच्छेद 370 की संतानें भी पैदा होने लगीं हैं और वह संतानें भी स्वयं ही भारतीय संविधान का अंग बन जाएंगी।

लेकिन यदि अभी से ध्यान न दिया गया और अनुच्छेद 370 ने तेज गति से संतानें पैदा करना शुरू कर दिया तो मूल भारतीय संविधान गुम हो जाए और अनुच्छेद 370 की अवैध संतानें ही सारे भारतीय संविधान पर कब्जा कर लेंगी।

गौरतलब है कि जिस समय राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 35 ए जोड़ा था, उस समय जम्मू-कश्मीर राज्य का संविधान तो बना नहीं था। अत: राज्य का स्थायी निवासी कौन है, इसका निर्णय कैसे किया जाए? तब फैसला हुआ कि रियासत के विलय से पहले 1927 और बाद में 1932 में संशोधित, जो परिभाषा महाराजा हरि सिंह ने तय की थी, वही परिभाषा मान्य होगी। उसके अनुसार स्थायी निवासी के चार प्रकार होते थे। पहला, दूसरा, तीसरा और चौथा प्रकार।

पहली प्रकार के स्थायी निवासी वे थे जो महाराजा गुलाब सिंह का शासन शुरू होने से पहले रियासत में रहे थे। या फिर जो लोग विक्रमी संवत् 1942 से पहले वहां बस गए थे और तब से स्थायी रूप से वहीं रह रहे हैं। दूसरे प्रकार के स्थायी निवासी वे थे जो संवत् 1968 से पहले रियासत में बस गए थे और उसके बाद वहीं रह रहे थे और उन्होंने अचल सम्पत्ति भी अर्जित कर ली है।

इसके अतिरिक्त स्थाई निवासी के प्रकार तीन और चार थे, जिन्हें राज्य सरकार ने बाद के संविधान में शामिल नहीं किया। इसलिए यह कहना कि राज्य सरकार ने स्थायी निवासी की परिभाषा निर्धारित करने के लिए महाराजा हरि सिंह का अनुसरण किया है, सही नहीं कहा जा सकता। 

जम्मू कश्मीर का स्थायी निवासी कौन है? इसको पहले ही राज्य के संविधान की धारा 6 में स्पष्ट कर दिया गया है। इसके अनुसार, मोटे तौर पर राज्य का स्थायी निवासी वे हैं जो या तो 1954 से राज्य में रह रहा हो या फिर उसके पूर्वज 1944 या उससे पहले से रियासत में रह रहे हों।

व्यवहारिक रूप से इसका अर्थ यह है कि जम्मू-कश्मीर राज्य ने अपनी भविष्य की संतानों को यह राज्य अनन्त काल के लिए लीज या पट्टे पर दे दिया गया है। यह उनकी व्यक्तिगत/सामूहिक संपत्ति हो गई है। किसने दिया है? उन्होंने स्वयं ही ले लिया है। इस लीज को ही वे जम्मू-कश्मीर का संविधान कहते हैं और इसी को वे राज्य का खास दर्जा कहते हैं। यह उनकी व्यक्तिगत/सामूहिक संपत्ति हो गई है। किसने दिया है? उन्होंने स्वयं ही ले लिया है। इस लीज को ही वे जम्मू-कश्मीर का संविधान कहते हैं।

लेकिन इससे मोटे तौर पर दो सवाल उभरते हैं, जिनका उत्तर देना जरूरी है। जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, यह प्रश्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भी उठाया था। पहला यह कि क्या जम्मू कश्मीर सरकार को यह अधिकार है कि वह राष्ट्रपति के कार्यपालिका आदेश के द्वारा ही संसद को बिना बताए या विश्वास में लिए भारत के संविधान के समानान्तर, एक नया संविधान तैयार कर ले और यह घोषणा करें कि भारत का यही संविधान राज्य में लागू होगा?

दूसरा यह कि क्या जम्मू-कश्मीर सरकार संविधान में ही कोई ऐसा प्रावधान डाल सकती है कि भविष्य में भी स्थायी निवासी को लेकर राज्य में कोई कानून बनाया जाएगा तो उसे चुनौती नहीं दी जा सकती।

जब कोई अधिनियम बन जाता है तब उसकी संवैधानिकता या गैर संवैधानिकता के बारे में विचार किया जा सकता है। लेकिन अधिनियम बनने से पहले ही उसके बारे में कोई कैसे कह सकता है कि इसे चुनौती नहीं दी जा सकती?

अब एक एनजीओ ने इस अनुच्छेद को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दे दी है। मामला वहां विचाराधीन है। यदि जम्मू-कश्मीर सरकार को अपनी संवैधानिक स्थिति पर इतना ही भरोसा है तो उसे इतना घबराने की जरूरत नहीं है।

नूरानी का कहना है कि 35 ए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में से निकला है,
इसलिए इसे भी छुआ नहीं जा सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि अब अनुच्छेद 370 की संतानें भी पैदा होने लगीं हैं और वह संतानें भी स्वयं ही भारतीय संविधान का अंग बन जाएंगी।

राज्य सरकार को अंदेशा होगा कि भविष्य में उच्चतम न्यायालय में स्थायी निवासी की परिभाषा को कोई चुनौती न दे दे, इसलिए उसने इन असंवैधानिक धाराओं और अधिनियमों के ईद-गिर्द अनुच्छेद 35 ए की कांटेदार तार स्वयं ही लगा ली। इस असंवैधानिक तार को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है।

इससे उत्तेजित होकर महबूबा मुफ्ती कहती हैं कि किसी ने 35 ए को छेड़ा तो कश्मीर में तिरंगे को कोई कन्धा देने वाला भी नहीं मिलेगा। अरब-ईरान से आने वालों, जिनकी जड़ें अभी तक भी घाटी में नहीं जम सकीं, के बारे में तो वे ही बेहतर जानती होंगी। जहां तक कश्मीरियों का ताल्लुक है तो वे तिरंगे को हाथ में ही थामे रहेंगे, कंधे की जरूरत नहीं पड़ेगी। महबूबा मुफ्ती को अपना रक्तचाप इस मामले को लेकर बढ़ाने की जरूरत नहीं है।

क्या है अनुच्छेद 35 ए

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 35 ए जिसे भारतीय संसद ने नहीं बनाया है, वह कहता है कि- जम्मू कश्मीर राज्य के स्थायी वाशिंदों की परिभाषा और उनको दिए जाने वाले विशेषाधिकारों व सुविधाओं, मसलन राज्य में सरकारी नौकरियां देना, अचल सम्पत्ति प्राप्त करना, राज्य में बस जाना, पढ़ने के लिए छात्रवृत्तियां या अन्य सरकारी सहायता देना इत्यादि को लेकर जम्मू-कश्मीर में जो अधिनियम इस समय लागू हैं या फिर राज्य का विधानमंडल भविष्य में इस संबंधी कोई अधिनियम पारित करता है, तो उस अधिनियम को इस आधार पर असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता कि इन अधिनियमों से देश के नागरिकों के साथ भेदभाव होता है।

यहां यह उल्लेख करना ठीक होगा कि राज्य अपने स्थायी निवासियों को ही राज्य में रहने का अधिकार देता है। राज्य के स्थायी निवासियों को ही राज्य प्रदत्त सुविधाएं उपलब्ध होंगी।

राज्य का स्थायी निवासी वह है जो या तो 1954 से राज्य में रह रहा हो या फिर उसके पूर्वज 1944 या उससे पहले से रियासत में रह रहे हों। व्यवहारिक रूप से इसका अर्थ यह है कि जम्मू-कश्मीर राज्य ने अपनी भविष्य की संतानों को यह राज्य अनन्त काल के लिए लीज या पट्टे पर दे दिया गया है।

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