अथातो डॉ. स्वामी कथा

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राजनीतिक नेता तो और भी हैं, पर डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी अनूठे हैं। उनकी किसी से तुलना नहीं हो सकती। वे जैसे हैं, अपने जैसे हैं। उनका उदाहरण खोजे नहीं मिलेगा। इसे ही विस्तार से बताती किताब आई है।

किताब है-‘इवॉल्विंग विद सुब्रह्मण्यम स्वामी-ए रोलर कोस्टर राइड’। इसे लिखा है, रॉक्सना स्वामी ने। यह बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि वे डॉ. स्वामी की सहचरी हैं।

इस किताब से अनूठे डॉ. स्वामी निखर कर निकलते हैं। जितना उनके बारे में जाना गया है, उससे कहीं ज्यादा वे इस किताब से समझे जा सकते हैं। स्वाभाविक ही है कि लेखिका के बारे में भी प्रसंगवश वर्णन इसमें आया है।

डॉ. स्वामी के पिता सीताराम सुब्रह्मण्यम महात्मा गांधी के आदर्शों से प्रेरित थे। वे अंग्रेजी जमाने में बड़े अफसर थे। लेकिन महात्मा गांधी के आदर्शों से प्रेरित रहे। उन आदर्शों को जीवन में उतारा। खादी पहनते थे। जातिसूचक पदनाम अय्यर को छोड़ा। बेटे ने भी उसे निभाया।

इमरजेंसी की ज्यादतियों को रॉक्सना स्वामी ने किस हिम्मत और सूझबूझ से झेला इसका
वर्णन भी मार्मिक है। इंदिरा गांधी की तानाशाही का मजाक उड़ाते हुए कैसे
डॉ. स्वामी संसद पहुंचे। राज्यसभा में व्यवस्था का प्रश्न उठाया। जो कहा वह किताब में है।

आम तौर पर माता-पिता बच्चे का स्कूल तय करते हैं। डॉ. स्वामी ने खुद अपना स्कूल चुना। वह डीपीएस था। कहना यह है कि डॉ. स्वामी बचपन से ही अलग किस्म के थे। स्वयंसिद्ध बने रहे। अपने बारे में खुद निर्णय लिए। आत्मविश्वास से वे भरे-पूरे रहे। हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। वहां पढ़ाया। इसे ज्यादातर लोग जानते हैं।

नई सूचना इससे अलग है। सिर्फ दो साल में उन्होंने वहां पीएचडी पूरी की। असिस्टेंट प्रोफेसर बने। उन्हें चुनौतियां पसंद थी। इसलिए आराम की जिदंगी छोड़ी। भारत लौटे। राजनीति में उतरे।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में ही रॉक्सना से भेंट हुई। वे जीवन साथी बने। दूसरी खास बात जो वहां हुई, वह जेपी-प्रभावती से मुलाकात थी। जेपी ने ही डॉ. स्वामी को भारत लौटने के लिए प्रेरित किया। लेकिन उनके सुझाए कामों में डॉ. स्वामी की रुचि ज्यादा दिनों तक नहीं टिकी। वे सितंबर 1969 में आए। मदुराई में जेपी के आश्रम को ठिकाना बनाया। वहां उनका जाना और रहना वैसे ही था, जैसे अपने घर की ओर लौटना हो।

डॉ. स्वामी की जड़ें मदुराई में ही हैं। सर्वोदय के काम-काज में रुचि न होने के कारण वे आईआईटी दिल्ली में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बने। उन्हें हटाने के लिए वामपंथियों ने जाल बुना। पर अपनी योग्यता के आधार पर वे स्थाई प्रोफेसर नियुक्त हुए।

उन्हीं दिनों डॉ. स्वामी का संपर्क जनसंघ के नेता नानाजी देशमुख से हुआ। असल में डॉ. स्वामी को नानाजी देशमुख ने खोजा। उस समय डॉ. स्वामी अकेले प्रोफेसर थे, जिसने एटम बम बनाने की हिमायत की। इस विचार ने ही डॉ. स्वामी को जनसंघ से जोड़ा। राजनीति में वह प्रवेश का पहला कदम था। जिससे डॉ. स्वामी की दुनिया बदली।

उन्हें आईआईटी से निकाल दिया गया था। वे चाहते तो दूसरे अवसर उन्हें उपलब्ध हो जाते। लेकिन उन्होंने जनसंघ को अपनाया। 1974 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में लखनऊ की चार विधानसभा सीटों का चुनाव प्रचार संभाला। इस किताब से यह तथ्य सामने आता है कि रॉक्सना स्वामी भी उनके साथ उस कार्य में जुटी थीं।

उसी साल वे उत्तर प्रदेश से राज्यसभा में पहुंचे। जेपी आंदोलन अपने उफान पर था। जब इंदिरा गांधी ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए इमरजेंसी लगाई, तब भूमिगत आंदोलन में डॉ. स्वामी ने जो नया कीर्तिमान कायम किया वह सर्वविदित है। उसका पूरा विवरण इस किताब में बहुत रोचक ढंग से आ गया है।

इमरजेंसी की ज्यादतियों को रॉक्सना स्वामी ने किस हिम्मत और सूझबूझ से झेला इसका वर्णन भी मार्मिक है। इंदिरा गांधी की तानाशाही का मजाक उड़ाते हुए कैसे डॉ. स्वामी संसद पहुंचे। राज्यसभा में व्यवस्था का प्रश्न उठाया। जो कहा वह किताब में है। यह भी सूचना है कि राज्यसभा के रिकॉर्ड से उसे तब के चेयरमैन ने हटवा दिया।

जिस कार से डॉ. स्वामी संसद गए वह इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका की थी। संसद से निकलने के बाद उसे वे चलाकर मंदिर मार्ग पहुंचे। वहां गाड़ी छोड़ी। रिक्शा पर सवार हुए। नई दिल्ली स्टेशन पहुंचे। तब डॉ. स्वामी कांग्रेस के सेवा दल के स्वयंसेवक के वेश में थे। सिर पर टोपी थी। ट्रेन में बैठे। मथुरा पहुंचकर रॉक्सना स्वामी को तार दिया-‘पुस्तक छप गई है।’ सुरक्षित निकल आने की वह कोड वाक्य था। 

एक नई बात संभवत: पहली बार सामने आई है। डॉ. स्वामी का संसद पहुंचना लंबी योजना का अंग था। वे जो वहां करेंगे उसका विश्वव्यापी असर होगा। इसे ही ध्यान में रखकर रॉक्सना स्वामी ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन के दफ्तर गई। वहां उन्होंने बताया कि अगले दिन राज्यसभा की कार्यवाही को जरूर कवर करिए। कुछ खास होगा। इसी से वह घटना विश्वव्यापी बन गई।

लेकिन इससे डॉ. स्वामी के परिवार पर विपदा आ पड़ी। इंदिरा गांधी का कहर बरपा। तब अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका क्या थी? इसे किताब उजागर करती है। बिना राग-द्वेष के किताब में तथ्य हैं। पूरी पृष्ठभूमि नहीं है। इस कारण कुछ भ्रम बने रहने की संभावना है। वह समय इमरजेंसी की ढलान का था। इंदिरा गांधी विपक्ष की कमर तोड़ने पर जुटी थी। तब अटल बिहारी वाजपेयी इस प्रयास में थे कि किसी तरह इंदिरा गांधी लोकसभा का चुनाव कराने के लिए राजी हो जाएं।

यह किताब दो शरीर और एक आत्मा की कहानी कहती है।
डॉ. स्वामी से कहीं भी उनकी पत्नी को किसी भी प्रकार की शिकायत नहीं है।
मतलब साफ है।उनके हर फैसले को वे सही मानती हैं।

ऐसे समय में सुलह और समझौते की मानसिकता होती है। अटल बिहारी वाजपेयी उसी दृष्टिकोण के तब हिमायती थे। जब रॉक्सना स्वामी उनके पास गई और मदद मांगी तो वाजपेयी ने उन्हें सलाह दी कि डॉ. स्वामी को आत्मसमर्पण कर देना चाहिए।

दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भूमिगत नेतृत्व डॉ. स्वामी को तानाशाही पंजे से बचाकर विदेश भेजने में जुटा था। इसके लिए भाउराव देवरस नेपाल गए। वहां राजा वीरेंद्र से बात की। जिससे यह संभव हुआ कि डॉ. स्वामी नेपाल से बैंकाक जा सके। वह रोमांचक यात्रा थी।

वे संसद से बचकर मुंबई पहुंच गए थे। वहां उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखा गया था। वहीं से वे कार से नेपाल की सीमा में पहुंचे थे। यह दिसंबर, 1976 की बात है। वे लंदन पहुंचे। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में रोजोवस्की ने प्रयास किया। वे वहां प्रोफेसर हो जाते कि लोकसभा के चुनाव की घोषणा हो गई।

रोजोवस्की ने डॉ. स्वामी से एक वचन लिया। वह यह कि डॉ. स्वामी इजराइल से भारत के राजनयिक संबंध के लिए प्रयास करेंगे। वह डॉ. स्वामी ने किया। विपरीत परिस्थितियों में चुनौतीपूर्ण काम करना डॉ. स्वामी से कोई सीखे।

यह किताब दो शरीर और एक आत्मा की कहानी कहती है। डॉ. स्वामी से कहीं भी उनकी पत्नी को किसी भी प्रकार की शिकायत नहीं है। मतलब साफ है। उनके हर फैसले को वे सही मानती हैं। जैसे जनता पार्टी से निकलकर भाजपा के बनने पर डॉ. स्वामी उससे बाहर हो गए। उस समय की अंतरंग कथा का एक पक्ष ही आ पाया है। हो सकता है कि रॉक्सना स्वामी को भी पूरी बात न मालूम हो।

जनता पार्टी के शासन में डॉ. स्वामी का राजनीतिक उपयोग मोरारजी देसाई ने किया। इससे डॉ. स्वामी और वाजपेयी में दूरी बनी। जिसके कारण डॉ. स्वामी ने स्वयं निर्णय किया कि वे जनता पार्टी में बने रहेंगे। पर यह भी उतना ही सच है कि अटल बिहारी वाजपेयी की नजरों में डॉ. स्वामी खटकते थे। ऐसा जिन-जिन नेताओं के साथ हुआ, उन्हें भाजपा से बाहर जाना पड़ा। इस तरह डॉ. स्वामी को 33 साल राजनीति के बियाबान में भटकना पड़ा।

उस दौर के उतार-चढ़ाव को जानना हो तो यह किताब बहुत उपयोगी है। इस किताब को पढ़ते हुए महसूस होता है कि रॉक्सना स्वामी की नजर में कुछ नायक हैं। जैसे अर्थशास्त्री पाल सेमुअल्सन, नानाजी देशमुख, दत्तोपंत ठेंगड़ी और मोरारजी देसाई। अटल बिहारी वाजपेयी को वे खलनायक मानती हैं। उनके कारण ही डॉ. स्वामी का संघ से भी संबंध बिगड़ा। जिसके बारे में बहुत विस्तार से रॉक्सना स्वामी ने लिखा।

जनता पार्टी में रहते हुए डॉ. स्वामी ने रामकृष्ण हेगडे के भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए कानूनी लड़ाई छेड़ी, यह उस समय की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना थी। इस किताब से जो नई बात निकलती है, वह दूसरी है। रॉक्सना स्वामी ने इमरजेंसी के दिनों में अपने मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए नई राह चुनी। दिल्ली विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई शुरू की। फिर वकील बनी। सोली सोराबजी के जूनियर के रूप में सुप्रीम कोर्ट में वकालत शुरू की। इस तथ्य में ही डॉ. स्वामी के कानूनी अभियान का रहस्य छिपा है।

यह किताब डॉ. स्वामी को केंद्र में रखकर घूमती राजनीति के चार दशक से ज्यादा की यात्रा कथा है। इसे हिन्दी में भी आना चाहिए।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

22 टिप्पणी

  1. डा सुब्रह्मण्यम स्वामी के बारे में इतना लिखकर राय साहब ने जिज्ञासा तो बढ़ा दी। किन्तु समाधान अंगरेजी में बता निराशा भी दे दी।
    ऐसे में अगर राय साहब से ही पुस्तक के हिन्दी संस्करण को उपलब्ध कराने की अपेक्षा करना उनका कार्य भले बढ़ा दें, अन्यथा की श्रेणी में तो नहीं होगा।

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